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अभय सिंह की BJP में एंट्री, खब्बू तिवारी का क्या होगा? गोसाईगंज में किसका कटेगा टिकट?

UP Politics Explainer: अयोध्या की गोसाईगंज विधानसभा सीट पर बीजेपी में अभय सिंह की एंट्री से नए सियासी समीकरणों की चर्चा शुरू हो गई है। 2017 में खब्बू तिवारी ने अभय सिंह को हराया था, जबकि 2022 में अभय सिंह ने खब्बू तिवारी की पत्नी आरती तिवारी को शिकस्त दी। अब दोनों नेताओं के एक ही पार्टी में आने की स्थिति में सबसे बड़ा सवाल यही है कि 2027 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी किस पर दांव लगाएगी?

भाजपा शामिल हो सकते है अभय सिंह 

उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले दलों और नेताओं के बीच सियासी समीकरण बदलने लगे हैं। अयोध्या जिले की गोसाईगंज सीट भी इसी वजह से चर्चा में है। समाजवादी पार्टी से निष्कासित विधायक अभय सिंह के 14 अक्टूबर को बीजेपी में शामिल होने की खबर है। उनके साथ गौरीगंज के विधायक राकेश प्रताप सिंह के भी बीजेपी में आने की बात सामने आई है। ऐसे में गोसाईगंज में बीजेपी के सामने संभावित उम्मीदवारों को लेकर चर्चा तेज होना स्वाभाविक है।

इस पूरे घटनाक्रम में दो नाम सबसे ज्यादा चर्चा में हैं- अभय सिंह और पूर्व विधायक इंद्र प्रताप तिवारी उर्फ खब्बू तिवारी। दोनों का गोसाईगंज में पहले भी चुनावी मुकाबला हो चुका है। ऐसे में बीजेपी में अभय सिंह की एंट्री केवल पार्टी बदलने का मामला नहीं, बल्कि सीट पर पुराने राजनीतिक समीकरणों के नए सिरे से बनने का सवाल भी है।

UP Politics Explainer: 2012 से 2022 तक: गोसाईगंज में दोनों नेताओं की टक्कर

गोसाईगंज विधानसभा सीट पर पिछले तीन चुनावों के नतीजे बताते हैं कि अभय सिंह और खब्बू तिवारी का राजनीतिक मुकाबला लंबे समय से चर्चा में रहा है। 2012 के विधानसभा चुनाव में अभय सिंह समाजवादी पार्टी के टिकट पर विधायक बने। 2017 में बीजेपी के टिकट पर चुनाव लड़े खब्बू तिवारी ने उन्हें हरा दिया। इसके बाद 2022 के चुनाव में मुकाबले ने फिर करवट ली। इस बार अभय सिंह ने जीत दर्ज की, जबकि बीजेपी ने खब्बू तिवारी की पत्नी आरती तिवारी को उम्मीदवार बनाया था।

इस तरह गोसाईगंज में दोनों नेताओं के बीच मुकाबला केवल एक चुनाव तक सीमित नहीं रहा। एक चुनाव में खब्बू तिवारी आगे रहे, तो अगले चुनाव में अभय सिंह ने बाजी पलट दी। यही पुराना रिकॉर्ड अब बीजेपी के संभावित टिकट को लेकर चर्चा की बड़ी वजह है।

2022 में कितने वोटों से हारी थीं आरती तिवारी?

2022 के विधानसभा चुनाव के आंकड़े इस मुकाबले को और स्पष्ट करते हैं। समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार अभय सिंह को 1,05,863 वोट मिले थे, जबकि बीजेपी की आरती तिवारी को 92,784 वोट मिले। दोनों के बीच जीत का अंतर 13,079 वोट था। बहुजन समाज पार्टी के राम सागर वर्मा 37,271 वोट के साथ तीसरे स्थान पर रहे।

