Prambanan Temple: PM मोदी जब इंडोनेशिया पहुंचे तो सबकी नजर डील और डिप्लोमेसी पर थी। पर सबसे खास ऐलान एक मंदिर को लेकर हुआ।भारत अब जावा द्वीप के 1170 साल पुराने प्राम्बानन मंदिर परिसर को फिर से बनाने में मदद करेगा।हां, इंडोनेशिया में। वही देश जहां दुनिया की सबसे बड़ी मुस्लिम आबादी रहती है। और उसी देश में खड़ा है हिंदू धर्म का एक सबसे भव्य धरोहर स्थल।
पहले इसे कहानी समझा जाता था
1733 में एक डच अफसर जंगल में घूम रहा था। उसे पत्थरों का पहाड़ दिखा। स्थानीय लोगों ने बताया, यह “रोरो जोंग्रांग” का मंदिर है।कहानी थी एक राजकुमारी की। उसने कहा था, एक रात में 1000 मंदिर बना दो, तो शादी करूंगी। राजकुमार ने 999 बना दिए। फिर चाल चली गई और बाकी मंदिर नहीं बन पाए।
19वीं सदी में जब पत्थर हटे, तो दीवारों पर संस्कृत मिली। एक शिलालेख पर साफ लिखा था “शिवगृह” और तारीख 856 ईस्वी।तब पता चला, यह कोई लोककथा नहीं है। यह मातरम साम्राज्य के संजय वंश का बनाया हुआ मंदिर है।राजा राकाई पिकातन ने 850 के आसपास शुरुआत की। बेटे राजा लोकपाल ने 856 में उद्घाटन किया।यह सिर्फ एक मंदिर नहीं है। यह पूरा शहर है।
कुल 250 मंदिर। बीच में सबसे ऊंचा 47 मीटर का शिव मंदिर। उसके दोनों तरफ ब्रह्मा और विष्णु। चारों तरफ रामायण की कहानी पत्थरों पर उकेरी हुई है। जिस मूर्ति को लोग राजकुमारी मानते थे, वह निकली महिषासुरमर्दिनी दुर्गा।1991 में UNESCO ने इसे वर्ल्ड हेरिटेज साइट घोषित किया।

Prambanan Temple: तो हिंदू धर्म वहां पहुंचा कैसे
कोई युद्ध नहीं हुआ। कोई आक्रमण नहीं हुआ।पहली सदी में दक्षिण भारत के व्यापारी समंदर पार करके इंडोनेशिया पहुंचे। तमिलनाडु से निकले जहाज मसाले, कपड़ा और सोना लेकर आए। साथ में संस्कृति भी लाए।इंडोनेशिया में पहले से प्रकृति की पूजा होती थी। उन्हें हिंदू रीति-रिवाज अपने जैसे लगे। पर राजाओं को एक बात और पसंद आई। भारत में राजा को भगवान का रूप माना जाता था। इससे राज मजबूत होता था।
इसलिए उन्होंने भारत से ब्राह्मण बुलवाए। संस्कृत सीखी। मंदिर बनाने की कला सीखी। धीरे-धीरे जावा और सुमात्रा में मातरम और मजापहित जैसे बड़े हिंदू-बौद्ध राज्य बन गए।बाद में मेरापी ज्वालामुखी फटा और भूकंप आए। लोग वहां से चले गए। हिंदू धर्म सिर्फ बाली में बचा रहा। 13वीं सदी में अरब व्यापारियों के साथ इस्लाम आया। पर वह भी व्यापार के रास्ते।
अब भारत फिर से जोड़ रहा है रिश्ता
डचों ने 20वीं सदी में अनास्टाइलोसिस तकनीक से काम शुरू किया। यानी जो पुराने पत्थर बिखरे हैं, उसी को जोड़ो। नया पत्थर सिर्फ आखिरी ऑप्शन।1953 में मुख्य शिव मंदिर तैयार हुआ। 2006 में भूकंप से नुकसान हुआ, उसे ठीक किया गया।अब भारत ASI की टीम के साथ जीर्णोद्धार में तकनीकी मदद देगा। पहले 1 या 2 छोटे मंदिरों पर पायलट होगा। AI से बिखरे पत्थरों को स्कैन करके पता लगाया जाएगा कि कौन सा टुकड़ा कहां लगेगा।यह सिर्फ मंदिर नहीं है,यह एक संदेश है।
एक तरफ दुनिया की सबसे बड़ी हिंदू आबादी वाला देश। दूसरी तरफ दुनिया की सबसे बड़ी मुस्लिम आबादी वाला देश। दोनों मिलकर 1000 साल पुराने ब्रह्मा, विष्णु और शिव के मंदिर को बचा रहे हैं।
व्यापार से शुरू हुआ रिश्ता आज भी उतना ही मजबूत है।इंडोनेशिया ने इसे संभाल कर रखा। अब भारत इसे फिर से निखारने जा रहा है।वसुधैव कुटुम्बकम्। दुनिया एक परिवार है। यह लाइन पत्थरों पर नहीं, इतिहास में लिखी हुई है।
Written by- Mansi Sharma








