New Delhi: संसद के बजट सत्र के दौरान सोमवार को लोकसभा में उस वक्त माहौल गर्म हो गया, जब नेता प्रतिपक्ष Rahul Gandhi ने अपने भाषण में पूर्व भारतीय सेना प्रमुख जनरल एमएम नरवणे के संस्मरणों का जिक्र किया। राहुल गांधी राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव पर बोल रहे थे और इसी दौरान उन्होंने एक मैगज़ीन में छपे लेख का हवाला देना चाहा, जिसमें जनरल नरवणे की एक अप्रकाशित किताब से जुड़े अंश बताए गए थे। इस उल्लेख के साथ ही सदन में तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिली और हंगामा शुरू हो गया।दरअसल, जनरल मनोज मुकुंद नरवणे भारतीय सेना के 28वें थलसेना प्रमुख रह चुके हैं। उन्होंने 31 दिसंबर 2019 को तत्कालीन सेना प्रमुख Bipin Rawat से पदभार संभाला था। अपने कार्यकाल के बाद वह दिसंबर 2021 से अप्रैल 2022 तक चीफ ऑफ स्टाफ कमेटी के अस्थायी अध्यक्ष की जिम्मेदारी भी निभा चुके हैं।
New Delhi: साधारण पृष्ठभूमि से सेना के शीर्ष तक का सफर
मनोज मुकुंद नरवणे का जन्म 22 अप्रैल 1960 को पुणे में हुआ था। उनके पिता भारतीय वायुसेना में अधिकारी थे, जिससे अनुशासन और देशसेवा की भावना उन्हें विरासत में मिली। उन्होंने नेशनल डिफेंस एकेडमी (NDA) पुणे और इंडियन मिलिट्री एकेडमी (IMA) देहरादून से सैन्य शिक्षा हासिल की। इसके साथ ही उन्होंने डिफेंस स्टडीज़ में एमफिल की डिग्री भी प्राप्त की है। जून 1980 में उन्हें सिख लाइट इन्फैंट्री की 7वीं बटालियन में कमीशन मिला। इसके बाद उनका सैन्य करियर लगातार चुनौतीपूर्ण और संवेदनशील जिम्मेदारियों से गुजरता रहा। जम्मू-कश्मीर में राष्ट्रीय राइफल्स की बटालियन, 106 इन्फैंट्री ब्रिगेड की कमान और असम राइफल्स जैसे महत्वपूर्ण दायित्व उन्होंने संभाले। कश्मीर और उत्तर-पूर्व में आतंकवाद विरोधी अभियानों में भी उनकी सक्रिय भूमिका रही।
New Delhi: अप्रकाशित संस्मरण क्यों बने चर्चा का केंद्र?
जनरल नरवणे के संस्मरण लंबे समय से चर्चा में रहे हैं। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, उनके अनुभवों पर आधारित एक मेमॉयर के कुछ अंश पहले अलग-अलग प्लेटफॉर्म्स पर सामने आए थे। इस किताब का नाम “फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी” बताया गया, जिसके लिए ई-कॉमर्स साइट्स पर प्री-ऑर्डर भी शुरू हो गए थे। हालांकि, सरकारी मंज़ूरी न मिलने के कारण यह किताब अब तक प्रकाशित नहीं हो सकी और यहीं से विवाद की जड़ पड़ी।
इसी अप्रकाशित मेमॉयर का संदर्भ संसद में दिए गए भाषण में आने के बाद राजनीतिक गलियारों में बहस तेज हो गई। एक ओर इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और जानकारी के अधिकार से जोड़कर देखा जा रहा है, तो दूसरी ओर सेना और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े संवेदनशील मुद्दों पर सवाल खड़े किए जा रहे हैं।
क्यों अहम है यह पूरा मामला?
जनरल एमएम नरवणे न केवल एक अनुभवी सैन्य अधिकारी रहे हैं, बल्कि उनके विचार और अनुभव भारत की रक्षा नीति और रणनीतिक फैसलों से जुड़े रहे हैं। ऐसे में उनके संस्मरणों का जिक्र संसद में होना राजनीतिक और संवैधानिक दोनों नजरियों से महत्वपूर्ण बन जाता है। यही वजह है कि उनका नाम लेते ही सदन में माहौल गरमा गया और यह मुद्दा सुर्खियों में आ गया।कुल मिलाकर, एमएम नरवणे का जीवन अनुशासन, सेवा और नेतृत्व की मिसाल रहा है, और संसद में उठा यह विवाद उनके व्यक्तित्व से ज्यादा, उन संवेदनशील मुद्दों से जुड़ा है जिनसे देश की सुरक्षा और राजनीति दोनों प्रभावित होती हैं।
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