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14,500 करोड़ की योजना से बदलेगा बिजली का खेल! रात की बिजली के लिए भारत की तैयारी

Solar Energy India: भारत अब केवल बिजली उत्पादन बढ़ाने पर ही नहीं, बल्कि दिन में पैदा होने वाली सौर ऊर्जा को रात में इस्तेमाल करने की तैयारी भी कर रहा है। केंद्र सरकार ने ग्रिड स्तर पर ऊर्जा भंडारण के लिए 14,500 करोड़ रुपये की योजना को मंजूरी दी है। इसके तहत बैटरी स्टोरेज और पंप्ड हाइड्रो परियोजनाओं को बढ़ावा दिया जाएगा। आखिर बैटरी में बिजली कैसे जमा होगी? क्या इससे रात में भी सौर ऊर्जा से घर रोशन हो सकेंगे? आम उपभोक्ताओं के बिजली बिल पर इसका क्या असर पड़ेगा? समझिए भारत की नई ऊर्जा रणनीति का पूरा गणित।

भारत के सामने बिजली की नई चुनौती क्या है?

भारत में सौर ऊर्जा का उत्पादन तेजी से बढ़ रहा है। दिन में धूप रहने के कारण सोलर प्लांट बड़ी मात्रा में बिजली पैदा करते हैं, लेकिन शाम होते ही सौर ऊर्जा का उत्पादन कम हो जाता है। दूसरी तरफ इसी समय घरों, बाजारों, दफ्तरों और उद्योगों में बिजली की मांग बढ़ने लगती है।

ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह है कि दिन में पैदा होने वाली अतिरिक्त बिजली को कैसे सुरक्षित रखा जाए, ताकि शाम और रात में जरूरत पड़ने पर उसका इस्तेमाल किया जा सके। इसी चुनौती का समाधान बैटरी स्टोरेज और अन्य ऊर्जा भंडारण तकनीकों में तलाशा जा रहा है। बिजली व्यवस्था में अब तक उत्पादन और वितरण पर ज्यादा ध्यान दिया जाता था, लेकिन सौर और पवन ऊर्जा की हिस्सेदारी बढ़ने के साथ बिजली को स्टोर करना भी जरूरी हो गया है। केंद्र सरकार की नई योजना इसी बदलाव की दिशा में एक अहम कदम है।

Solar Energy India: 14,500 करोड़ रुपये की योजना में क्या है खास?

केंद्र सरकार ने 4 नवंबर 2026 को ग्रिड स्तर पर ऊर्जा भंडारण क्षमता विकसित करने के लिए 14,500 करोड़ रुपये की वित्तीय सहायता वाली व्यवहार्यता अंतर वित्तपोषण (VGF) योजना को मंजूरी दी। इस योजना के तहत वित्त वर्ष 2026-27 से 2030-31 के बीच कुल 92 गीगावॉट-घंटे (GWh) ऊर्जा भंडारण क्षमता विकसित करने का लक्ष्य रखा गया है। इसमें अलग-अलग तकनीकों को शामिल किया गया है। 30 GWh: बैटरी ऊर्जा भंडारण प्रणाली। 60 GWh: पंप्ड हाइड्रो स्टोरेज। 2 GWh: उभरती ऊर्जा भंडारण तकनीकें।

इन परियोजनाओं में लगभग 97,600 करोड़ रुपये के कुल निवेश का अनुमान है। यानी सरकारी वित्तीय सहायता के साथ निजी निवेश को भी इस क्षेत्र में आकर्षित करने की कोशिश की जा रही है। योजना की एक महत्वपूर्ण शर्त यह है कि बैटरी भंडारण परियोजनाओं में कम से कम 40 प्रतिशत घरेलू सामग्री का इस्तेमाल अनिवार्य होगा। इसका उद्देश्य भारत में बैटरी निर्माण, उपकरणों और ऊर्जा तकनीक से जुड़ी घरेलू औद्योगिक क्षमता को बढ़ावा देना है।

बैटरी स्टोरेज कैसे करेगा दिन की बिजली से रात रोशन?

