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सबरीमाला सुनवाई: मंदिरों में सीमित प्रवेश पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी, धार्मिक स्वतंत्रता की सीमा पर बहस

Sabarimala Case Hearing:
Sabarimala Case Hearing:

Sabarimala Case Hearing: सुप्रीम कोर्ट ऑफ़ इंडिया में सबरीमाला मामले की सुनवाई के दौरान मंदिरों में प्रवेश को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणियां सामने आईं। जस्टिस जस्टिस बी .वि नागराथ्ना ने कहा कि मंदिरों में केवल विशेष समुदाय के लोगों को प्रवेश देना और अन्य को बाहर रखना समाज में विभाजन पैदा कर सकता है, जो धर्म के हित में नहीं है।

“ज्यादा लोगों की भागीदारी से धर्म मजबूत”

सुनवाई के दौरान जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि यदि किसी मंदिर या मठ में केवल एक समुदाय के लोगों को ही प्रवेश दिया जाए, तो यह उचित नहीं होगा। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि अलग-अलग मठों और मंदिरों में सभी को जाने की अनुमति होनी चाहिए, इससे धर्म और मजबूत होता है।

Sabarimala Case Hearing: संवैधानिक प्रावधानों पर चर्चा

पीठ के सामने यह भी सवाल उठा कि सामाजिक सुधार के लिए बनाए गए कानूनों का धार्मिक प्रथाओं पर क्या प्रभाव पड़ता है। अदालत ने कहा कि छुआछूत खत्म करने से जुड़ा प्रावधान एक सशक्त संवैधानिक व्यवस्था है और इसे केवल कानूनी नहीं, बल्कि सामाजिक दृष्टि से भी देखा जाना चाहिए।
साथ ही यह भी स्पष्ट किया गया कि धार्मिक संस्थाओं के अधिकारों और सामाजिक सुधार के बीच संतुलन हर मामले के आधार पर तय किया जाएगा।

Sabarimala Case Hearing: केंद्र सरकार का पक्ष

केंद्र सरकार की ओर से पेश पक्ष में कहा गया कि धार्मिक मामलों में अदालतों को सावधानी बरतनी चाहिए, क्योंकि ये मुद्दे अत्यंत संवेदनशील होते हैं। सरकार की दलील के अनुसार, यदि कोई धार्मिक संस्था अपने नियमों के अनुसार प्रवेश तय करती है, तो यह उसका अधिकार है। साथ ही यह भी कहा गया कि यदि कोई मंदिर केवल एक समुदाय के लिए है, तो उसे सार्वजनिक धन या दान नहीं लेना चाहिए।

महिलाओं के प्रवेश पर सुनवाई जारी

यह मामला धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के प्रवेश और भेदभाव से जुड़ा है, जिस पर पिछले कई वर्षों से कानूनी विवाद जारी है। 2018 में अदालत ने महिलाओं के प्रवेश पर लगी रोक को हटाने का फैसला दिया था, जिसके बाद बड़ी संख्या में पुनर्विचार याचिकाएं दायर की गईं। वर्तमान में 9 जजों की संविधान पीठ 7 से 22 अप्रैल तक 50 से अधिक याचिकाओं पर सुनवाई कर रही है।

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