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गोमती की सफाई में फिर आया बड़ा मोड़, 45 नालों का खुला राज, 2017 से योगी सरकार ने कैसे बदली लखनऊ की ‘लाइफलाइन’ की लड़ाई?

एक तरफ प्रदूषित गोमती और खुले नाले, बीच में ड्रोन सर्वे/45 डिस्चार्ज पॉइंट, दूसरी तरफ STP और साफ नदी, साथ में निरीक्षण करते योगी।
UP News: लखनऊ की पहचान मानी जाने वाली गोमती को साफ करने की कोशिशें नई नहीं हैं, लेकिन इस बार सरकार का फोकस नदी के किनारे की खूबसूरती से आगे जाकर नदी में गंदा पानी पहुंचने के रास्ते को बंद करने पर है। ड्रोन सर्वे में गोमती में गिरने वाले 45 नालों की पहचान हुई है, जबकि पुराने नगर निकाय रिकॉर्ड में 33 नाले दर्ज थे। 12 नए डिस्चार्ज प्वाइंट सामने आने के बाद सीवेज प्रबंधन की योजना का दायरा भी बढ़ाया गया है। योगी सरकार ने 2026 के अंत तक गोमती को साफ करने का लक्ष्य सामने रखा है। इसके लिए नालों की टैपिंग, सीवेज का डायवर्जन, एसटीपी की क्षमता बढ़ाना और नदी के प्रवाह को बेहतर करना है तथा इन सबको एक साथ जोड़कर काम किया जा रहा है। लेकिन 45 नालों की खबर समझने के लिय एक दशक पीछे जाना होगा।
2017 से पहले गोमती पर करोड़ों खर्च हुए, फिर भी सीवेज की समस्या बनी रही
गोमती की सफाई के लिए योगी सरकार से पहले भी कई योजनाएं चली थीं। केंद्र के पर्यावरण मंत्रालय की रिपोर्ट में Gomti Action Plan-I के तहत लखनऊ, सुल्तानपुर और जौनपुर में प्रदूषण नियंत्रण के काम का उल्लेख है। इस चरण में 42 एमएलडी एसटीपी क्षमता बनाई गई थी और दूसरे चरण में लखनऊ के लिए 375 एमएलडी अतिरिक्त एसटीपी क्षमता का प्रस्ताव था। लेकिन 2017 तक समस्या पूरी तरह खत्म नहीं हुई थी। जनवरी 2017 की एक रिपोर्ट के अनुसार लखनऊ में रोज करीब 675 एमएलडी सीवेज पैदा हो रहा था, जिसमें लगभग 401 एमएलडी एसटीपी तक पहुंचाया जा रहा था और बाकी करीब 274 एमएलडी बिना उपचार के गोमती में जाने की स्थिति में था। उस समय शहर में 33 नाले दर्ज थे और सात नाले ऐसे बताए गए थे जिन्हें एसटीपी से जोड़ना बाकी था। अप्रैल 2017 की रिपोर्ट में भी गोमती में 28 नालों से सीवेज पहुंचने की बात सामने आई थी। यानी योजनाएं और खर्च होने के बावजूद नदी में प्रदूषण का मूल स्रोत पूरी तरह बंद नहीं हुआ था।
UP News: पिछली सरकार का फोकस क्या था और 2017 के बाद दिशा कैसे बदली?
2017 में सत्ता परिवर्तन के समय गोमती रिवरफ्रंट परियोजना भी अधूरी थी। मार्च 2017 में तत्कालीन निरीक्षण के दौरान अधिकारियों ने बताया था कि करीब ₹1,500 करोड़ के आवंटन में से 95 प्रतिशत खर्च हो चुका था, जबकि लगभग 60 प्रतिशत काम पूरा हुआ था। इसके बाद योगी आदित्यनाथ ने परियोजना की समीक्षा और जांच के निर्देश दिए तथा नालों से आने वाले सीवेज को रोकने को प्राथमिकता देने की बात कही। यहीं से दोनों दौर के काम के तरीके में अंतर को समझा जा सकता है। पहले की बड़ी परियोजनाओं में रिवरफ्रंट, नदी का चैनलाइजेशन और सौंदर्यीकरण प्रमुख हिस्सा था। वहीं योगी सरकार के दौर में रणनीति का एक बड़ा हिस्सा सीवेज कहां से आ रहा है, उसे कैसे रोका जाए और किस एसटीपी तक पहुंचाया जाए इस पर केंद्रित हुआ।
गोमती सफाई की प्रक्रिया में नाला, इंटरसेप्टर पाइप, STP, शोधित पानी और ड्रोन सर्वे
नाले से STP और फिर गोमती तक सफाई का पूरा मॉडल दर्शाती AI तस्वीर
अब 33 नहीं, 45 नालों की निगरानी
2026 के ड्रोन सर्वे ने मौजूदा योजना के सामने एक नई चुनौती रखी। पुराने रिकॉर्ड में 33 नाले थे, लेकिन ड्रोन सर्वे में 45 नाले सामने आए। यानी नदी में प्रदूषण रोकने के लिए केवल पुराने रिकॉर्ड पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं था। नए डिस्चार्ज प्वाइंट्स को भी योजना में शामिल करना पड़ा। यही वजह है कि अब योजना में इंटरसेप्शन एंड डायवर्जन यानी नाले के पानी को सीधे नदी में जाने से रोककर उसे सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट तक ले जाने पर जोर है। सरल भाषा में समझें तो लक्ष्य नदी के पानी को बाद में साफ करने से ज्यादा पहले यह है कि गंदा पानी नदी में पहुंचे ही नहीं।
UP News: कितने एसटीपी काम कर रहे हैं, कितने नए बन रहे हैं?
