Ujjain’s Shahi Masjid: उज्जैन की शाही मस्जिद इन दिनों सड़क चौड़ीकरण को लेकर विवाद में है। मस्जिद के एक हिस्से को हटाने की कार्रवाई के बीच इसके इतिहास और उम्र को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। मस्जिद प्रबंधन इसे करीब 636 साल पुराना बताता है, जबकि मौजूदा सरकारी दस्तावेजों में इसका स्पष्ट रिकॉर्ड कम से कम 1925 से मिलता है। 1925 की सिंधिया रियासत से जुड़ी चिट्ठी और 1985 के मध्य प्रदेश राजपत्र का हवाला देकर मस्जिद पक्ष ने अपने दावे अदालत के सामने रखे हैं।
सिंहस्थ-2028 की तैयारियों के बीच शहर में सड़क और बुनियादी ढांचे को चौड़ा करने का काम चल रहा है। इसी क्रम में कंठाल चौराहे से गोपाल मंदिर मार्ग को चौड़ा करने की योजना के दायरे में शाही मस्जिद का एक हिस्सा भी आ रहा है। प्रशासन की कार्रवाई को लेकर विरोध हुआ और मामला मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर पीठ तक पहुंचा।\ विवाद के बीच सबसे ज्यादा चर्चा मस्जिद की उम्र और उसके ऐतिहासिक दस्तावेजों को लेकर है। आखिर यह मस्जिद कितनी पुरानी है? इसे किसने बनवाया था? 1925 की चिट्ठी में क्या लिखा था और 1985 के सरकारी गजट में इसका क्या रिकॉर्ड मिलता है? आइए पूरा इतिहास समझते हैं।
शाही मस्जिद कितनी पुरानी है?
मस्जिद की उम्र को लेकर अलग-अलग दावे सामने आए हैं। मस्जिद प्रबंधन और उससे जुड़े पक्ष का दावा है कि इसका निर्माण 1390 के आसपास हुआ था। इस हिसाब से 2026 में इसकी उम्र करीब 636 साल बैठती है। हालिया रिपोर्टों में भी इस दावे का उल्लेख किया गया है। मौजूदा विवाद में सामने आए 1925 के दस्तावेज और 1985 के राजपत्र से 1390 में निर्माण की तारीख सीधे साबित नहीं होती। ये दस्तावेज यह दिखाते हैं कि मस्जिद उस समय मौजूद थी और सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज थी।
ऐतिहासिक सामग्री में मस्जिद को दिलावर खान के समय की जामा मस्जिद के रूप में भी दर्ज किया गया है। 15वीं शताब्दी के शुरुआती दौर के एक शिलालेख का संदर्भ मिलता है, जिसकी तारीख 1403-04 ईस्वी बताई गई है। इसलिए मस्जिद की उम्र पर बात करते समय 1390 के दावे और 1403-04 के ऐतिहासिक शिलालेख- दोनों संदर्भों को अलग-अलग समझना जरूरी है।
Ujjain’s Shahi Masjid: किसने बनवाई थी शाही मस्जिद?
शाही मस्जिद का इतिहास मालवा के मध्यकालीन इतिहास से जुड़ता है। ऐतिहासिक सामग्री के मुताबिक, उज्जैन की जामा मस्जिद का निर्माण दिलावर खान के काल में हुआ था। दिलावर खान ने मालवा में अपनी सत्ता स्थापित की थी और बाद में स्वतंत्र मालवा सल्तनत की नींव रखी। उपलब्ध ऐतिहासिक विवरण मस्जिद को उनके शासनकाल से जोड़ते हैं। मस्जिद के निर्माण को लेकर स्थानीय और प्रबंधन पक्ष की ओर से दिलावर खान गौरी का नाम भी लिया जाता है। हालांकि, यह कहना कि दिलावर खान ने व्यक्तिगत रूप से 1390 में मस्जिद बनवाई थी, उपलब्ध दस्तावेजों से सीधे स्थापित नहीं होता। इसलिए इस दावे को ऐतिहासिक संदर्भ और स्थानीय दावे के रूप में ही देखना ज्यादा सटीक है।
1925 की चिट्ठी में क्या दर्ज है?
