UCC: भारत में समान नागरिक संहिता यानी Uniform Civil Code (UCC) एक बार फिर चर्चा में है। सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि UCC क्या है, बल्कि बड़ा सवाल यह है कि अगर देश में समान नागरिक संहिता लागू होती है तो हिंदू, मुस्लिम, ईसाई, पारसी और दूसरे समुदायों के लिए शादी, तलाक, विरासत और गोद लेने जैसे मामलों में क्या बदल जाएगा? संविधान के अनुच्छेद 44 में राज्य से नागरिकों के लिए समान नागरिक संहिता सुनिश्चित करने का प्रयास करने को कहा गया है। वहीं, उत्तराखंड 27 जनवरी 2025 को UCC लागू करने वाला स्वतंत्र भारत का पहला राज्य बना।
UCC का विचार आया कहां से? संविधान बनने से पहले और बाद का इतिहास
भारत में अलग-अलग समुदायों के निजी कानूनों की व्यवस्था का इतिहास काफी पुराना है। ब्रिटिश दौर में भी विवाह, परिवार और उत्तराधिकार जैसे मामलों में धार्मिक और सामुदायिक परंपराओं की भूमिका बनी रही। आजादी के बाद संविधान निर्माताओं के सामने सवाल था कि क्या पूरे देश के लिए पारिवारिक और निजी मामलों में एक जैसा कानून होना चाहिए। संविधान सभा में इस मुद्दे पर बहस हुई और आखिरकार अनुच्छेद 44 को संविधान के नीति-निर्देशक तत्वों में शामिल किया गया। इसमें कहा गया कि भारत के पूरे क्षेत्र में नागरिकों के लिए समान नागरिक संहिता सुनिश्चित करने का प्रयास करेगा।
UCC: अभी भारत में निजी कानून कैसे काम करते हैं?
हिंदुओं के लिए “हिंदू विवाह अधिनियम” और “हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम” जैसे कानून महत्वपूर्ण हैं। मुस्लिम समुदाय के व्यक्तिगत कानून में “मुस्लिम पर्सनल लॉ” से जुड़े नियम और प्रथाएं लागू होती हैं। ईसाइयों के विवाह और तलाक से जुड़े मामलों के लिए अलग कानून हैं, जबकि पारसियों के लिए भी अलग वैधानिक व्यवस्था है। इसका अर्थ यह नहीं है कि हर मामले में धर्म के आधार पर पूरी तरह अलग कानून है। कई ऐसे नागरिक कानून हैं जो सभी समुदायों पर समान रूप से लागू होते हैं। इसलिए UCC का असली दायरा मुख्य रूप से व्यक्तिगत और पारिवारिक नागरिक मामलों में समान नियम बनाने से जुड़ा है।

शादी के नियमों में सबसे बड़ा बदलाव क्या होगा?
UCC लागू होने पर सबसे बड़ा बदलाव विवाह के नियमों में दिखाई दे सकता है। अलग-अलग धर्मों के लिए अलग-अलग विवाह कानूनों के बजाय- विवाह की वैधता, उम्र, पंजीकरण, निषिद्ध रिश्ते और दूसरी कानूनी शर्तों के लिए एक समान व्यवस्था बनाई जा सकती है। उत्तराखंड के UCC में विवाह का पंजीकरण अनिवार्य व्यवस्था का हिस्सा है। वहां 27 जनवरी 2025 के बाद के विवाहों के लिए पंजीकरण की प्रक्रिया निर्धारित की गई है। मुस्लिम समुदाय के संदर्भ में सबसे महत्वपूर्ण संभावित बदलाव बहुविवाह का है। अगर किसी राष्ट्रीय UCC में बहुविवाह पर रोक का प्रावधान किया जाता है, तो मुस्लिम पुरुष के लिए एक से अधिक विवाह की मौजूदा व्यक्तिगत कानून आधारित व्यवस्था खत्म हो सकती है।
UCC: तलाक और भरण-पोषण में क्या बदलेगा?
UCC का दूसरा बड़ा प्रभाव तलाक के मामलों में हो सकता है। अलग-अलग समुदायों में तलाक की प्रक्रिया और आधार अलग रहे हैं। समान नागरिक संहिता लागू होने पर तलाक के लिए समान कानूनी आधार और प्रक्रिया तय की जा सकती है। इसका असर मुस्लिम व्यक्तिगत कानून से जुड़े मामलों में भी होगा, जहां तलाक के अलग-अलग तरीकों को लेकर लंबे समय से कानूनी बहस होती रही है। तीन तलाक पर तो पहले ही संसद कानून बना चुकी है; इसलिए UCC लागू होने की स्थिति को तीन तलाक पर रोक से अलग विषय के रूप में समझना चाहिए।
संपत्ति और विरासत में किसे कितना हिस्सा मिलेगा?
