Reservation Hatao Andolan: राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के जंतर-मंतर से ‘आरक्षण हटाओ आंदोलन’ के बैनर तले जो आवाज उठी है और सोशल मीडिया पर उसे जो व्यापक जनसमर्थन मिल रहा है, उसने देश की राजनीतिक पार्टियों के लिए नई चुनौतियां खड़ी कर दी हैं। सत्तारुढ़ भाजपा के साथ ही विपक्षी कांग्रेस और अन्य पार्टियों के सामने एक तरफ कुआं तो दूसरी तरफ खाई वाली स्थिति बन गई है।यदि वे जातिगत आरक्षण हटाए जाने की मांग को लेकर शुरू हुए मौजूदा आंदोलन का समर्थन करते हैं, तो पारंपरिक सामाजिक न्याय और जातिगत आरक्षण के पक्षधर उनसे नाराज होते हैं। यदि वे इस आंदोलन का समर्थन नहीं करते हैं, तो सवर्ण जातियां उनसे नाराज होती हैं।ऐसे में अहम चुनौती राजनीतिक संतुलन बनाए रखने अथवा वोटों को साधे रखने की है।
भाजपा का धर्म संकट
सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी के सामने सबसे बड़ी चुनौती है। लोकसभा हो या विधानसभा चुनाव सवर्ण जातियों के अधिकांश वोट भाजपा को मिलते आ रहे हैं।1996 से लेकर 2024 तक हर लोकसभा चुनाव में भाजपा को सवर्णों के अच्छे वोट मिले।2019 के लोकसभा चुनाव में 52 प्रतिशत, तो 2024 के लोकसभा चुनाव में 53 प्रतिशत सवर्णों ने भाजपा को वोट किया। खास बात यह है कि सवर्ण मतदाता न सिर्फ भाजपा को वोट देते हैं, बल्कि उसके पक्ष में चुनावी माहौल बनाने में भी अहम भूमिका निभाते हैं।फरवरी 2027 में उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, मणिपुर, गोवा और पंजाब में विधानसभा के चुनाव होने हैं। इनमें से 4 राज्यों में इस वक्त बीजेपी की सरकार है।ये चुनाव आगामी लोकसभा चुनाव की दिशा तय करेंगे। खासकर उत्तर प्रदेश ऐसा राज्य है, जहाँ से केंद्र की सत्ता का रास्ता तय होता है। इस राज्य में सवर्ण मतदाता काफी अहम माने जाते हैं।फिर भाजपा तीसरी बार उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव जीतने की कोशिश में है।ऐसे में सभी वर्गों या जातियों के मतदाताओं को साथ लेकर चलना पार्टी के लिए बहुत जरूरी हो जाता है।
Reservation Hatao Andolan: समस्या का समाधान जरूरी
गौरतलब है कि मोदी सरकार ने 2019 में 103 वें संविधान संशोधन के जरिए सामान्य वर्ग के गरीबों के लिए 10 प्रतिशत ईडब्ल्यूएस (EWS) आरक्षण लागू किया।सुप्रीम कोर्ट ने इसे जायज मानते हुए कहा कि आर्थिक आधार पर आरक्षण संविधान के मूल ढांचे का उल्लंघन नहीं करता है।मोदी सरकार ने भी स्पष्ट किया कि ईडब्ल्यूएस (EWS) आरक्षण एससी, एसटी, ओबीसी कोटे से पूरी तरह अलग है। इस लिहाज से देखें तो मोदी सरकार ने सभी वर्गों और जातियों के हितों को ध्यान में रखने का संदेश दिया।इसके बावजूद मौजूदा ‘आरक्षण हटाओ आंदोलन’ या आर्थिक आधार पर आरक्षण की मांग सरकार के लिए वर्तमान ही नहीं, बल्कि आगामी लोकसभा चुनाव की दृष्टि से भी एक बड़ी चुनौती है। देखना है कि सरकार समस्या के समाधान को लेकर कौन सा व्यावहारिक रास्ता निकालती है।
