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सांसद प्रमोद तिवारी के बयान पर संत समाज नाराज, ‘सीता कौन थीं’ टिप्पणी को बताया सनातन का अपमान

Pramod Tiwari

Pramod Tiwari: कांग्रेस सांसद प्रमोद तिवारी के एक बयान को लेकर नया राजनीतिक और धार्मिक विवाद खड़ा हो गया है। राम मंदिर चढ़ावे के मुद्दे पर भाजपा पर निशाना साधते हुए दिए गए उनके बयान के बाद देशभर के साधु-संतों ने कड़ी आपत्ति जताई है। संत समाज का कहना है कि इस तरह की टिप्पणियां सनातन परंपरा और करोड़ों लोगों की आस्था को ठेस पहुंचाने वाली हैं। कई धार्मिक नेताओं ने कांग्रेस पर भी सनातन विरोधी राजनीति करने का आरोप लगाया और बयान की सार्वजनिक निंदा की।

संत समाज ने जताई कड़ी आपत्ति

प्रमोद तिवारी की टिप्पणी पर प्रतिक्रिया देते हुए संत वरुण दास ने कहा कि एक वरिष्ठ नेता होने के बावजूद उन्हें भगवान राम और रामायण की मूल परंपराओं की सही जानकारी होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि राम जन्मभूमि मंदिर भगवान राम के बाल स्वरूप को समर्पित है, जहां रामलला अपने चारों भाइयों के साथ विराजमान हैं। वहीं माता सीता और भगवान राम के संयुक्त दर्शन के लिए अयोध्या का कनक भवन प्रमुख स्थल माना जाता है। उन्होंने कहा कि धार्मिक तथ्यों को जाने बिना इस प्रकार के बयान देना उचित नहीं है।

Pramod Tiwari: महंतों ने बयान को बताया दुर्भाग्यपूर्ण

महंत विष्णु दास ने कहा कि प्रमोद तिवारी का बयान पूरी तरह निराधार और निंदनीय है। उनके अनुसार, इस तरह की टिप्पणियां केवल धार्मिक भावनाओं को आहत करने का काम करती हैं। वहीं महंत देवेशाचार्य ने कहा कि एक वरिष्ठ और अनुभवी नेता से इस प्रकार की टिप्पणी की उम्मीद नहीं की जा सकती। उन्होंने कहा कि यदि प्रमोद तिवारी माता जानकी से जुड़े स्थलों के बारे में जानना चाहते हैं तो उन्हें अयोध्या आना चाहिए, जहां उनसे जुड़े कई प्रमुख धार्मिक स्थल मौजूद हैं।

कांग्रेस पर भी साधा निशाना

साकेत भवन के प्रमुख महंत सीताराम दास ने कांग्रेस पर निशाना साधते हुए कहा कि पार्टी लंबे समय से सनातन परंपराओं के खिलाफ बयानबाजी करती रही है। उन्होंने आरोप लगाया कि इस तरह की टिप्पणियां समाज में अनावश्यक विवाद पैदा करती हैं और धार्मिक आस्था को चोट पहुंचाती हैं। संत समाज ने कहा कि सार्वजनिक जीवन में रहने वाले नेताओं को अपने शब्दों का चयन सोच-समझकर करना चाहिए, ताकि किसी भी समुदाय की भावनाएं आहत न हों। प्रमोद तिवारी के बयान के बाद यह विवाद अब राजनीतिक गलियारों से निकलकर धार्मिक मंचों तक पहुंच गया है। आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर राजनीतिक दलों और धार्मिक संगठनों की प्रतिक्रियाएं और तेज होने की संभावना जताई जा रही है।

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