उत्तर प्रदेश जल जीवन मिशन के मौजूदा रिकॉर्ड में गोमती से जुड़े कई एसटीपी दर्ज हैं। लखनऊ में 345 एमएलडी भारवारा एसटीपी और 56 एमएलडी दौलतगंज एसटीपी जैसे पुराने संयंत्र मौजूद हैं। इसके अलावा 37.5 एमएलडी और 6.5 एमएलडी के संयंत्र भी रिकॉर्ड में हैं। लेकिन सिर्फ पुराने प्लांट पर्याप्त नहीं माने जा रहे। मौजूदा परियोजनाओं में गोमती प्रदूषण नियंत्रण के अलग-अलग चरणों के तहत नए एसटीपी और नालों की टैपिंग शामिल है। जल जीवन मिशन के रिकॉर्ड के मुताबिक लखनऊ में गोमती से जुड़े निर्माणाधीन कार्यों में कुल 352.5 एमएलडी क्षमता वाली पांच परियोजनाएं दर्ज हैं। इनमें 100 एमएलडी, 50 एमएलडी और 42.5 एमएलडी के प्रदूषण नियंत्रण कार्यों के साथ 160 एमएलडी की व्यापक कार्ययोजना भी शामिल है। इनमें से सभी परियोजनाओं को पूरा हुआ मानना सही नहीं होगा। कई काम निर्माण, निविदा या स्वीकृति की अलग-अलग अवस्थाओं में हैं।
कुछ नाले अब सीधे एसटीपी से जुड़े, कुछ अभी बाकी
सरकारी रिकॉर्ड में कई नालों को पहले ही एसटीपी से जोड़े जाने की जानकारी है। मोहिनीपुरवा, चाइना बाजार, दल्लीगंज, जियामऊ, जोपलिंग रोड और मोहन मीकिन जैसे नालों को मौजूदा एसटीपी से जोड़ा गया है। वहीं कुछ नाले अभी आंशिक रूप से टैप हैं और कुछ के लिए नए एसटीपी प्रस्तावित हैं। उदाहरण के लिए वजीरगंज नाले के लिए 65 एमएलडी एसटीपी प्रस्तावित है, जबकि कुछ दूसरे नालों में इंटरसेप्शन का काम अभी पूरा नहीं हुआ है। यानी तस्वीर यह नहीं है कि गोमती के सारे नाले अब पूरी तरह बंद हो चुके हैं। बल्कि सरकार एक ऐसे चरण में है जहां पहचान से लेकर टैपिंग, एसटीपी, उपचार और नदी में प्रवाह की पूरी श्रृंखला को पूरा करने की कोशिश चल रही है।
UP News: 2026 में योजना पहले से ज्यादा व्यापक क्यों हुई?
इसका एक कारण लखनऊ का लगातार फैलता शहर भी है। गोमती लखनऊ के भीतर करीब 30 किलोमीटर का रास्ता तय करती है। शहर के फैलने के साथ सीवेज की मात्रा और नए इलाकों से आने वाले डिस्चार्ज भी बढ़ते हैं। इसलिए पुराने रिकॉर्ड में दर्ज नालों के आधार पर बनी योजना समय के साथ अधूरी पड़ सकती है। ड्रोन सर्वे से नए नालों की पहचान इसी समस्या का उदाहरण है। अब सरकार की कोशिश है कि नदी के पूरे शहरी हिस्से को एक साथ देखा जाए और केवल किसी एक घाट या रिवरफ्रंट को सुंदर बनाने के बजाय पूरे सीवेज नेटवर्क को नदी संरक्षण से जोड़ा जाए।
गोमती के लिए सिर्फ सफाई नहीं, प्रवाह भी जरूरी
गोमती की समस्या केवल गंदे पानी की नहीं है। नदी का प्राकृतिक प्रवाह भी उसकी पारिस्थितिकी के लिए महत्वपूर्ण है। इसीलिए मौजूदा पुनर्जीवन रणनीति में सीवेज रोकने के साथ नदी के प्रवाह को बेहतर करने की बात भी शामिल है। सरकार की व्यापक नदी संरक्षण रणनीति में प्रदूषण नियंत्रण और नदी के पर्यावरणीय स्वास्थ्य को साथ लेकर चलने पर जोर है। इसका मतलब है कि नदी को केवल साफ दिखाना लक्ष्य नहीं है। नदी में साफ पानी पहुंचे, उसका प्रवाह बना रहे और शहरी सीवेज उसका प्रमुख प्रदूषण स्रोत न बने और यही ज्यादा बड़ी चुनौती है।
UP News: 2017 से अब तक: गोमती की लड़ाई में क्या बदला?
