Javelin Missile India: भारत ने अमेरिकी जैवलिन एंटी-टैंक गाइडेड मिसाइल खरीदने की कोशिश साल 2010 में शुरू की थी। करीब 16 साल बाद यह प्रक्रिया एक अहम पड़ाव तक पहुंची है। 28 अगस्त 2026 को भारतीय सेना ने अमेरिका के फॉरेन मिलिट्री सेल्स यानी एफएमएस सिस्टम के तहत जैवलिन की खरीद के लिए लेटर ऑफ ऑफर एंड एक्सेप्टेंस पर हस्ताक्षर किए।
लेकिन सवाल यह है कि आखिर एक मिसाइल सिस्टम को हासिल करने में भारत को 16 साल क्यों लग गए? जिस जैवलिन को भारत ने शुरुआत में अपनी तत्काल जरूरत पूरी करने के लिए चुना था, बाद में उसकी जगह इजरायल की स्पाइक मिसाइल क्यों आई? और इतने साल बाद भारत एक बार फिर जैवलिन की ओर क्यों लौटा?इस पूरी कहानी को समझने के लिए सबसे पहले यह जानना जरूरी है कि जैवलिन मिसाइल क्या है और भारतीय सेना को इसकी जरूरत क्यों महसूस हुई।
Javelin Missile India: क्या है जैवलिन मिसाइल?
जैवलिन तीसरी पीढ़ी की मैन-पोर्टेबल एंटी-टैंक गाइडेड मिसाइल यानी एटीजीएम प्रणाली है। इसे अमेरिकी कंपनियों लॉकहीड मार्टिन और रेथियॉन के संयुक्त उपक्रम ने विकसित किया है।इस मिसाइल की सबसे बड़ी खासियत इसका फायर-एंड-फॉरगेट सिस्टम है। इसका मतलब है कि लक्ष्य पर मिसाइल लॉक करके उसे दागने के बाद सैनिक को लगातार उसे दिशा देने की जरूरत नहीं पड़ती। मिसाइल अपने गाइडेंस सिस्टम की मदद से लक्ष्य को खुद ट्रैक करती है।
जैवलिन में टॉप-अटैक क्षमता भी है। इसमें मिसाइल टैंक या बख्तरबंद वाहन के ऊपरी हिस्से को निशाना बना सकती है। आम तौर पर टैंक का ऊपरी हिस्सा उसके सामने वाले हिस्से की तुलना में कम सुरक्षित होता है। इसी वजह से आधुनिक टैंकों और बख्तरबंद वाहनों के खिलाफ जैवलिन को एक महत्वपूर्ण हथियार माना जाता है।

भारतीय सेना को जैवलिन की जरूरत क्यों पड़ी?
भारत में जैवलिन की कहानी साल 2010 में शुरू हुई थी। उस समय भारतीय सेना फ्रांस की मिलन-2टी और सोवियत संघ से मिली कॉनकर्स जैसी पुरानी एंटी-टैंक मिसाइल प्रणालियों का इस्तेमाल कर रही थी। इन पुराने सिस्टम को धीरे-धीरे बदलने की जरूरत थी।दूसरी ओर, भारत की स्वदेशी एंटी-टैंक मिसाइल परियोजनाओं की रफ्तार भी उम्मीद के मुताबिक नहीं थी। इससे सेना के सामने एंटी-टैंक मिसाइल क्षमता में एक बड़ा अंतर पैदा हो रहा था।
सेना को ऐसे आधुनिक एटीजीएम की जरूरत थी जो आधुनिक टैंकों के खिलाफ प्रभावी हो, सैनिकों के लिए इस्तेमाल करना आसान हो और लक्ष्य पर हमला करने के बाद ऑपरेटर को मिसाइल को लगातार गाइड न करना पड़े।इसके अलावा युद्ध के मुश्किल हालात में इसका इस्तेमाल आसान होना और भविष्य में इसे भारत के रक्षा उत्पादन तंत्र के साथ जोड़ पाना भी महत्वपूर्ण था। जैवलिन इन जरूरतों के काफी करीब थी।
Javelin Missile India: 2010 में भारत ने जैवलिन को क्यों चुना?
