27 wives divorce story: लखनऊ के आखिरी नवाब वाजिद अली शाह का जीवन शानो-शौकत, संगीत, शायरी और कला प्रेम के लिए जितना प्रसिद्ध रहा, उतना ही उनके जीवन से जुड़े कुछ फैसले आज भी इतिहासकारों के बीच चर्चा का विषय बने हुए हैं। इन्हीं में से एक घटना 31 जुलाई 1878 की है, जब नवाब ने एक ही दिन में अपनी 27 बेगमों को तलाक देकर सबको चौंका दिया। यह फैसला किसी पारिवारिक विवाद का नतीजा नहीं था, बल्कि ब्रिटिश हुकूमत की दखलअंदाजी के खिलाफ उनका अनोखा विरोध माना जाता है।
अवध का ताज छिना, फिर कलकत्ता में शुरू हुआ नया संघर्ष
साल 1856 में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने अवध का विलय कर नवाब वाजिद अली शाह को सत्ता से बेदखल कर दिया। अपने राज्य से दूर होने का दर्द उनके जीवन का सबसे बड़ा आघात था। कहा जाता है कि इसी दौर में उन्होंने अपना प्रसिद्ध गीत “बाबुल मोरा नैहर छूटो जाए” रचा।लखनऊ छोड़ने के बाद नवाब अपने परिवार और दरबारियों के साथ कलकत्ता पहुंचे। शुरुआत में उनका इरादा इंग्लैंड जाकर क्वीन विक्टोरिया से न्याय की गुहार लगाने का था, लेकिन बाद में उन्होंने कलकत्ता में ही रहने का फैसला किया।
27 wives divorce story: मटियाबुर्ज में बसाया ‘छोटा लखनऊ’
1857 के विद्रोह के दौरान अंग्रेजों ने नवाब की लोकप्रियता को देखते हुए उन्हें कुछ समय के लिए फोर्ट विलियम में नजरबंद रखा। रिहाई के बाद उन्हें हुगली नदी किनारे स्थित मटियाबुर्ज में रहने की अनुमति दी गई।यहां नवाब ने अपने निवास का नाम ‘सुल्तान खाना’ रखा और आसपास के कई भवन लेकर एक ऐसा परिसर बसाया, जिसे लोग ‘छोटा लखनऊ’ कहने लगे। उनके साथ बड़ी संख्या में परिवार, बेगमें, बच्चे, नौकर और दरबारी भी रहते थे। कई ऐतिहासिक विवरणों में उनके हरम और आश्रितों की संख्या सैकड़ों में बताई जाती है।
27 wives divorce story: पेंशन कम, खर्च ज्यादा… बढ़ती गई आर्थिक परेशानी
अंग्रेजी सरकार नवाब को हर महीने एक लाख रुपये की पेंशन देती थी। लेकिन शाही परिवार और सैकड़ों आश्रितों का खर्च उठाना इस रकम में आसान नहीं था। आर्थिक तंगी धीरे-धीरे गहराने लगी और नवाब को कई मुश्किलों का सामना करना पड़ा।इसी दौरान नवाब की एक बेगम माशूक महल के बेटे ने ब्रिटिश अधिकारियों से शिकायत की कि उसकी मां को पर्याप्त भरण-पोषण नहीं मिल रहा है। बिना नवाब का पक्ष सुने अंग्रेज अधिकारियों ने आदेश जारी कर दिया कि माशूक महल के खर्च के लिए हर महीने ढाई हजार रुपये अतिरिक्त दिए जाएं।नवाब को यह फैसला सिर्फ आर्थिक बोझ नहीं, बल्कि उनके निजी मामलों में सीधी दखलअंदाजी लगा। इससे उनके आत्मसम्मान को गहरी ठेस पहुंची।
31 जुलाई 1878: जब एक साथ 27 बेगमों को दे दिया तलाक
ब्रिटिश सरकार के इस रवैये के विरोध में नवाब वाजिद अली शाह ने 31 जुलाई 1878 को एक ऐसा कदम उठाया, जिसकी चर्चा आज भी होती है। उन्होंने माशूक महल समेत अपनी 27 बेगमों को एक ही दिन में तलाक दे दिया।इतिहासकारों के अनुसार, नवाब ने अंग्रेजी हुकूमत को यह संदेश दिया कि उनकी आर्थिक स्थिति इतनी कमजोर हो चुकी है कि वे इन बेगमों का खर्च वहन करने में सक्षम नहीं हैं। इसे अंग्रेजों के आर्थिक दबाव और निजी जीवन में हस्तक्षेप के खिलाफ उनके शांत लेकिन सशक्त विरोध के रूप में देखा जाता है।
27 wives divorce story: इतिहास में दर्ज रह गई यह घटना
वाजिद अली शाह का यह फैसला आज भी इतिहास की सबसे असाधारण घटनाओं में गिना जाता है। हालांकि उनके परिवार, बेगमों और हरम की संख्या को लेकर अलग-अलग ऐतिहासिक स्रोतों में भिन्न-भिन्न दावे मिलते हैं, लेकिन इतना तय है कि अंग्रेजी शासन के दौर में उन्होंने अपने आत्मसम्मान और विरोध को व्यक्त करने के लिए कई अनोखे तरीके अपनाए।यह घटना केवल एक शाही परिवार की निजी कहानी नहीं, बल्कि उस दौर के राजनीतिक दबाव, आर्थिक संकट और औपनिवेशिक हस्तक्षेप की भी एक महत्वपूर्ण झलक पेश करती है।