कहीं अगड़ों और पिछड़ों के मोर्चे न खुल जाएंं
‘आरक्षण हटाओ आंदोलन’ के बैनर तले आवाज बुलंद कर रहे प्रदर्शनकारियों की मुख्य मांग है कि आरक्षण व्यवस्था को जाति के बजाय आर्थिक आधार पर लागू किया जाए और इसे योग्यता (Merit) से जोड़ा जाए। ऐसे में क्षेत्रीय और पिछड़े-दलों के लिए यह आंदोलन अपने मूल सामाजिक आधार (OBC, SC, ST) के अधिकारों की रक्षा का सवाल है। वे किसी भी दशा में आर्थिक कोटे की मांग या उसके विस्तार से पारंपरिक जातिगत आरक्षण को प्रभावित होते नहीं देख पाएंगे। ऐसे में सरकार को ध्यान रखना होगा कि कहीं अगड़ों और पिछड़ों के बीच सीधे टकराव या मोर्चे खुलने की आशंकाएं न पैदा हो जाएं।1990 में विश्वनाथ प्रताप सिंह सरकार ने मंडल कमीशन की सिफारिशों को लागू किया था, तो उस समय देशभर में छात्रों ने प्रचंड आंदोलन छेड़ दिया था।दिल्ली विश्वविद्यालय के तत्कालीन छात्र नेता राजीव गोस्वामी ने इसके खिलाफ आत्मदाह की कोशिश कर पूरे देश का ध्यान आकर्षित किया था। वे बुरी तरह झुलस गये थे। उस समय भी आरक्षण विरोधियों और समर्थकों के बीच मोर्चे खुल गए थे।
Reservation Hatao Andolan: कांग्रेस को कलह का खतरा
‘आरक्षण हटाओ आंदोलन’ कांग्रेस के लिए मुश्किलें खड़ी करने वाला है। यदि जातिगत कोटे को खत्म कर आर्थिक आधार पर आरक्षण की मांग जोर पकड़ती है, तो इसके प्रभाव से विपक्षी कांग्रेस बच नहीं पाएगी।दलित, आदिवासी, पिछड़े (OBC) और अल्पसंख्यक वर्ग के लोग कभी कांग्रेस के मुख्य मतदाता रहे। हालांकि क्षेत्रीय दलों के उभार के चलते इन मतदाताओं का बड़ा हिस्सा उसके हाथ से चला गया, फिर भी पार्टी उनका विश्वास हासिल करने की कोशिशें करती रही है।वर्तमान में भी कांग्रेस दलित, आदिवासी और ओबीसी (पिछड़े वर्गों) के वोटों को जोड़ने के लिए जातिगत जनगणना और आरक्षण की सीमा 50 प्रतिशत से बढ़ाने की वकालत कर रही है।ऐसे में आरक्षण विरोधी आंदोलनकारी उसकी वैचारिक नीति को कटघरे में खड़ा कर सवर्ण मतदाताओं को उससे दूर कर सकते हैं।इससे कांग्रेस के सवर्ण समर्थक या सवर्ण नेता असहज महसूस कर सकते हैं।वे पार्टी के भीतर नयी वैचारिक बहस छेड़ सकते हैं।यह स्थिति पार्टी में अंदरूनी कलह पैदा कर सकती है।
सपा-बसपा फायदे में रहेंगे
‘आरक्षण हटाओ आंदोलन’ के चलते यदि अगड़ों एवं पिछड़ों का ध्रुवीकरण होता है, तो सपा और बसपा जैसी पार्टियां फायदे में रहेंगी। समाजवादी पार्टी (सपा) और बहुजन समाज पार्टी (बसपा) की राजनीति पीडीए (पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्क) मतदाताओं पर निर्भर करती है।सपा नेता ध्रुवीकरण का फायदा उठाने की कोशिश कर सकते हैं, जबकि बसपा के कोर वोटर (दलित और पिछड़े वर्ग) में ‘आरक्षण हटाओ आंदोलन’ का यह संदेश जाएगा कि उनके संवैधानिक अधिकार खतरे में हैं, लिहाजा वे एकजुट होकर अपनी ताकत दिखाना चाहेंगे।
लेखक: Data Ram Chamoli
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