SC ST Act: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने SC/ST एक्ट से जुड़े एक मामले में अहम टिप्पणी करते हुए कहा है कि केवल जातिसूचक शब्द का इस्तेमाल कर देना अपने आप में इस कानून के तहत अपराध नहीं बन जाता। अदालत के मुताबिक यह भी देखना जरूरी है कि कथित तौर पर जातिसूचक टिप्पणी करने वाले व्यक्ति की संबंधित व्यक्ति को उसकी जाति के आधार पर अपमानित या नीचा दिखाने की मंशा थी या नहीं। इसके लिए आरोपों के साथ ठोस और प्रथम दृष्टया विश्वसनीय साक्ष्य भी जरूरी हैं। जस्टिस संतोष राय की एकल पीठ ने बरेली के मामले की सुनवाई करते हुए वेगराज सिंह और दौलत को राहत दी और उनके खिलाफ निचली अदालत की ओर से जारी सम्मन आदेश को रद्द कर दिया।
जाति के आधार पर अपमान की मंशा जरूरी
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि SC/ST अधिनियम के तहत अपराध का मामला बनाने के लिए केवल जातिसूचक शब्द का उल्लेख पर्याप्त नहीं है। आरोपों और उपलब्ध सामग्री से यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि आरोपी ने संबंधित व्यक्ति को उसकी जाति के कारण अपमानित करने या नीचा दिखाने के इरादे से कथित टिप्पणी की थी। अदालत ने कहा कि मामले में याचिकाकर्ताओं के खिलाफ प्रथम दृष्टया ऐसा ठोस आधार सामने नहीं आया, जिससे यह साबित हो सके कि उन्होंने जातिगत अपमान करने की मंशा से कोई भूमिका निभाई थी।
SC ST Act: पिता और भाई के खिलाफ भी दर्ज हुई थी FIR
मामला बरेली के इज्जतनगर थाने से जुड़ा है। यहां मुख्य आरोपी हिम्मत सिंह के साथ उसके पिता वेगराज सिंह और भाई दौलत को भी FIR में नामजद किया गया था। पुलिस जांच के दौरान पीड़िता के बयानों के आधार पर हिम्मत सिंह के खिलाफ आरोप पत्र दाखिल किया गया, जबकि वेगराज सिंह और दौलत को जांच के बाद क्लीन चिट दे दी गई थी। हालांकि बाद में ट्रायल कोर्ट ने पीड़िता के बयान के आधार पर दोनों को सम्मन जारी कर दिया। इसके खिलाफ वेगराज सिंह और दौलत ने हाईकोर्ट का रुख किया था।
शुरुआती बयानों में दोनों की भूमिका स्पष्ट नहीं
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने मामले के रिकॉर्ड का परीक्षण किया। अदालत ने पाया कि पीड़िता के शुरुआती बयानों में वेगराज सिंह और दौलत की कोई विशिष्ट भूमिका स्पष्ट रूप से सामने नहीं आई थी। शुरुआती आरोप मुख्य रूप से हिम्मत सिंह के खिलाफ थे। इसके अलावा पुलिस जांच के बाद दोनों याचिकाकर्ताओं को क्लीन चिट भी मिल चुकी थी। अदालत ने कहा कि केवल सामान्य या अस्पष्ट आरोपों के आधार पर किसी व्यक्ति को आपराधिक मुकदमे में तलब नहीं किया जा सकता। सम्मन जारी करने के लिए अदालत के सामने पर्याप्त सामग्री होनी चाहिए, जिससे संबंधित व्यक्ति की प्रथम दृष्टया भूमिका सामने आए।
SC ST Act: हाईकोर्ट ने सम्मन आदेश किया रद्द
मामले की पूरी सामग्री और उपलब्ध साक्ष्यों का परीक्षण करने के बाद हाईकोर्ट ने माना कि वेगराज सिंह और दौलत के खिलाफ जातिगत अपमान की मंशा या कोई विशिष्ट भूमिका प्रथम दृष्टया साबित नहीं होती है। ऐसे में सामान्य आरोपों के आधार पर उन्हें आपराधिक कार्यवाही का सामना करने के लिए बुलाना उचित नहीं था। अदालत ने निचली अदालत के सम्मन आदेश को रद्द कर दिया और दोनों याचिकाकर्ताओं को राहत दी। हाईकोर्ट की इस टिप्पणी से यह स्पष्ट होता है कि SC/ST एक्ट के मामलों में आरोपों के साथ आरोपी की मंशा, विशिष्ट भूमिका और उपलब्ध ठोस साक्ष्यों का भी न्यायिक स्तर पर परीक्षण किया जाना जरूरी है।
ये भी पढ़ें…लद्दाख में बैठेगी जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट की बेंच, न्याय के लिए नहीं जाना पड़ेगा जम्मू-कश्मीर








