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योगी सरकार में 2.5 करोड़ किसान अब डिजिटल, कर्ज माफी से फार्मर रजिस्ट्री तक कैसे बदला खेती का मॉडल?

यूपी किसान: पारंपरिक खेती से डिजिटल कृषि तक
यूपी किसान: पारंपरिक खेती से डिजिटल कृषि तक

UP News: उत्तर प्रदेश में किसान की पहचान अब सिर्फ खेत और खसरे के कागजों तक सीमित नहीं रहने वाली है। प्रदेश में 2.5 करोड़ से ज्यादा किसानों का फार्मर रजिस्ट्री में पंजीकरण हो चुका है और रामपुर, गाजियाबाद तथा मुरादाबाद ने अपने निर्धारित लक्ष्य का 100 प्रतिशत पूरा कर लिया है। योगी सरकार अब किसान, उसकी जमीन और फसल से जुड़े आंकड़ों को एक डिजिटल व्यवस्था में जोड़ने की दिशा में आगे बढ़ रही है। यह बदलाव इसलिए बड़ा है क्योंकि यूपी की कृषि कहानी अब सिर्फ खाद, बीज, सिंचाई और मंडी तक सीमित नहीं रह गई है। पिछले वर्षों में सरकार ने किसान कर्जमाफी से लेकर फसल खरीद, गन्ना भुगतान, फसल बीमा, सोलर पंप, मंडियों के डिजिटलीकरण और अब फार्मर रजिस्ट्री तक कई स्तरों पर व्यवस्था बदलने की कोशिश की है। लेकिन इस पूरी कहानी को समझने के लिए यह देखना भी जरूरी है कि 2017 से पहले स्थिति क्या थी और उसके बाद क्या बदला।

2.5 करोड़ किसानों की डिजिटल एंट्री, अब खेती का डेटा भी जुड़ेगा
फार्मर रजिस्ट्री को केंद्र की एग्री स्टैक व्यवस्था से जोड़ा जा रहा है। इसका उद्देश्य किसान की डिजिटल पहचान को उसकी जमीन और फसल संबंधी जानकारी से जोड़ना है, ताकि भविष्य में सरकारी योजनाओं और कृषि सेवाओं की पहचान तथा पहुंच ज्यादा लक्षित तरीके से हो सके। यूपी में अब तक 2,50,81,576 किसानों का पंजीकरण होने की जानकारी सामने आई है। यह केंद्र द्वारा निर्धारित 2,88,70,495 के लक्ष्य का करीब 86.88 प्रतिशत है। 92,853 गांवों की जियो-रेफरेंसिंग पूरी होने के साथ सरकार आगे चलकर उत्पादन अनुमान, बाजार की जानकारी और कृषि संबंधी निर्णयों में डेटा और AI के इस्तेमाल की दिशा में भी बढ़ रही है। यानी किसान की सरकारी पहचान अब धीरे-धीरे कागज से डेटा और डेटा से डिजिटल सेवा की तरफ जा रही है।
लेकिन यह बदलाव अचानक नहीं आया
आज फार्मर रजिस्ट्री की खबर सामने है, लेकिन योगी सरकार के किसान-केंद्रित फैसलों की शुरुआत 2017 में सरकार बनने के तुरंत बाद ही हो गई थी। उत्तर प्रदेश सरकार के आधिकारिक संकलन के अनुसार पहली कैबिनेट बैठक में 86 लाख से अधिक लघु और सीमांत किसानों के करीब ₹36 हजार करोड़ के फसल ऋण मोचन का फैसला किया गया था। इसके बाद सरकार ने कृषि खरीद और भुगतान की व्यवस्था पर भी जोर दिया। यहां 2012-17 और 2017 के बाद की तुलना सरकार के अपने विधानसभा दस्तावेज में खास तौर पर सामने आती है।
UP News: 2012-17 और 2017 के बाद: धान खरीद में कितना अंतर?
