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ब्रिटिश संसद में गूंजा भारतीय दर्शन का स्वर, आचार्य प्रशांत बोले- भारत की असली पहचान आत्मज्ञान

PRASHANT ACHARYA: भारतीय दार्शनिक और लेखक आचार्य प्रशांत ने ब्रिटिश पार्लियामेंट के हाउस ऑफ लॉर्ड्स में आयोजित विशेष कार्यक्रम में भारतीय दर्शन और वेदांत के वैश्विक महत्व पर विस्तार से विचार रखे। ‘इंडियन रूट्स, ग्लोबल विंग्स’ विषय पर आयोजित कार्यक्रम में उन्होंने कहा कि भारत की वास्तविक पहचान उसकी संस्कृति, परंपराओं या व्यंजनों से नहीं, बल्कि आत्मज्ञान की उस परंपरा से है जो मनुष्य को स्वयं को जानने की प्रेरणा देती है।

‘कोहम्’ है भारतीय दर्शन का मूल प्रश्न

आचार्य प्रशांत ने कहा कि भारतीय चिंतन का मूल प्रश्न ‘कोहम्?’ अर्थात ‘मैं कौन हूं?’ है। इसी आत्म-जिज्ञासा से वेदांत, भगवान बुद्ध, संत कबीर और भारत की अन्य महान दार्शनिक धाराओं का जन्म हुआ। उन्होंने कहा कि भारतीयता किसी सांस्कृतिक पहचान भर का नाम नहीं, बल्कि स्वयं को समझने की गंभीर प्रतिबद्धता है।

PRASHANT ACHARYA: आत्मज्ञान से मिलती है वास्तविक स्वतंत्रता

उन्होंने कहा कि आधुनिक दुनिया में सफलता और विस्तार को अक्सर स्वतंत्रता समझ लिया जाता है, जबकि वास्तविक स्वतंत्रता बाहरी उपलब्धियों से नहीं, बल्कि भीतर मौजूद बंधनों को पहचानकर उनसे मुक्त होने में है। आत्म-अन्वेषण ही मनुष्य को सच्चे अर्थों में स्वतंत्र बनाता है।

उपनिषदों का संदेश पूरी मानवता के लिए

अपने संबोधन में आचार्य प्रशांत ने उपनिषदों के प्रसिद्ध मंत्र ‘असतो मा सद्गमय, तमसो मा ज्योतिर्गमय, मृत्योर्मा अमृतं गमय’ का उल्लेख करते हुए कहा कि यह किसी धर्म या संप्रदाय का संदेश नहीं, बल्कि संपूर्ण मानवता के लिए सत्य, प्रकाश और अमरता की ओर बढ़ने का आह्वान है। उन्होंने कठोपनिषद् के संदेश ‘उत्तिष्ठत जाग्रत’ और वैदिक उद्घोष ‘चरैवेति-चरैवेति’ का भी उल्लेख करते हुए कहा कि साधक को किसी भी उपलब्धि या पहचान पर रुकना नहीं चाहिए, बल्कि निरंतर आत्म-बोध की दिशा में आगे बढ़ते रहना चाहिए।

PRASHANT ACHARYA: जलवायु संकट चेतना का संकट है

कार्यक्रम के बाद मीडिया से बातचीत में आचार्य प्रशांत ने कहा कि जलवायु परिवर्तन केवल पर्यावरण या उत्सर्जन का संकट नहीं है, बल्कि मानव चेतना का संकट है। उन्होंने कहा कि तकनीक, कानून और नीतियां जरूरी हैं, लेकिन जब तक मनुष्य अपनी असीमित उपभोग प्रवृत्ति को नहीं समझेगा, तब तक स्थायी समाधान संभव नहीं है।

विज्ञान और वेदांत एक ही प्रश्न पर मिलते हैं

आचार्य प्रशांत ने कहा कि आधुनिक विज्ञान और वेदांत अंततः एक ही प्रश्न पर जाकर मिलते हैं—‘किसके लिए?’ विज्ञान वस्तुओं और घटनाओं का अध्ययन करता है, जबकि वेदांत उस ज्ञाता की पड़ताल करता है जो सभी अनुभवों का साक्षी होता है।

PRASHANT ACHARYA: ब्रिटेन प्रवास की महत्वपूर्ण कड़ी

ब्रिटिश संसद में दिया गया यह संबोधन आचार्य प्रशांत के व्यापक ब्रिटेन दौरे की महत्वपूर्ण कड़ी माना जा रहा है। इससे पहले वे कैम्ब्रिज और ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में व्याख्यान दे चुके हैं। आगामी दिनों में वे लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स (LSE), किंग्स कॉलेज लंदन और लंदन क्लाइमेट एक्शन वीक के विभिन्न कार्यक्रमों को भी संबोधित करेंगे।

भारत की सबसे बड़ी देन आत्मज्ञान

अपने संबोधन के समापन में आचार्य प्रशांत ने कहा कि भारत की सबसे बड़ी देन उसके सांस्कृतिक प्रतीक नहीं, बल्कि वह आत्मज्ञान है जो हजारों वर्षों से मानवता का मार्गदर्शन करता आया है और आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना प्राचीन काल में था।

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