बैटरी स्टोरेज को आसान भाषा में बिजली का बैंक समझ सकते हैं। जिस तरह बैंक में पैसे जमा करके जरूरत के समय निकाले जाते हैं, उसी तरह बैटरी में बिजली जमा करके बाद में इस्तेमाल की जा सकती है। इसकी प्रक्रिया तीन चरणों में पूरी होती है।

पहला चरण: दिन में बिजली का उत्पादन

दोपहर में सोलर प्लांट से बिजली पैदा होती है। कई बार उत्पादन तत्काल मांग से अधिक होता है। ऐसी स्थिति में अतिरिक्त बिजली को बैटरी चार्ज करने में इस्तेमाल किया जा सकता है।

दूसरा चरण: बिजली का भंडारण

ग्रिड से जुड़ी बड़ी बैटरियों में अतिरिक्त बिजली जमा की जाती है। इससे दिन में पैदा हुई ऊर्जा को कुछ समय के लिए सुरक्षित रखा जा सकता है।

तीसरा चरण: रात में बिजली की आपूर्ति

शाम को जब सूरज ढल जाता है और सौर ऊर्जा का उत्पादन घट जाता है, तब बैटरियों में जमा बिजली वापस ग्रिड में भेजी जाती है। इससे घरों, बाजारों और उद्योगों की बिजली जरूरत पूरी करने में मदद मिल सकती है। हालांकि, यह समझना जरूरी है कि बैटरियां खुद बिजली पैदा नहीं करतीं। वे पहले से उत्पादित बिजली को जमा करती हैं। चार्जिंग और डिस्चार्जिंग के दौरान कुछ ऊर्जा का नुकसान भी होता है।

Solar Energy India: क्या इस दीवाली से रात में बैटरी से मिलेगी बिजली?

सरकार की योजना को मंजूरी मिलने का मतलब यह नहीं है कि इसी दीवाली से देश के घरों में बैटरी से बिजली पहुंचने लगेगी। इसके लिए परियोजनाओं का निर्माण, बैटरी सिस्टम की स्थापना और उन्हें बिजली ग्रिड से जोड़ने की प्रक्रिया पूरी करनी होगी। इसमें समय लगेगा। इसलिए फिलहाल इसे भविष्य की बिजली व्यवस्था तैयार करने की योजना के रूप में देखना चाहिए। इसका महत्व इसलिए भी है क्योंकि भारत अब केवल ज्यादा बिजली पैदा करने पर ध्यान नहीं दे रहा, बल्कि जरूरत के समय उसकी उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए भंडारण क्षमता विकसित करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।

पंप्ड हाइड्रो स्टोरेज क्या है, पानी से कैसे जमा होती है बिजली?

बैटरी के अलावा सरकार पंप्ड हाइड्रो स्टोरेज तकनीक को भी बढ़ावा दे रही है। इसे पानी से चलने वाला बिजली बैंक कहा जा सकता है। इस तकनीक में दो जलाशय बनाए जाते हैं। इनमें एक ऊंचाई पर और दूसरा नीचे होता है। जब बिजली की उपलब्धता अधिक होती है, तब अतिरिक्त बिजली से पंप चलाकर नीचे के जलाशय का पानी ऊपर पहुंचाया जाता है। बाद में जब बिजली की मांग बढ़ती है, तब ऊपर जमा पानी को नीचे छोड़ा जाता है। पानी के बहाव से टरबाइन घूमती है और बिजली पैदा होती है।

इस तकनीक की खासियत यह है कि बड़े पैमाने पर ऊर्जा को लंबे समय तक सुरक्षित रखा जा सकता है। हालांकि, इसके लिए उपयुक्त भौगोलिक स्थान, जल संसाधन, निर्माण लागत और पर्यावरणीय प्रभाव जैसे पहलुओं का ध्यान रखना जरूरी होता है।

Solar Energy India: भारत में अभी कितनी है ऊर्जा भंडारण की क्षमता?