उत्तर प्रदेश सरकार के 2025 के विधानसभा दस्तावेज के मुताबिक 2012 से 2017 के बीच 14.87 लाख किसानों से 123 लाख मीट्रिक टन धान खरीदा गया था, जबकि 2017 से 2024 के बीच 69.83 लाख किसानों से 456.86 लाख मीट्रिक टन धान की खरीद हुई। इसी अवधि में किसानों को धान खरीद के बदले ₹88,746 करोड़ का भुगतान सीधे बैंक खातों में किए जाने का सरकारी आंकड़ा दिया गया है। सरकार के अनुसार यह भुगतान 2012-17 की तुलना में करीब पांच गुना था। यहां एक महत्वपूर्ण बदलाव भुगतान के तरीके में भी था जिसमे सरकार ने खरीद के बाद राशि को सीधे बैंक खाते में भेजने पर जोर दिया। यानी किसान नीति का एक बड़ा हिस्सा खेत से मंडी और मंडी से सीधे बैंक खाते तक पहुंचाने की व्यवस्था पर केंद्रित रहा।
यूपी किसान की कृषि यात्रा, सिंचाई, सोलर पंप, डिजिटल मंडी, DBT, फसल बीमा, कर्ज राहत और Farmer Registry
यूपी किसान: पारंपरिक खेती से डिजिटल कृषि तक
गन्ना किसान: भुगतान की लंबी कहानी
उत्तर प्रदेश में किसान की चर्चा गन्ने के बिना अधूरी है। प्रदेश देश के सबसे बड़े गन्ना उत्पादक राज्यों में है और लाखों किसान सीधे चीनी मिलों से जुड़े हैं। उत्तर प्रदेश सरकार के उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार योगी सरकार के कार्यकाल में गन्ना किसानों को ₹2.80 लाख करोड़ से ज्यादा का भुगतान किया गया है। गन्ना भुगतान को लेकर योगी सरकार ने चीनी मिलों पर बकाया भुगतान की निगरानी, ऑनलाइन व्यवस्था और भुगतान प्रक्रिया को लेकर लगातार कदम उठाए हैं।
UP News: फसल खराब हुई तो बीमा का सहारा
किसान के लिए सबसे बड़ा जोखिम केवल बाजार भाव नहीं, बल्कि मौसम और फसल खराब होना भी है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के तहत उत्तर प्रदेश में 58.07 लाख किसानों को ₹47,535 करोड़ की क्षतिपूर्ति दिए जाने की जानकारी है। इसके साथ मुख्यमंत्री कृषक दुर्घटना कल्याण योजना भी लागू की गई, जिसमें किसानों और उनके परिवारों को दुर्घटना की स्थिति में आर्थिक सहायता देने का प्रावधान है। यानी कृषि नीति का एक हिस्सा फसल उत्पादन बढ़ाने से आगे बढ़कर जोखिम कम करने पर भी केंद्रित हुआ।
सिंचाई में डीजल से सोलर तक का रास्ता
खेती की लागत का एक बड़ा हिस्सा सिंचाई से जुड़ा है। इसी वजह से सौर पंप और सस्ती सिंचाई को लेकर भी सरकार ने योजनाएं बढ़ाईं। सरकारी आंकड़ों में प्रधानमंत्री कुसुम योजना के तहत 76 हजार से ज्यादा किसानों को सोलर पंप दिए जाने का उल्लेख है। इसके अलावा सरकार ने निजी नलकूपों के लिए भी बिजली व्यवस्था को बढ़ावा दिया। सरकारी दस्तावेज में करीब 14 लाख निजी नलकूपों को मुफ्त बिजली उपलब्ध कराने की जानकारी दी गई है। इसका सीधा संबंध खेती की लागत से है क्योंकि सिंचाई जितनी सस्ती होगी, फसल की लागत पर उतना ही असर पड़ेगा।
UP News: किसान अब मंडी में भी डिजिटल हो रहा है
कृषि उपज बेचने की व्यवस्था में भी बदलाव किया गया है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार प्रदेश की 125 मंडियों में जनवरी 2025 तक करीब ₹6,999 करोड़ का डिजिटल व्यापार हुआ। किसानों के लिए हजारों ई-लाइसेंस जारी किए गए और करोड़ों ऑनलाइन पर्चियां भी जारी होने की जानकारी दी गई है। 27 मंडियों के आधुनिकीकरण और 85 ग्रामीण हाट बाजारों के निर्माण का भी सरकारी रिकॉर्ड है। इसका मतलब यह है कि किसान की कहानी अब केवल उत्पादन तक सीमित नहीं है। उत्पादन से शुरू होती श्रंखला मंडी, भुगतान, बैंक से होते हुए डिजिटल रिकॉर्ड तक पहुंचाने कि कोशिश योगी सरकार द्वारा कि गई है ।
