Iran War Shock: ईरान, अमेरिका और इजरायल के बीच जारी जंग ने वैश्विक अर्थव्यवस्था को गहरे संकट में डाल दिया है। 28 फरवरी से शुरू हुआ यह संघर्ष अब 40 दिन से ज्यादा लंबा खिंच चुका है और इसका असर दुनियाभर के शेयर बाजारों पर साफ नजर आ रहा है। पाकिस्तान में हुई शांति वार्ता के विफल होने के बाद 13 अप्रैल (सोमवार) को भारतीय शेयर बाजार समेत वैश्विक बाजारों में एक और बड़ी गिरावट की आशंका जताई जा रही है, जिससे निवेशकों की चिंता और बढ़ गई है।
ब्लैक स्प्रिंग का असर
इस युद्ध ने केवल भौगोलिक तनाव ही नहीं बढ़ाया, बल्कि वित्तीय बाजारों की नींव भी हिला दी है। 28 फरवरी से 10 अप्रैल के बीच के दौर को विश्लेषक ‘ब्लैक स्प्रिंग’ कह रहे हैं, क्योंकि इस दौरान लगभग हर बड़े बाजार में भारी गिरावट दर्ज की गई। कच्चे तेल की कीमतें 125 डॉलर प्रति बैरल के करीब पहुंचने और सप्लाई चेन टूटने के डर ने निवेशकों का भरोसा कमजोर कर दिया है।
Iran War Shock: शेयर बाजारों में गिरावट
ग्लोबल मार्केट में इस दौरान लगातार बिकवाली देखने को मिली है। यूरोप के बाजार सबसे ज्यादा प्रभावित हुए हैं, जहां यूरोनेक्स्ट करीब 14.3% और लंदन स्टॉक एक्सचेंज लगभग 12.1% तक गिर चुके हैं। भारत में भी सेंसेक्स अपने रिकॉर्ड स्तर से करीब 9.5% नीचे आ चुका है, जबकि चीन के शंघाई स्टॉक एक्सचेंज में भी भारी उतार-चढ़ाव दर्ज किया गया है।
Iran War Shock: मार्केट कैप में भारी नुकसान
इस 40 दिन की अवधि में दुनियाभर के शेयर बाजारों के मार्केट कैप में करीब 12 ट्रिलियन डॉलर की गिरावट आई है। भारतीय निवेशकों को ही करीब 25 लाख करोड़ रुपये का नुकसान झेलना पड़ा है, जिसकी बड़ी वजह विदेशी निवेशकों की बिकवाली और कच्चे तेल की कीमतों में तेजी है। वैश्विक व्यापार पर असर और युद्ध के लंबा खिंचने की आशंका ने बाजारों की स्थिति को और कमजोर कर दिया है।
अमेरिका और यूरोप पर असर
अमेरिका के सीधे तौर पर युद्ध में शामिल होने की खबरों ने वॉल स्ट्रीट में भी घबराहट फैला दी है और ज्यादातर इंडेक्स लाल निशान में रहे। वहीं यूरोप में ऊर्जा संकट का खतरा गहराता जा रहा है, क्योंकि वहां तेल और गैस के लिए खाड़ी देशों पर निर्भरता ज्यादा है। इसी वजह से यूरोपीय और ब्रिटिश बाजारों में सबसे ज्यादा दबाव देखने को मिला है।
Iran War Shock: सोमवार को क्या होगा?
विशेषज्ञों का मानना है कि शांति वार्ता के विफल होने के बाद सोमवार को बाजार खुलते ही ‘पैनिक सेलिंग’ देखने को मिल सकती है और सेंसेक्स में 2-3% तक की और गिरावट संभव है। कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों से ईंधन, स्टील और लॉजिस्टिक्स महंगे होंगे, जिससे इंफ्रास्ट्रक्चर और EPC प्रोजेक्ट्स की लागत बढ़ेगी और कंपनियों के मुनाफे पर असर पड़ेगा।
निवेश का बदलता ट्रेंड
Iran War Shock: हालांकि इस संकट के बीच निवेश का ट्रेंड बदलता हुआ भी दिख सकता है। कंपनियां अब लागत में ‘वोलैटिलिटी रिस्क प्रीमियम’ जोड़ सकती हैं, जिससे प्रोजेक्ट्स महंगे होंगे, लेकिन भारत के लिए यह लोकल सोर्सिंग और वैकल्पिक संसाधनों की ओर बढ़ने का मौका भी बन सकता है। साथ ही, रेल इंफ्रास्ट्रक्चर और रिन्यूएबल एनर्जी जैसे सेक्टर बेहतर प्रदर्शन कर सकते हैं, जबकि निवेशक सुरक्षित विकल्पों जैसे सोने की ओर रुख कर सकते हैं। कुल मिलाकर, आने वाले दिनों में बाजार की दिशा पूरी तरह वैश्विक हालात पर निर्भर करेगी।
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