यह UCC का सबसे संवेदनशील हिस्सा हो सकता है। अभी अलग-अलग समुदायों में उत्तराधिकार के नियम अलग हैं। हिंदू उत्तराधिकार कानून में बेटा और बेटी समेत उत्तराधिकारियों के अधिकारों को लेकर वैधानिक व्यवस्था है। मुस्लिम उत्तराधिकार व्यवस्था में शरीयत आधारित नियमों के अनुसार अलग-अलग रिश्तेदारों के हिस्से तय होते हैं।
यदि UCC में सभी नागरिकों के लिए एक समान उत्तराधिकार व्यवस्था बनाई जाती है तो धर्म के आधार पर अलग-अलग विरासत नियमों की जगह एक समान नियम लागू होंगे। इसका मतलब किसी व्यक्ति की मृत्यु बिना वसीयत के होने पर उसकी संपत्ति का बंटवारा एक समान उत्तराधिकार कानून के अनुसार हो। लेकिन यहां एक जरूरी सावधानी है किसे कितना हिस्सा मिलेगा, यह किसी काल्पनिक राष्ट्रीय UCC के बारे में बिना उसके अंतिम कानून को देखे तय करके नहीं कहा जा सकता। उत्तराखंड में उत्तराधिकार के लिए UCC के तहत अलग प्रक्रिया और कानूनी उत्तराधिकारियों की व्यवस्था है।

गोद लेना, बच्चों के अधिकार और लिव-इन पर पड़ेगा असर?
UCC का असर केवल शादी और तलाक तक सीमित नहीं हो सकता। परिवार से जुड़े दूसरे नागरिक मामलों को भी समान नियमों के दायरे में लाया जा सकता है। उत्तराखंड के UCC में विवाह, तलाक, उत्तराधिकार के साथ लिव-इन संबंधों के पंजीकरण और उनसे जुड़े मामलों के लिए भी व्यवस्था बनाई गई है। आधिकारिक पोर्टल पर विवाह, तलाक, उत्तराधिकार और लिव-इन संबंधों के लिए अलग-अलग सेवाएं उपलब्ध हैं।
गोद लेने के मामले में भी समान नागरिक संहिता के जरिए धर्म आधारित अंतर कम करने की कोशिश की जा सकती है। हालांकि राष्ट्रीय UCC में दत्तक ग्रहण के नियम वास्तव में क्या होंगे, यह उसके अंतिम कानून पर निर्भर करेगा। बच्चों के अधिकार, उत्तराधिकार और माता-पिता की कानूनी जिम्मेदारियों के मामले में भी समान नियमों का उद्देश्य धर्म के बजाय एक समान नागरिक व्यवस्था बनाना हो सकता है।
क्या UCC से धर्म और पूजा-पद्धति भी बदल जाएगी?
यह UCC को लेकर सबसे बड़ी गलतफहमियों में से एक है। समान नागरिक संहिता का मूल विषय धार्मिक पूजा-पद्धति नहीं बल्कि नागरिक और पारिवारिक कानून हैं। यानी इसका संबंध इस बात से नहीं है कि कोई व्यक्ति कौन-सी पूजा करेगा, कौन-सा धार्मिक त्योहार मनाएगा या किस धर्म की धार्मिक मान्यता मानेगा। संविधान धार्मिक स्वतंत्रता की भी गारंटी देता है। इसलिए UCC को सीधे धार्मिक स्वतंत्रता खत्म करने वाला कानून मानना सही नहीं होगा।
हिंदू, मुस्लिम और दूसरे समुदायों के लिए सबसे बड़ा बदलाव क्या होगा?
अगर भविष्य में केंद्र सरकार राष्ट्रीय स्तर पर UCC लागू करती है और उसमें उत्तराखंड जैसे प्रावधानों को आधार बनाया जाता है, तो सबसे बड़ा बदलाव यह होगा कि व्यक्ति के धर्म के बजाय एक समान नागरिक कानून उसके विवाह, तलाक, उत्तराधिकार और दूसरे पारिवारिक नागरिक मामलों को नियंत्रित करेगा। मुस्लिम समुदाय के लिए बहुविवाह और उत्तराधिकार जैसे विषयों में महत्वपूर्ण बदलाव संभव हैं। हिंदू समुदाय के लिए भी विरासत, विवाह और परिवार से जुड़े कुछ नियम बदल सकते हैं। ईसाई और पारसी समुदायों के अलग व्यक्तिगत कानूनों की जगह भी समान नियम आ सकते हैं।
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