2017 के बाद कृषि क्षेत्र में एक और बदलाव: तकनीक
कृषि में तकनीक का इस्तेमाल भी तेजी से बढ़ा है। ड्रोन के इस्तेमाल को बढ़ावा देने के लिए कृषि उत्पादक संगठनों और कृषि स्नातकों को 40 से 50 प्रतिशत तक अनुदान देने की जानकारी सरकारी दस्तावेजों में है। वहीं अब फार्मर रजिस्ट्री के साथ AI आधारित उत्पादन अनुमान और बाजार संबंधी जानकारी इस्तेमाल करने की दिशा में काम किया जा रहा है। यानी खेत में तकनीक का इस्तेमाल सिर्फ ड्रोन तक नहीं, बल्कि डेटा और AI तक पहुंच रहा है। अब किसान की पहचान सिर्फ खेत से नहीं, डिजिटल रिकॉर्ड से भी होगी और यही आज की फार्मर रजिस्ट्री  के मुद्दे को महत्वपूर्ण बनाता है। अब तक किसान की पहचान उसके कागजात, खतौनी, बैंक खाते और अलग-अलग योजनाओं के रिकॉर्ड में बिखरी रहती थीऔर अब फार्मर रजिस्ट्री का लक्ष्य इन जानकारियों को एक डिजिटल ढांचे से जोड़ना है। केंद्र सरकार के अनुसार Farmer ID को PM-KISAN, किसान क्रेडिट कार्ड, एमएसपी आधारित खरीद और अन्य किसान सेवाओं से जोड़ने की दिशा में काम हो रहा है। यूपी में 2.5 करोड़ से ज्यादा किसानों का पंजीकरण इसी बड़े बदलाव की तरफ इशारा करता है।
UP News: 2017 से पहले और अब: किसान के लिए क्या बदला?
किसान से जुड़े हर क्षेत्र में एक जैसी तुलना उपलब्ध नहीं है, लेकिन जहां सरकारी आंकड़े तुलनीय आधार देते हैं, वहां अंतर साफ दिखाई देता है कि योगी सरकार के काल में  किसान कल्याण कार्य  मे विकास और उन्नति देखने को मिली है। धान खरीद में 2012-17 के मुकाबले 2017-24 के दौरान खरीदी गई मात्रा और किसानों की संख्या में बड़ा अंतर सरकारी आंकड़ों में दर्ज है। फसल ऋण मोचन, बड़े पैमाने पर DBT, फसल बीमा, सोलर पंप, मंडियों के डिजिटलीकरण और अब फार्मर रजिस्ट्री इन सभी को मिलाकर सरकार ने किसान नीति को कई स्तरों पर विस्तारित किया है। यह भी ध्यान रखना जरूरी है कि इनमें कई योजनाएं केंद्र और राज्य दोनों की भागीदारी से चलती हैं। फिर भी उत्तर प्रदेश सरकार के अपने आंकड़े बताते हैं कि योगी सरकार के दौरान किसान कल्याण पर खर्च, खरीद, DBT, सिंचाई और डिजिटल कृषि के स्तर पर बड़े पैमाने पर कार्यक्रम चलाए गए।
अब अगली लड़ाई खेत से डेटा तक
आज यूपी में योगी सरकार के कार्यकाल मे 2.5 करोड़ से ज्यादा किसान डिजिटल रजिस्ट्री में आ चुके हैं। तीन जिले अपने लक्ष्य का 100 प्रतिशत पूरा कर चुके हैं और बाकी जिलों को भी इस व्यवस्था में लाने का काम जारी है। अब अगली चुनौती केवल रजिस्ट्रेशन पूरा करना नहीं है। असली सवाल यह होगा कि इस डेटा से किसान को समय पर बीमा, सही फसल सलाह, आसान ऋण, बेहतर बाजार जानकारी और सरकारी योजनाओं का लक्षित लाभ मिले । यूपी के किसान की कहानी पिछले वर्षों में कर्जमाफी और खरीद से आगे बढ़कर सिंचाई, बीमा, सोलर ऊर्जा, डिजिटल मंडी और अब फार्मर  रजिस्ट्री तक पहुंच चुकी है। आज की 2.5 करोड़ से ज्यादा डिजिटल किसान पहचान इसी लंबी यात्रा का नया अध्याय है। और आने वाले समय में शायद सबसे बड़ा बदलाव यही होगा कि सरकार किसान तक योजना पहुंचाने के लिए केवल उसके कागज नहीं, बल्कि उसके खेत और फसल से जुड़े डिजिटल आंकड़ों का भी इस्तेमाल करेगी।

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