खब्बू तिवारी उस चुनाव में खुद उम्मीदवार नहीं थे। उन्हें 2021 में फर्जी मार्कशीट मामले में जेल भेजे जाने के बाद बीजेपी ने उनकी पत्नी आरती तिवारी को टिकट दिया था। स्थानीय राजनीतिक चर्चा में यह भी कहा जाता रहा कि यदि खब्बू तिवारी खुद चुनाव लड़ते, तो नतीजा अलग हो सकता था। लेकिन यह एक राजनीतिक अनुमान है, जिसे चुनावी आंकड़ों से साबित नहीं किया जा सकता।

UP Politics Explainer
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अब सवाल यह है कि बीजेपी 2022 के नतीजों को किस नजरिए से देखेगी। क्या पार्टी अभय सिंह की पिछली जीत और क्षेत्र में उनके प्रभाव को प्राथमिकता देगी, या खब्बू तिवारी के पुराने संगठनात्मक आधार और समर्थकों को ध्यान में रखेगी? इसका जवाब पार्टी के उम्मीदवार चयन के समय ही सामने आएगा।

UP Politics Explainer: खब्बू तिवारी की दावेदारी कितनी मजबूत मानी जाती है?

खब्बू तिवारी की राजनीति का एक अहम पहलू उनका स्थानीय नेटवर्क और समर्थकों के बीच उनकी पहचान है। वरिष्ठ पत्रकारों का कहना है कि उन्हें ब्राह्मण समाज के युवाओं के बीच प्रभाव रखने वाला नेता बताया गया है। रिपोर्ट के अनुसार, उनका प्रभाव केवल गोसाईगंज तक सीमित नहीं माना जाता, बल्कि आसपास की कुछ सीटों पर भी उनके समर्थक सक्रिय हैं।

हालांकि, किसी नेता की लोकप्रियता और चुनाव में मिलने वाले वोट एक ही बात नहीं हैं। उम्मीदवार की छवि, पार्टी का संगठन, स्थानीय मुद्दे, गठबंधन, चुनावी माहौल और प्रतिद्वंद्वी की ताकत भी नतीजों को प्रभावित करते हैं। इसलिए खब्बू तिवारी के समर्थकों का आधार उनकी दावेदारी का एक पहलू हो सकता है । बीजेपी के लिए चुनौती यह भी होगी कि वह स्थानीय नेताओं और कार्यकर्ताओं के बीच संतुलन कैसे बनाए। यदि एक ही सीट पर दो प्रभावशाली नेता दावेदारी करते हैं, तो पार्टी को यह देखना पड़ सकता है कि किस उम्मीदवार के साथ चुनावी समीकरण अधिक अनुकूल बन सकते हैं।

क्या अभय सिंह के साथ सपा का वोट बैंक भी बीजेपी में जाएगा?

अभय सिंह के बीजेपी में आने से जुड़ा एक बड़ा सवाल यह भी है कि क्या उनके साथ समाजवादी पार्टी के मतदाता भी बीजेपी की ओर चले जाएंगे। इसका सीधा जवाब देना मुश्किल है। किसी नेता के पार्टी बदलने का मतलब यह नहीं होता कि उसके पुराने दल के सभी समर्थक भी नई पार्टी के साथ चले जाएं। मतदाता अपने स्थानीय अनुभव, उम्मीदवार से संबंध, पार्टी की विचारधारा और दूसरे राजनीतिक मुद्दों के आधार पर फैसला करते हैं। 2022 में अभय सिंह को 1,05,863 वोट मिले थे। लेकिन इन सभी वोटों को उनका व्यक्तिगत वोट बैंक मान लेना सही नहीं होगा। इसी तरह यह भी तय नहीं है कि पार्टी बदलने के बाद उनके सभी पुराने समर्थक बीजेपी को ही वोट देंगे।

यहां बीजेपी के सामने दोहरी चुनौती हो सकती है। उसे अभय सिंह के व्यक्तिगत प्रभाव का लाभ लेने की संभावना देखनी होगी, साथ ही अपने पुराने समर्थकों के बीच तालमेल भी बनाए रखना होगा। दूसरी ओर, समाजवादी पार्टी के लिए भी यह देखना अहम होगा कि क्षेत्र में उसका संगठन और पारंपरिक समर्थक किस तरह प्रतिक्रिया देते हैं।

UP Politics Explainer: जातीय समीकरण कितना असर डाल सकते हैं?

