US Tariff on India: अमेरिका की ओर से भारत समेत रूसी कच्चे तेल खरीदने वाले देशों पर 100% तक टैरिफ लगाने की धमकी के बीच भारतीय निर्यात को लेकर चिंताएं बढ़ गई हैं। हालांकि, अर्थशास्त्री डॉ. एसपी शर्मा का मानना है कि भारत के पास अमेरिका के अलावा कई बड़े वैकल्पिक बाजार मौजूद हैं। उनके मुताबिक, भारत अमेरिकी बाजार पर पूरी तरह निर्भर नहीं है और जरूरत पड़ने पर अपने निर्यात का रुख दूसरे देशों की ओर कर सकता है।
US Tariff on India: 15 देशों में 200 अरब डॉलर का बाजार-
डॉ. एसपी शर्मा के अनुसार, भारत अमेरिका को करीब 87 से 88 अरब डॉलर का मर्चेंडाइज निर्यात करता है। वहीं, इसी तरह के भारतीय उत्पादों के लिए करीब 15 अन्य देशों में 200 अरब डॉलर, यानी लगभग 19 लाख करोड़ रुपये का संभावित बाजार मौजूद है।इन वैकल्पिक बाजारों में नीदरलैंड्स, फ्रांस, ब्रिटेन, सऊदी अरब, यूएई, नेपाल और लैटिन अमेरिका के कई देश शामिल हैं। ऐसे में अमेरिकी टैरिफ बढ़ने की स्थिति में भारतीय निर्यातकों के पास कारोबार को दूसरे बाजारों में फैलाने का विकल्प मौजूद रहेगा।
US Tariff on India: निर्यातकों के लिए नए अवसर-
अमेरिकी बाजार में शुल्क बढ़ने से भारतीय कंपनियों को शुरुआती स्तर पर मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है। लेकिन विशेषज्ञों के मुताबिक, इससे भारत के लिए नए व्यापारिक बाजार तलाशने और निर्यात को अलग-अलग देशों में फैलाने का अवसर भी पैदा हो सकता है। अगर भारतीय कंपनियां इन बाजारों में अपनी मौजूदगी मजबूत करती हैं, तो अमेरिका पर निर्भरता कम करने के साथ-साथ निर्यात के नए रास्ते खुल सकते हैं।
100% टैरिफ से अमेरिका को भी नुकसान-
डॉ. एसपी शर्मा ने यह भी कहा कि भारत और अमेरिका के बीच लंबे समय से मजबूत कारोबारी रिश्ते हैं और दोनों देश द्विपक्षीय व्यापार समझौते पर बातचीत कर रहे हैं। ऐसे में भारतीय सामान पर 100% तक टैरिफ लगाने का फैसला अमेरिका के लिए भी नुकसानदायक हो सकता है। भारी आयात शुल्क लगाए जाने पर भारतीय उत्पाद अमेरिकी बाजार में महंगे हो जाएंगे। इसका सीधा असर अमेरिकी उपभोक्ताओं पर पड़ सकता है और उनकी खरीदारी की लागत बढ़ सकती है।
अमेरिकी उपभोक्ताओं पर बढ़ सकता है महंगाई का दबाव-
भारतीय उत्पादों पर ज्यादा टैरिफ का बोझ आखिरकार अमेरिकी आयातकों और उपभोक्ताओं तक पहुंच सकता है। इससे कई सामानों की कीमत बढ़ने की संभावना है और अमेरिका में महंगाई का दबाव भी बढ़ सकता है। ऐसे में भारत के सामने जहां नए निर्यात बाजारों का विस्तार करने का विकल्प है, वहीं अमेरिका को भी यह फैसला लेने से पहले अपने उपभोक्ताओं और व्यापार पर पड़ने वाले असर को ध्यान में रखना होगा।