गोमती पर पहले भी योजनाएं थीं और एसटीपी भी थे। इसलिए 2017 को ऐसा मोड़ बताना सही नहीं होगा जहां से पहली बार नदी की सफाई शुरू हुई। लेकिन उपलब्ध रिकॉर्ड से एक महत्वपूर्ण अंतर जरूर दिखाई देता है। योगी सरकार के दौर  से पहले Gomti Action Plan, एसटीपी और रिवरफ्रंट जैसी परियोजनाएं चल रही थीं, लेकिन 2017 तक लखनऊ के सीवेज का एक बड़ा हिस्सा उपचार से बाहर था और कई नाले सीधे नदी को प्रभावित कर रहे थे। वहीं 2017 के बाद योगी सरकार ने अधूरे रिवरफ्रंट काम की समीक्षा के साथ सीवेज इंटरसेप्शन, ड्रेन टैपिंग और एसटीपी क्षमता को ज्यादा केंद्रीय मुद्दा बनाया। 2026 में ड्रोन सर्वे से नए नालों की पहचान कर योजना को और विस्तृत किया गया। परिणामस्वरूप आज कई नाले एसटीपी से जुड़े हैं, कुछ आंशिक रूप से जुड़े हैं और कई नए एसटीपी/इंटरसेप्शन परियोजनाएं निर्माण या निविदा की अवस्था में हैं। यानी गोमती की कहानी सिर्फ सौंदर्यीकरण से सीवेज प्रबंधन की ओर बढ़ती प्राथमिकता की कहानी भी है।
अब 2026 के अंत तक क्या हासिल करना है?
योगी सरकार ने 2026 के अंत तक गोमती को साफ करने का लक्ष्य रखा है। लेकिन इस लक्ष्य तक पहुंचने के लिए केवल नदी किनारे सफाई अभियान पर्याप्त नहीं होगा। 45 नालों की पहचान के बाद सबसे महत्वपूर्ण काम होगा—हर बड़े डिस्चार्ज प्वाइंट को प्रभावी ढंग से टैप करना, सीवेज को एसटीपी तक पहुंचाना, एसटीपी की क्षमता और संचालन सुनिश्चित करना और उपचारित पानी के बाद नदी की गुणवत्ता की लगातार निगरानी करना। यही वजह है कि आने वाले महीनों में गोमती की असली तस्वीर केवल नदी के किनारे से नहीं, बल्कि नालों और एसटीपी के आउटलेट से भी दिखाई देगी।
UP News: गोमती की कहानी अब घाट से आगे निकल चुकी है
लखनऊ की गोमती को लेकर पिछले वर्षों में करोड़ों रुपये की परियोजनाएं बनीं, रिवरफ्रंट तैयार हुआ और नदी की सफाई के कई प्रयास हुए। लेकिन 2017 में भी सवाल यही था कि जब तक शहर का गंदा पानी नदी में जाता रहेगा, तब तक केवल किनारे को सुंदर बनाने से नदी कैसे साफ होगी। आज सरकार उसी मूल समस्या को दूसरे तरीके से पकड़ने की कोशिश कर रही है जिसमे की नदी में पहुंचने वाले गंदे पानी का रास्ता बंद किया जा रहा है। 45 नालों की नई पहचान इसी कहानी का सबसे ताजा अध्याय है। अब 2026 के अंत तक तय लक्ष्य कितना पूरा होता है, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि पहचान किए गए हर डिस्चार्ज प्वाइंट को कितनी तेजी से और कितनी प्रभावी तरह से सीवेज व्यवस्था से जोड़ा जाता है। गोमती की अगली तस्वीर इसलिए सिर्फ साफ पानी की नहीं होगी। वह यह भी बताएगी कि लखनऊ ने अपनी नदी को साफ करने के लिए उसके किनारे को बदला या उसके पीछे पूरा सीवेज सिस्टम।

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