गोसाईगंज की राजनीति में जातीय समीकरणों की चर्चा भी होती रही है। वरिष्ठ पत्रकार आनंद मोहन के विश्लेषण के मुताबिक, निषाद, कुर्मी और यादव मतदाताओं की भूमिका के साथ ब्राह्मण मतदाताओं का प्रभाव भी महत्वपूर्ण है। हालांकि, किसी जाति का पूरा वोट एक उम्मीदवार या पार्टी को मिलने की धारणा बनाना सही नहीं होगा।

जातीय समीकरण चुनावी विश्लेषण का एक पहलू हैं, लेकिन इनके आधार पर नतीजे तय नहीं किए जा सकते। उम्मीदवार की स्थानीय पकड़, क्षेत्र के विकास से जुड़े सवाल, पार्टी की छवि, चुनाव प्रचार और मतदाताओं की प्राथमिकताएं भी असर डालती हैं।अभय सिंह की पार्टी बदलने के बाद बीजेपी के लिए यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि उनके समर्थक और पार्टी के पुराने मतदाता किस तरह तालमेल बैठाते हैं। खब्बू तिवारी की अपनी राजनीतिक पहचान है, जबकि अभय सिंह का पिछला चुनावी प्रदर्शन उनके पक्ष में एक महत्वपूर्ण तथ्य है। लेकिन इन दोनों पहलुओं से अपने आप यह तय नहीं होता कि टिकट किसे मिलेगा या कौन चुनाव जीतेगा।

एक कार्यक्रम में आमने-सामने दिखे दोनों नेता, क्या बदलेगा समीकरण?

बीजेपी नेता हरीश द्विवेदी की मां के अंतिम संस्कार में अभय सिंह और खब्बू तिवारी के एक ही कार्यक्रम में आमने-सामने बैठने की तस्वीरों के बाद स्थानीय राजनीतिक हलकों में चर्चा हुई। हालांकि, किसी कार्यक्रम में दोनों नेताओं की मौजूदगी को आपसी सहमति या राजनीतिक समझौते का प्रमाण नहीं माना जा सकता।

बीजेपी में शामिल होने के बाद अभय सिंह और खब्बू तिवारी के बीच किस तरह का राजनीतिक तालमेल बनता है, यह आगे की गतिविधियों से ही स्पष्ट होगा। पार्टी संगठन दोनों नेताओं की भूमिका तय करता है या दोनों अलग-अलग तरीके से काम करते हैं, इस पर भी नजर रहेगी।

UP Politics Explainer: आखिर गोसाईगंज से किसे मिलेगा बीजेपी का टिकट?

फिलहाल गोसाईगंज में टिकट को लेकर किसी अंतिम फैसले का दावा करना जल्दबाजी होगी। अभय सिंह के पास 2022 में जीत दर्ज करने का रिकॉर्ड है। दूसरी ओर, खब्बू तिवारी 2017 में इस सीट से विधायक रह चुके हैं और उनकी स्थानीय राजनीतिक पहचान भी है।

बीजेपी के सामने सवाल सिर्फ यह नहीं होगा कि किस नेता ने पहले चुनाव जीता है। पार्टी को यह भी देखना होगा कि कौन उम्मीदवार अपने संगठन, समर्थकों और क्षेत्रीय समीकरणों को एक साथ साध सकता है। साथ ही, दोनों नेताओं के बीच तालमेल और पुराने समर्थकों की प्रतिक्रिया भी महत्वपूर्ण हो सकती है।

फिलहाल इतना तय है कि अभय सिंह की बीजेपी में एंट्री से गोसाईगंज की राजनीति में चर्चा का नया दौर शुरू हो गया है। लेकिन खब्बू तिवारी की दावेदारी कमजोर होगी या अभय सिंह को ही टिकट मिलेगा, इसका फैसला पार्टी की रणनीति और आधिकारिक घोषणा पर निर्भर करेगा। 2027 के चुनाव से पहले यह सीट इसलिए दिलचस्प रहेगी, क्योंकि यहां बीजेपी को अपने पुराने चुनावी अनुभव और नए राजनीतिक समीकरणों के बीच संतुलन बनाना पड़ सकता है।

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