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19 साल बाद रिश्वत केस में बरी हुआ क्लर्क, कोर्ट बोली- सिर्फ पैसे मिलने से कोई दोषी नहीं हो जाता

Maharashtra news: महाराष्ट्र के ठाणे की एक विशेष CBI कोर्ट से ऐसा मामला सामने आया है, जिसने एक बार फिर देश की धीमी न्याय व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं। कोर्ट ने केंद्र सरकार के एक पूर्व कर्मचारी को रिश्वत मामले में पूरे 19 साल बाद बरी कर दिया। अदालत ने साफ कहा कि सिर्फ आरोपी के पास से पैसे मिलने भर से उसे दोषी नहीं माना जा सकता, जब तक रिश्वत मांगने का ठोस सबूत मौजूद न हो।

क्या था पूरा मामला?

यह मामला साल 2006 का है। अरविंद मोतीराम सावंत उस समय नवी मुंबई के सीबीडी बेलापुर स्थित रजिस्ट्रार ऑफ कंपनीज (ROC) कार्यालय में क्लर्क के पद पर तैनात थे। शिकायतकर्ता ने एक निजी कंपनी के दस्तावेजों की प्रमाणित कॉपी जल्दी हासिल करने के लिए ROC ऑफिस से संपर्क किया था। इन दस्तावेजों का इस्तेमाल अनधिकृत निर्माणों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई में होना था। CBI के मुताबिक, अरविंद सावंत ने फाइल जल्दी आगे बढ़ाने के बदले 1,000 रुपये रिश्वत मांगी थी। बाद में यह रकम घटाकर 800 रुपये कर दी गई।

Maharashtra news: CBI ने ऐसे बिछाया था जाल

शिकायत मिलने के बाद CBI ने 22 अगस्त 2006 को ट्रैप लगाया। एजेंसी का दावा था कि आरोपी को रिश्वत लेते हुए रंगे हाथ पकड़ लिया गया और उसके पास से 800 रुपये बरामद किए गए। हालांकि, सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष ने कई अहम बातें कोर्ट के सामने रखीं। वकीलों ने दलील दी कि अरविंद सावंत के पास प्रमाणित दस्तावेज जारी करने का अधिकार ही नहीं था। वह अंतिम हस्ताक्षरकर्ता भी नहीं थे, इसलिए यह साबित नहीं हो सका कि वह काम करवाने की स्थिति में थे।

Maharashtra news: कोर्ट ने फैसले में क्या कहा?

विशेष न्यायाधीश डी. एस. देशमुख ने अपने फैसले में कहा कि अगर रिश्वत मांगने का पक्का और भरोसेमंद सबूत नहीं है, तो सिर्फ आरोपी के पास से पैसे मिलने के आधार पर उसे दोषी नहीं ठहराया जा सकता। कोर्ट ने माना कि प्रॉसिक्यूशन रिश्वत मांगने का आरोप साबित करने में असफल रहा। इसी आधार पर अरविंद सावंत को सभी आरोपों से बरी कर दिया गया।

19 साल तक चला मुकदमा

Maharashtra news: इस केस का सबसे चौंकाने वाला पहलू यह रहा कि एक मामूली 800 रुपये की कथित रिश्वत का मामला करीब 19 साल तक अदालत में चलता रहा। अब जाकर आरोपी को राहत मिली है।

 

 

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