CAPF: केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल (CAPF) में IPS अधिकारियों की नियुक्ति को लेकर लंबे समय से विवाद चल रहा है। हाल ही में यह मुद्दा फिर चर्चा में आ गया है, क्योंकि केंद्र सरकार एक नया बिल लाने की तैयारी कर रही है। CAPF के अधिकारियों का कहना है कि अगर यह बिल पास हो गया तो उनके प्रमोशन के मौके और कम हो जाएंगे और सुप्रीम कोर्ट के फैसले का असर भी खत्म हो सकता है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि आखिर CAPF और IPS के बीच यह विवाद क्या है और सरकार क्या बदलाव करने जा रही है।
क्या है CAPF और IPS का मामला?
CAPF में देश के छह केंद्रीय सशस्त्र बल शामिल हैं, जो सीमा सुरक्षा और आंतरिक सुरक्षा की जिम्मेदारी संभालते हैं। इनमें CRPF, BSF, ITBP और CISF जैसे बल आते हैं। इन बलों में दो तरह के अधिकारी होते हैं पहले IPS अधिकारी, जिन्हें केंद्र सरकार डेप्युटेशन पर CAPF में भेजती है, और दूसरे कैडर अधिकारी, जो UPSC द्वारा आयोजित CAPF (AC) परीक्षा के जरिए सीधे भर्ती होते हैं।
CAPF: विवाद की असली वजह
CAPF के कैडर अधिकारियों का आरोप है कि ऊंचे पदों पर अक्सर IPS अधिकारियों की तैनाती कर दी जाती है। खासकर IG और उससे ऊपर के पदों पर IPS अधिकारियों का दबदबा रहता है। इससे CAPF के अपने अधिकारियों के प्रमोशन के अवसर सीमित हो जाते हैं और उन्हें लंबे समय तक एक ही पद पर काम करना पड़ता है।
CAPF: प्रमोशन में कितना फर्क?
एक IPS अधिकारी आमतौर पर 13–14 साल की सेवा में DIG रैंक तक पहुंच जाता है, जबकि CAPF के कैडर अधिकारी को उसी रैंक तक पहुंचने में 25 से 30 साल लग जाते हैं। आंकड़ों के मुताबिक CRPF और BSF जैसे बलों में कई कैडर अधिकारी 10–12 साल तक असिस्टेंट कमांडेंट की रैंक पर ही बने रहते हैं। यही वजह है कि प्रमोशन में देरी से नाराज होकर कई अधिकारी VRS भी ले रहे हैं।
सुप्रीम कोर्ट का क्या फैसला था?
CAPF अधिकारियों की मांगों को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने 2019 और फिर 2025 में महत्वपूर्ण फैसले दिए। कोर्ट ने CAPF को ऑर्गनाइज्ड ग्रुप ‘A’ सर्विस (OGAS) माना और कहा कि इन बलों में IPS अधिकारियों का कोटा धीरे-धीरे कम किया जाए, ताकि CAPF के अपने अधिकारियों को भी शीर्ष पदों तक पहुंचने का मौका मिल सके।
सरकार का नया बिल और विवाद
CAPF: अब केंद्र सरकार ‘केंद्रीय सशस्त्र बल (सामान्य प्रशासन) बिल’ लाने की तैयारी में है। CAPF के अधिकारियों का आरोप है कि इस बिल के जरिए IPS अधिकारियों की तैनाती को स्थायी बनाया जा सकता है। उनका कहना है कि अगर ऐसा हुआ तो सुप्रीम कोर्ट के आदेश का असर कम हो जाएगा और DIG, IG जैसे पदों पर कैडर अधिकारियों के प्रमोशन की राह और मुश्किल हो जाएगी। यही वजह है कि इस प्रस्तावित बिल को लेकर सियासत भी तेज हो गई है और विपक्ष ने भी इस मुद्दे को संसद में उठाने की बात कही है।
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