भारत में पंप्ड हाइड्रो स्टोरेज की परियोजनाएं पहले से मौजूद हैं, लेकिन आने वाले वर्षों की जरूरत को देखते हुए इनका विस्तार जरूरी है। अगस्त 2026 तक उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, देश में 7.43 गीगावॉट क्षमता के 10 पंप्ड स्टोरेज संयंत्र चालू थे। इसके अलावा 15.87 गीगावॉट क्षमता की परियोजनाएं निर्माण या क्रियान्वयन के अलग-अलग चरणों में थीं। केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण की राष्ट्रीय विद्युत योजना के अनुसार, 2031-32 तक भारत को लगभग 47.24 गीगावॉट बैटरी स्टोरेज क्षमता और 236 GWh ऊर्जा भंडारण की जरूरत होगी। इसी अवधि में पंप्ड स्टोरेज के लिए 26.69 गीगावॉट क्षमता और 175 GWh ऊर्जा भंडारण की आवश्यकता का अनुमान है। दोनों तकनीकों को मिलाकर देश की कुल ऊर्जा भंडारण जरूरत लगभग 411 GWh बैठती है।

Solar Energy India
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यहां गीगावॉट और गीगावॉट-घंटे का अंतर समझना भी जरूरी है। गीगावॉट बताता है कि किसी समय कितनी बिजली उपलब्ध कराई जा सकती है, जबकि गीगावॉट-घंटा बताता है कि कुल कितनी ऊर्जा जमा है या उपलब्ध कराई जा सकती है। यानी बिजली कितनी मात्रा में और कितनी देर तक मिलेगी, यह दोनों आंकड़ों से समझा जा सकता है।

क्या बैटरी स्टोरेज से कोयले पर निर्भरता घटेगी?

भारत में बिजली की बड़ी जरूरत अभी भी पारंपरिक ऊर्जा स्रोतों से पूरी होती है। खासकर शाम और रात के समय जब सौर ऊर्जा का उत्पादन नहीं होता, तब कोयला आधारित बिजली संयंत्रों की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। अगर दिन में पैदा हुई अतिरिक्त सौर ऊर्जा को बैटरियों में जमा करके शाम को इस्तेमाल किया जाए, तो कोयला आधारित बिजली उत्पादन पर दबाव कम करने में मदद मिल सकती है। इससे स्वच्छ ऊर्जा का बेहतर इस्तेमाल होगा और बिजली उत्पादन से होने वाले कार्बन उत्सर्जन को घटाने की संभावना भी बढ़ेगी। हालांकि, बैटरी स्टोरेज के विस्तार का मतलब यह नहीं है कि कोयला आधारित बिजली संयंत्रों की जरूरत खत्म हो जाएगी। लगातार बढ़ती बिजली मांग, मौसम में बदलाव और लंबे समय तक आपूर्ति बनाए रखने के लिए ऊर्जा के अलग-अलग स्रोतों का संतुलन जरूरी रहेगा।

Solar Energy India: क्या आम लोगों का बिजली बिल भी कम होगा?

बैटरी स्टोरेज का संभावित फायदा बिजली की उपलब्धता और ग्रिड की स्थिरता में सुधार के रूप में सामने आ सकता है। शाम के समय अतिरिक्त बिजली उपलब्ध होने से महंगे समय में दूसरे स्रोतों से बिजली खरीदने की जरूरत कम हो सकती है। इसका लाभ घरेलू उपभोक्ताओं, किसानों और उद्योगों को मिल सकता है। कृषि क्षेत्र में सौर ऊर्जा का बेहतर इस्तेमाल होने से सिंचाई के लिए बिजली आपूर्ति की व्यवस्था भी मजबूत हो सकती है। हालांकि, इससे आम लोगों का बिजली बिल तुरंत कम हो जाएगा, ऐसा दावा करना जल्दबाजी होगी। बैटरी परियोजनाओं की लागत, बिजली वितरण कंपनियों की वित्तीय स्थिति, भंडारण शुल्क और बिजली खरीद समझौते तय करेंगे कि इस तकनीक का वास्तविक लाभ उपभोक्ताओं तक कितना पहुंचेगा।

बैटरी निर्माण में भारत के सामने क्या चुनौतियां हैं?