मस्जिद की मौजूदा कानूनी लड़ाई में 17 मार्च 1925 का दस्तावेज सबसे महत्वपूर्ण संदर्भों में से एक है। मस्जिद प्रबंधन के अनुसार, यह पत्र तत्कालीन सिंधिया रियासत के अधीन ग्वालियर राज्य के टाउन इम्प्रूवमेंट ट्रस्ट से जुड़ा था। उस समय इलाके में भूमि अधिग्रहण और सड़क से जुड़े विकास कार्य हो रहे थे। मस्जिद पक्ष का कहना है कि इस दस्तावेज में भूमि अधिग्रहण के बाद मस्जिद के बचे हुए हिस्से को यथावत रखने का उल्लेख किया गया था। इसी दस्तावेज को आधार बनाकर यह तर्क दिया गया कि सड़क और विकास कार्यों के दौरान भी मस्जिद के अस्तित्व को रिकॉर्ड में मान्यता मिली थी। यानी 1925 का दस्तावेज मस्जिद के उस समय मौजूद होने का ऐतिहासिक सरकारी रिकॉर्ड है। लेकिन इससे अकेले यह साबित नहीं होता कि वर्तमान ढांचा 1390 में ही बना था।
Ujjain’s Shahi Masjid: 1985 के गजट में क्या लिखा है?
मस्जिद से जुड़े पक्ष ने एक और महत्वपूर्ण दस्तावेज का हवाला दिया है—13 सितंबर 1985 का मध्य प्रदेश शासन का राजपत्र (Gazette)। रिपोर्टों के मुताबिक, इस सरकारी गजट में शाही मस्जिद का उल्लेख और उसके स्थान तथा माप/क्षेत्रफल से संबंधित विवरण दर्ज होने की बात कही गई है। इस दस्तावेज का महत्व इसलिए बढ़ जाता है क्योंकि यह आजादी के बाद का आधिकारिक सरकारी रिकॉर्ड है। यानी 1985 में भी मस्जिद को सरकारी रिकॉर्ड में एक मौजूद संरचना के रूप में दर्ज किया गया था।
क्या मस्जिद पहले भी सड़क के लिए जमीन दे चुकी है?
मस्जिद प्रबंधन की ओर से यह भी दावा किया गया है कि अतीत में सड़क और यातायात व्यवस्था को बेहतर बनाने के लिए मस्जिद की कुछ जमीन प्रशासन को दी गई थी।मौजूदा रिपोर्टों में 1970 के दशक में जमीन दिए जाने का उल्लेख मिलता है, हालांकि अलग-अलग रिपोर्टों में वर्ष को लेकर अंतर दिखाई देता है। इसलिए इस तथ्य को मस्जिद प्रबंधन के दावे के रूप में देखना उचित है। मस्जिद पक्ष का तर्क है कि पहले भी विकास कार्यों में सहयोग किया गया था, लेकिन मौजूदा कार्रवाई में संरचना के हिस्से को हटाने से इमारत की मजबूती और धार्मिक उपयोग प्रभावित हो सकता है।

Ujjain’s Shahi Masjid: अब सड़क चौड़ीकरण को लेकर विवाद क्यों है?
वर्तमान विवाद का केंद्र कंठाल चौराहे से गोपाल मंदिर मार्ग का चौड़ीकरण है। प्रशासन की योजना के मुताबिक सड़क को चौड़ा किया जाना है और प्रस्तावित सड़क सीमा में शाही मस्जिद का कुछ हिस्सा आ रहा है। इसी हिस्से को हटाने की कार्रवाई को लेकर मस्जिद प्रबंधन और प्रशासन आमने-सामने हैं। मस्जिद प्रबंधन ने अदालत में दलील दी कि यह पुरानी धार्मिक संरचना है और इसके ऐतिहासिक दस्तावेज मौजूद हैं। दूसरी ओर, प्रशासन सड़क चौड़ीकरण परियोजना के तहत प्रस्तावित सीमा के अनुसार कार्रवाई कर रहा है।
हाईकोर्ट में क्या हुआ?
मस्जिद से जुड़े पक्ष ने मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर पीठ का रुख किया था। याचिकाओं में प्रशासन के नोटिस और प्रस्तावित कार्रवाई को चुनौती दी गई। 9 सितंबर 2026 को हाईकोर्ट की एकलपीठ ने याचिकाएं खारिज कर दीं। अदालत के रिकॉर्ड में मस्जिद को वक्फ संपत्ति के रूप में दर्ज किए जाने और याचिकाकर्ताओं की ओर से इसे प्राचीन संरचना बताए जाने जैसी दलीलों का उल्लेख है। इसके बाद इस फैसले को चुनौती देते हुए युगलपीठ में अपील का रास्ता अपनाया गया। हालिया रिपोर्टों के मुताबिक, इस मामले में आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी है।
Ujjain’s Shahi Masjid: क्या पूरी शाही मस्जिद हटाई जा रही है?
