Dollar vs Rupee: भारत में प्रति माह पेट्रोलियम से बने पदार्थों की खपत लगभग 2 करोड़ टन की है। डीजल, पेट्रोल और एलपीजी इसका कुल 75 प्रतिशत है। अब हम इस पर सोचें कि इन पेट्रोलियम पदार्थों की जगह हम विद्युत से अपना काम चलायें, तो वह हो पाना मुश्किल है। क्योंकि पिछले वर्ष भारत ने 47 लाख कार बेचीं, लेकिन उनमें से 4.3 प्रतिशत बिजली से चालित कारें थीं। जबकि उसी अवधि में चीन ने भी 2 करोड़ चालीस लाख कारें बेचीं, जो 53 प्रतिशत बिजली से चालित थीं। यहां पर तुलना करने का मकसद यह है कि हमें यदि पेट्रोलियम पदार्थों को अपने दैनिक जीवन से कम करना है, तो हमें चीन-जैसी कार्य प्रणाली को भी विकसित करना होगा।
रुपये की साख कैसे बचायें?
अपने रुपये की साख बचाने के लिए हमें बाहरी पदार्थों के आयात को कम करना होगा। उसके लिए एक ही उपाय है कि घरेलू उद्योगों को महत्त्व देना होगा। जहां मशीन की जरूरत है, उसे भी स्वयं निर्मित कर देश को आत्म निर्भर बनाना होगा।
अर्थ शास्त्रियों का मानना है कि डालर का मूल्य अभी बढ़ता ही जाएगा। कम से कम 150 रुपये का एक डालर हो सकता है। इस अवस्था तक पहुंचने के लिए हमें विदेशी वस्तुओं का उपयोग कम करना होगा। तभी रुपये के अवमूल्यन को बचा पाने में कामयाब हो पायेंगे। हाल ही में प्रधानमंत्री ने अपनी एक सलाह में देश के नागरिकों को आगाह किया है कि विदेशी सोना ना खरीदें, बात सही है, यदि आप ने विदोशों से आयातित सोना खरीदा, तो उसके बदले आप रुपये को गवां देंगे। उसकी कीमत दिन प्रति दिन कम होती जाएगी। डालर के हिसाब से आप रुपये का अवमूल्यन करते जाएंगे।
Dollar vs Rupee: देश में सोने की खानें और मिनरल्स भी खोजें
देश में सोने की खानों को खोजकर सोना पाया जा सकता है। हालांकि वह सोना ज्यादा मात्रा में नहीं होगा, अनुमान है कि एक टन सोना खानों से मिल सकता है । चीन ने अपने देश में करंसी को मजबूत करने के लिए सोने की खानों से सोना लेना शुरू कर दिया है, हालांकि उसकी गुणवत्ता अच्छी नहीं है, पर उसके पास अपनी खानों से प्राप्त सोना तो उपलब्ध है। भारत सोने के अलावा सागरों से बहुत सारे मिनरल्स भी ले सकता है। आज हम जिसे बाहर से आयात कर रहे हैं, उसे अपनी तकनीकी अपनाकर स्वयं भी प्राप्त कर सकते हैं। इस कार्य को करने से देश आयात पर निर्भर न होकर निर्यात कर, अपने रुपये की साख बढ़ा सकता है, इससे बेतहासा मूल्यों को बढ़ने से रोका जा सकता है। बाहरी दुनिया के पेट्रोलियम उत्पादों को एकदम तो आप कम नहीं कर सकते, क्योंकि दैनिक जीवन की आवश्यकता को हम अभी कोई दूसरा विकल्प नहीं दे सके। डेढ़ सौ करोड़ की आबादी की जरूरतों को पूरा करने के लिए फिलहाल आयातित पेट्रोलियम पर ही निर्भर रहना होगा। लेकिन यह स्थाई हल नहीं है। हमें आत्मनिर्भरता के ठोस उपायों को दिनचर्या में लाना होगा। सौर ऊर्जा की हमारे देश में कमी नहीं हो सकती, सूर्य देव की हमारे ऊपर दृष्टि है, हमें उसके द्वारा दिये सूर्य किरणों को और मात्रा में अपने काम में लाने की तकनीकी का इजाद करना होगा।
सौर ऊर्जा ही विकल्प
80 के शुरुआती दशक में एक लेख में मैंने सौर ऊर्जा पर लिखा था, उस समय सूर्य की किरणों का उपयोग करने का दौर नहीं था; तकनीकी का ज्ञान भी नहीं था। उस काल में भारत ही नहीं, विश्व में सौर ऊर्जा के प्रयोग पर काम नहीं हुआ था। उस लेख में मैंने सलाह दी थी कि भारत अपनी ऊर्जा की कमी को सूर्य की किरणों का उपयोग कर ला सकता है। आज 40 साल बाद मुझे लगता है कि वास्तव में भारतीय वैज्ञानिक सौर ऊर्जा से खनिज उर्जा का विस्थापन आसानी से कर रहे हैं। आने वाला समय सौर ऊर्जा का काल होगा। ऐसा लगता है, क्योंकि खनिज तेल भी कितने समय तक रहेगा। एक न एक दिन वह समाप्ति की ओर है। ऊर्जा प्राप्त करने के और भी स्रोत हैं-जैसे पवन ऊर्जा, परमाणु ऊर्जा और पन बिजली, लेकिन इनका बड़ी मात्रा में उपयोग कर पाना संभव नहीं है, क्योंकि स्रोत सीमित हैं। देश को आयात पर नहीं निर्यात पर जोर देना होगा, तभी हमारा रुपया मजबूत हो पायेगा।
लेखक: भगवती प्रसाद डोभाल








