US Approves Russian Oil: अमेरिका और इजराइल के बीच ईरान को लेकर बढ़े तनाव और संघर्ष का असर अब पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था पर दिखने लगा है। इस टकराव के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें तेजी से बढ़कर 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर पहुंच गई हैं। बढ़ती कीमतों को नियंत्रित करने के लिए ट्रम्प प्रशासन ने अस्थायी तौर पर कुछ देशों को रूस से तेल खरीदने की अनुमति दे दी है। फिलहाल रूस के कई तेल टैंकर समुद्र में खड़े हैं और उन्हें आगे बढ़ने की मंजूरी का इंतजार है।

रूस तेल बिक्री को मिली मंजूरी
इससे पहले अमेरिका ने भारत के लिए भी रूस से कच्चा तेल खरीदने के मामले में प्रतिबंधों में ढील देने की बात कही थी। हालांकि भारतीय अधिकारियों ने साफ कर दिया था कि भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए किसी भी देश की अनुमति पर निर्भर नहीं रहता और वह अपने राष्ट्रीय हितों के अनुसार फैसला करता है।
गुरुवार को अमेरिकी ट्रेजरी विभाग (वित्त मंत्रालय) ने एक विशेष लाइसेंस जारी किया। इस लाइसेंस के तहत उन रूसी कच्चे तेल और पेट्रोलियम उत्पादों की बिक्री और डिलीवरी की अनुमति दी गई है, जो 12 मार्च की रात 12:01 बजे से पहले जहाजों पर लोड किए जा चुके थे।

US Approves Russian Oil: तेल सप्लाई बढ़ाने का अस्थायी फैसला
यह राहत स्थायी नहीं है। यह छूट केवल 11 अप्रैल तक लागू रहेगी। अमेरिकी ट्रेजरी सेक्रेटरी स्कॉट बेसेंट ने बताया कि इस कदम का उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की आपूर्ति को बढ़ाना है, ताकि तेजी से बढ़ती कीमतों को काबू में किया जा सके।
अमेरिका का कहना है कि इस फैसले से रूस को बहुत बड़ा आर्थिक फायदा नहीं होगा। ट्रेजरी मंत्री स्कॉट बेसेंट ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर लिखा कि राष्ट्रपति ट्रम्प वैश्विक ऊर्जा बाजार में स्थिरता बनाए रखना चाहते हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह केवल अल्पकालिक फैसला है और इसका उद्देश्य बाजार में संतुलन बनाए रखना है।
तेल कीमतें 101 डॉलर के पार
बेसेंट के अनुसार रूस की आमदनी का बड़ा हिस्सा उस टैक्स से आता है जो तेल निकालने की प्रक्रिया के दौरान लिया जाता है। जबकि यह छूट केवल उस तेल पर लागू है जो पहले से ही रास्ते में यानी ट्रांजिट में है। इसलिए इससे रूस की कमाई में कोई बड़ा इजाफा होने की संभावना नहीं है।
उधर मध्य पूर्व में ऊर्जा सप्लाई और उससे जुड़े ढांचे पर हाल ही में हुए हमलों के बाद कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल आया है। तेल की कीमतों में 9 प्रतिशत से अधिक की बढ़ोतरी दर्ज की गई है और इसके साथ ही अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चा तेल फिर से 101.50 डॉलर प्रति बैरल के स्तर को पार कर गया है।
तेल की कीमतों को स्थिर रखने के लिए आपातकालीन भंडार यानी स्ट्रैटजिक रिजर्व से रिकॉर्ड मात्रा में तेल निकालने का फैसला भी किया गया था। लेकिन सप्लाई रुकने की आशंका इतनी ज्यादा है कि इस कदम का असर भी कीमतों पर ज्यादा नहीं दिख रहा है।

होर्मुज जलमार्ग बंद, बढ़ा वैश्विक खतरा
मिडिल ईस्ट में चल रहे संघर्ष के कारण ऊर्जा और परिवहन क्षेत्र पर भी गंभीर असर पड़ा है। खास तौर पर होर्मुज जलडमरूमध्य पर गतिविधियां लगभग ठप हो चुकी हैं। यह करीब 167 किलोमीटर लंबा समुद्री रास्ता है, जो फारस की खाड़ी को अरब सागर से जोड़ता है।
दुनिया के कुल तेल परिवहन का लगभग 20 प्रतिशत इसी रास्ते से गुजरता है। लेकिन मौजूदा खतरे को देखते हुए तेल टैंकर इस मार्ग से गुजरने से बच रहे हैं। सऊदी अरब, इराक और कुवैत जैसे बड़े तेल उत्पादक देश भी अपने निर्यात के लिए इसी रास्ते पर निर्भर हैं।
भारत के लिए भी यह मार्ग बेहद महत्वपूर्ण है। भारत अपनी जरूरत का लगभग 50 प्रतिशत कच्चा तेल और करीब 54 प्रतिशत एलएनजी इसी रास्ते से मंगाता है। वहीं ईरान भी अपने तेल निर्यात के लिए इसी मार्ग का इस्तेमाल करता है।
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