ऊर्जा भंडारण का विस्तार करना जितना जरूरी है, उतना ही चुनौतीपूर्ण भी है। लिथियम-आयन बैटरियों के लिए जरूरी कच्चा माल, बैटरी सेल निर्माण, सुरक्षा उपकरण और तकनीकी नियंत्रण प्रणाली की उपलब्धता महत्वपूर्ण होगी।

भारत को इस क्षेत्र में आयात पर निर्भरता कम करने और घरेलू उत्पादन क्षमता बढ़ाने की जरूरत है। 40 प्रतिशत घरेलू सामग्री की शर्त इसी दिशा में उठाया गया कदम है। इसके अलावा बैटरियों की लागत कम करना, उनकी उम्र बढ़ाना, आग जैसी दुर्घटनाओं से सुरक्षा सुनिश्चित करना और इस्तेमाल के बाद बैटरियों के पुनर्चक्रण की व्यवस्था तैयार करना भी जरूरी होगा। इन चुनौतियों का समाधान होने पर ही ऊर्जा भंडारण को बड़े स्तर पर किफायती बनाया जा सकेगा।

Solar Energy India: राज्यों की बिजली कंपनियों को भी जोड़ने की तैयारी

ऊर्जा भंडारण को केवल केंद्र सरकार की परियोजनाओं तक सीमित रखने के बजाय राज्यों की बिजली वितरण कंपनियों को भी इसमें शामिल करने की तैयारी है। 5 नवंबर 2026 को रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, बिजली सचिव पंकज अग्रवाल ने भारत रिन्यूएबल एनर्जी समिट में कहा कि राज्य बिजली वितरण कंपनियों के लिए ऊर्जा भंडारण जोड़ना अनिवार्य करने की योजना बनाई जा रही है। रिपोर्ट के अनुसार, जुलाई 2027 से शुरू होने वाली नई सरकारी सौर और पवन ऊर्जा परियोजनाओं में भी बैटरी भंडारण की अनिवार्यता लाने पर विचार किया जा रहा है। हालांकि, राज्यों के लिए न्यूनतम भंडारण क्षमता कितनी होगी, यह अभी तय नहीं हुई है। इसका उद्देश्य बिजली उत्पादन के साथ उसके भंडारण को भी ऊर्जा व्यवस्था का जरूरी हिस्सा बनाना है।

भारत की ऊर्जा व्यवस्था में कितना बड़ा बदलाव आएगा?

भारत की ऊर्जा व्यवस्था अब एक नए दौर में प्रवेश कर रही है। पहले मुख्य चुनौती हर घर और उद्योग तक बिजली पहुंचाने की थी। अब बढ़ती सौर और पवन ऊर्जा के बीच यह सुनिश्चित करना भी जरूरी हो गया है कि बिजली दिन हो या रात, जरूरत के समय उपलब्ध रहे। 14,500 करोड़ रुपये की योजना इसी बदलाव का हिस्सा है। यदि बैटरी और पंप्ड हाइड्रो परियोजनाएं तय समय पर पूरी होती हैं, तो दिन में पैदा होने वाली अतिरिक्त स्वच्छ बिजली का रात में इस्तेमाल करना आसान हो सकता है। हालांकि, योजना की सफलता केवल सरकारी मंजूरी और निवेश के आंकड़ों से तय नहीं होगी। परियोजनाओं का समय पर निर्माण, लागत में कमी, घरेलू तकनीक का विकास और बिजली वितरण कंपनियों की भागीदारी इसकी असली कसौटी होगी।

भारत की अगली ऊर्जा चुनौती केवल ज्यादा बिजली पैदा करना नहीं, बल्कि उसे सही समय पर उपलब्ध कराना है। बैटरी स्टोरेज और पंप्ड हाइड्रो तकनीक इस दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं। आने वाले वर्षों में अगर ये परियोजनाएं सफलतापूर्वक जमीन पर उतरती हैं, तो दोपहर की धूप से पैदा हुई बिजली रात में भी घरों, खेतों और उद्योगों को रोशन करने में मदद कर सकती है। यही भारत की नई ऊर्जा रणनीति का सबसे बड़ा लक्ष्य है।

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