West Bengal Re-Polling: पश्चिम बंगाल में डायमंड हार्बर, मगराहाट पश्चिम और फाल्टा क्षेत्रों में दोबारा मतदान (री-पोलिंग) ने चुनावी प्रक्रिया की पारदर्शिता तो सुनिश्चित की, लेकिन इसके साथ ही सरकारी खजाने पर भारी बोझ भी डाल दिया है। भारत निर्वाचन आयोग के इस फैसले के बाद चुनावी खर्च को लेकर नई बहस छिड़ गई है।
15 बूथों पर दोबारा वोटिंग, 21 मई को फिर से मतदान होगा
पहले चरण में डायमंड हार्बर के 4 और मगराहाट पश्चिम के 11 बूथों समेत कुल 15 पोलिंग बूथों पर 2 मई को पुनर्मतदान कराया गया। इससे पहले 29 अप्रैल को हुई वोटिंग को गड़बड़ियों के चलते रद्द करना पड़ा था। निर्वाचन आयोग ने पश्चिम बंगाल के दक्षिण 24 परगना जिले में फाल्टा विधानसभा क्षेत्र में पूरी मतदान प्रक्रिया रद्द करने का असाधारण कदम उठाया है। इस विधानसभा क्षेत्र के सभी 285 मतदान केंद्रों पर 21 मई को नए सिरे से वोट डाले जाएंगे। मतों की गिनती 24 मई को की जाएगी।
West Bengal Re-Polling: एक बूथ पर कितना खर्च?
चुनाव आयोग के अनुसार, एक सामान्य पोलिंग बूथ को तैयार करने में औसतन 1 लाख रुपये या उससे अधिक खर्च आता है। इसमें ईवीएम और वीवीपैट मशीनों का प्रबंधन, कर्मचारियों का भत्ता, परिवहन, खाने-पीने की व्यवस्था और वेबकास्टिंग जैसी सुविधाएं शामिल होती हैं।
सुरक्षा पर सबसे ज्यादा खर्च
चुनाव के दौरान सबसे बड़ा खर्च सुरक्षा व्यवस्था पर होता है। केंद्रीय अर्धसैनिक बलों और पुलिस की तैनाती, उनके आवागमन और ठहरने की व्यवस्था पर भारी रकम खर्च होती है। संवेदनशील राज्यों में यह लागत और बढ़ जाती है।
West Bengal Re-Polling: री-वोटिंग से दोगुना बोझ
जब किसी बूथ पर दोबारा मतदान कराया जाता है, तो वही पूरी प्रक्रिया दोहरानी पड़ती है। यानी कर्मचारियों की फिर से तैनाती, मशीनों की दोबारा जांच और सुरक्षा बलों की नई व्यवस्था—इन सबके कारण खर्च लगभग दोगुना हो जाता है।
जनता की जेब पर असर
विशेषज्ञों के अनुसार, चुनाव में खर्च होने वाला पैसा अंततः करदाताओं की जेब से आता है। ऐसे में हर री-पोलिंग सीधे तौर पर सार्वजनिक धन पर अतिरिक्त बोझ डालती है। कुल मिलाकर, पश्चिम बंगाल में दोबारा मतदान ने न सिर्फ प्रशासनिक चुनौती बढ़ाई है, बल्कि यह भी साफ कर दिया है कि चुनावी गड़बड़ियों की कीमत अंततः देश की जनता को ही चुकानी पड़ती है।
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