नहीं। विवाद सड़क चौड़ीकरण की जद में आ रहे मस्जिद के एक हिस्से को लेकर है।हालिया रिपोर्टों में सड़क चौड़ीकरण के लिए करीब 900 मीटर के मार्ग और 15 मीटर चौड़ाई की योजना का उल्लेख है। इसी प्रस्तावित सीमा में मस्जिद का कुछ हिस्सा आने की बात कही गई है। इसलिए “पूरी मस्जिद गिराई जा रही है” कहना मौजूदा विवाद को सही तरीके से पेश नहीं करेगा। मामला मुख्य रूप से सड़क के लिए प्रभावित होने वाले हिस्से और उससे जुड़े कानूनी व ऐतिहासिक दावों का है।
1390, 1403 या 1925- तीनों तारीखों का मतलब क्या?
इस पूरे विवाद को समझने के लिए तीन अलग-अलग तारीखों को एक साथ जोड़ना जरूरी है। 1390: मस्जिद प्रबंधन की ओर से निर्माण की बताई जाने वाली तारीख। इस दावे के आधार पर मस्जिद की उम्र करीब 636 साल बताई जाती है। 1403-04: ऐतिहासिक सामग्री में मस्जिद से जुड़े शिलालेख की तारीख का संदर्भ मिलता है और इसे दिलावर खान के समय की जामा मस्जिद से जोड़ा जाता है। 1925: सिंधिया रियासत के समय का वह दस्तावेज, जिसमें मस्जिद के बचे हिस्से को सुरक्षित रखने से संबंधित उल्लेख होने का दावा किया गया है। 1985: मध्य प्रदेश शासन के राजपत्र में मस्जिद और उसकी पैमाइश का उल्लेख होने का दावा। यानी उपलब्ध रिकॉर्ड से इतना स्पष्ट है कि मस्जिद कम से कम 1925 से सरकारी दस्तावेजों में दर्ज मौजूद संरचना है। वहीं इससे कहीं पुराने निर्माण की बात स्थानीय/मस्जिद प्रबंधन के दावों और ऐतिहासिक सामग्री से जुड़ती है।
Ujjain’s Shahi Masjid: शाही मस्जिद विवाद में असली सवाल क्या है?
मौजूदा विवाद सिर्फ मस्जिद की उम्र का सवाल नहीं है। असली कानूनी मुद्दा यह है कि सड़क चौड़ीकरण के लिए धार्मिक संरचना के प्रभावित हिस्से पर कार्रवाई किस प्रक्रिया के तहत की जा सकती है और संबंधित दस्तावेजों का उस कार्रवाई पर क्या प्रभाव पड़ता है। मस्जिद प्रबंधन 1925 के पत्र और 1985 के गजट को अपने पक्ष में महत्वपूर्ण दस्तावेज बता रहा है। प्रशासन की ओर से सड़क चौड़ीकरण और विकास परियोजना के तहत कार्रवाई की जा रही है। मामले पर अदालत में कानूनी प्रक्रिया जारी है।
उज्जैन की शाही मस्जिद का इतिहास मध्यकालीन मालवा से जुड़ता है और उपलब्ध ऐतिहासिक सामग्री इसे दिलावर खान के काल की जामा मस्जिद से जोड़ती है। मस्जिद प्रबंधन इसे 1390 से जोड़कर करीब 636 साल पुराना बताता है, जबकि मौजूदा विवाद में सामने आए सरकारी रिकॉर्ड कम से कम 1925 और 1985 में इसके अस्तित्व की पुष्टि करते हैं। यही पुराने दस्तावेज आज सड़क चौड़ीकरण के विवाद में भी महत्वपूर्ण हो गए हैं। अब इस मामले में आगे की न्यायिक कार्यवाही और उपलब्ध मूल दस्तावेज यह तय करने में अहम होंगे कि ऐतिहासिक दावों और वर्तमान विकास परियोजना के बीच कानूनी स्थिति क्या बनती है।
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