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क्या भूख हड़ताल के दौरान मौत होने पर सरकार देती है मुआवजा? जानिए कानून क्या कहता है

क्या भूख हड़ताल के दौरान मौत होने पर सरकार देती है मुआवजा? जानिए कानून क्या कहता है

Sonam Wangchuk Hunger Strike:  देश में जब भी किसी बड़े जन आंदोलन या विरोध प्रदर्शन की बात होती है, तो भूख हड़ताल एक शांतिपूर्ण और लोकतांत्रिक माध्यम के रूप में सामने आती है। इन दिनों सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक की भूख हड़ताल को लेकर देशभर में चर्चा हो रही है। इसी बीच लोगों के मन में एक अहम सवाल उठ रहा है कि यदि किसी व्यक्ति की भूख हड़ताल के दौरान मौत हो जाए, तो क्या सरकार उसके परिवार को मुआवजा देने के लिए कानूनी रूप से बाध्य होती है? आइए जानते हैं इस विषय से जुड़े कानूनी प्रावधान और वास्तविक स्थिति।

क्या भूख हड़ताल के दौरान मौत होने पर मुआवजा देना सरकार के लिए अनिवार्य है?

भारतीय कानून में ऐसा कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं है, जिसके तहत भूख हड़ताल के दौरान किसी व्यक्ति की मौत होने पर सरकार के लिए मुआवजा देना अनिवार्य हो। आमतौर पर भूख हड़ताल को व्यक्ति का स्वैच्छिक निर्णय माना जाता है। यही वजह है कि केवल इस आधार पर कि मौत विरोध प्रदर्शन के दौरान हुई है, सरकार पर मुआवजा देने की कानूनी जिम्मेदारी नहीं बनती।

Sonam Wangchuk Hunger Strike: किन परिस्थितियों में सरकार दे सकती है आर्थिक सहायता?

हालांकि कानून सरकार को बाध्य नहीं करता, लेकिन विशेष परिस्थितियों में सरकार मानवीय आधार पर आर्थिक सहायता देने का फैसला कर सकती है। यदि मामला किसी बड़े जनहित के मुद्दे से जुड़ा हो, व्यापक जनसमर्थन प्राप्त हो या परिस्थितियां असाधारण हों, तो राज्य या केंद्र सरकार मुख्यमंत्री राहत कोष, प्रधानमंत्री राहत कोष अथवा अन्य विशेष योजनाओं के माध्यम से अनुग्रह राशि देने का निर्णय ले सकती है। यह पूरी तरह सरकार के विवेक और परिस्थितियों पर निर्भर करता है।

Sonam Wangchuk Hunger Strike: क्या आंदोलन खत्म कराने के लिए राहत पैकेज दिया जा सकता है?

कई बार प्रदर्शनकारियों और प्रशासन के बीच बातचीत के दौरान समझौता हो जाता है। ऐसे मामलों में सरकार आर्थिक सहायता, परिवार के किसी सदस्य को नौकरी या अन्य प्रकार की राहत देने की घोषणा कर सकती है। हालांकि यह किसी कानूनी अधिकार के तहत नहीं, बल्कि आपसी सहमति और प्रशासनिक निर्णय के आधार पर होता है।

भूख हड़ताल को लेकर कानून क्या कहता है?

भारतीय संविधान नागरिकों को शांतिपूर्ण तरीके से विरोध प्रदर्शन करने का अधिकार देता है। लेकिन इसके साथ ही प्रशासन की जिम्मेदारी नागरिकों के जीवन और स्वास्थ्य की रक्षा करना भी है। यदि किसी अनशनकारी की तबीयत गंभीर रूप से बिगड़ जाती है, तो प्रशासन चिकित्सकीय सलाह के आधार पर उसे अस्पताल में भर्ती करा सकता है ताकि उसकी जान बचाई जा सके। कई मामलों में अदालतों ने भी जीवन की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देने की बात कही है।कुल मिलाकर, भूख हड़ताल के दौरान किसी व्यक्ति की मृत्यु होने पर सरकार के लिए मुआवजा देना कानूनी रूप से अनिवार्य नहीं है। हालांकि विशेष परिस्थितियों में मानवीय, सामाजिक या राजनीतिक आधार पर आर्थिक सहायता दी जा सकती है। ऐसे मामलों में अंतिम फैसला संबंधित सरकार और प्रशासन परिस्थितियों को देखते हुए लेते हैं। इसलिए हर मामले का निर्णय उसके तथ्यों, परिस्थितियों और सरकारी नीति के आधार पर अलग-अलग हो सकता है।

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