अगस्त 2010 में तत्कालीन रक्षा मंत्री एके एंटनी ने संसद में बताया था कि भारत अमेरिका से जैवलिन एंटी-टैंक गाइडेड मिसाइल खरीदने के लिए लेटर ऑफ रिक्वेस्ट जारी करने की योजना बना रहा है। यह खरीद फॉरेन मिलिट्री सेल्स यानी एफएमएस के माध्यम से होनी थी।जैवलिन को चुनने के पीछे भारत की तत्काल जरूरत एक बड़ी वजह थी। उस समय स्वदेशी एंटी-टैंक मिसाइल सिस्टम के विकास में भी देरी हो रही थी।इसके अलावा भारत 2009 में अमेरिका के साथ हुए संयुक्त सैन्य अभ्यास के दौरान जैवलिन की क्षमताओं का प्रदर्शन देख चुका था। इसलिए सेना को इस सिस्टम की उपयोगिता का अंदाजा पहले से था।

सेना के लिए जैवलिन क्यों महत्वपूर्ण है?
जैवलिन की तकनीक भारतीय सेना की जरूरतों के हिसाब से काफी उपयोगी मानी जाती है।इसका फायर-एंड-फॉरगेट फीचर सैनिक को मिसाइल दागने के बाद उसे लगातार नियंत्रित करने से मुक्त करता है। वहीं इसकी टॉप-अटैक क्षमता टैंक के ऊपरी हिस्से को निशाना बनाने में मदद करती है।एक और बड़ी खासियत यह है कि इसे युद्ध क्षेत्र में बहुत छोटी टीम भी इस्तेमाल कर सकती है। मिसाइल लक्ष्य की थर्मल इमेज के आधार पर उसे ट्रैक करने में सक्षम है।
Javelin Missile India: फिर जैवलिन की डील क्यों रुक गई?
भारत की योजना सिर्फ जैवलिन मिसाइल खरीदने तक सीमित नहीं थी। भारत चाहता था कि उसे इस सिस्टम की तकनीक का ट्रांसफर भी मिले और भविष्य में जैवलिन का उत्पादन भारत में किया जा सके।लेकिन उस समय अमेरिका इसके लिए पूरी तरह तैयार नहीं था। अमेरिका अपनी गाइडेड मिसाइल की लक्ष्य को लॉक करने वाली 100 प्रतिशत तकनीक भारत के साथ साझा करने के लिए तैयार नहीं हुआ।
इस वजह से जैवलिन की शुरुआती खरीद प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ सकी।2012 में अमेरिकी कांग्रेस की रिसर्च सर्विस की रिपोर्ट में भी भारत की जैवलिन खरीद को लेकर संयुक्त उत्पादन और तकनीक के हस्तांतरण जैसे मुद्दों का उल्लेख किया गया था।
जैवलिन की जगह स्पाइक क्यों आई?
जैवलिन की खरीद प्रक्रिया रुकने के बाद भारत ने इजरायल की स्पाइक एंटी-टैंक गाइडेड मिसाइल को विकल्प के तौर पर देखना शुरू किया।साल 2014 में भारत ने 8,000 से अधिक स्पाइक मिसाइल खरीदने की मंजूरी भी दे दी। स्पाइक भारत की उस मांग को स्वीकार करने के लिए तैयार थी, जिसमें तकनीक के हस्तांतरण और भारत में ही उत्पादन की बात शामिल थी।
हालांकि, स्पाइक के साथ अंतिम समझौते की प्रक्रिया भी काफी लंबी चली। इस दौरान मिसाइल के परीक्षण में प्रदर्शन, तकनीक हस्तांतरण और डीआरडीओ के स्वदेशी एंटी-टैंक गाइडेड मिसाइल कार्यक्रम में हुई प्रगति जैसे मुद्दे सामने आए। इन वजहों से प्रक्रिया में और देरी हुई।लंबी बातचीत के बाद 2017 में स्पाइक की खरीद प्रक्रिया रद्द कर दी गई। 2018 में इसे दोबारा आगे बढ़ाने की कोशिश हुई, लेकिन कुछ ही समय बाद यह प्रक्रिया फिर ठंडे बस्ते में चली गई।
Javelin Missile India: स्पाइक रुकी, लेकिन जरूरत बनी रही
स्पाइक की खरीद रुकने के बावजूद भारतीय सेना की एंटी-टैंक गाइडेड मिसाइल की जरूरत खत्म नहीं हुई।2019 में तत्काल जरूरत को देखते हुए भारत ने सीमित संख्या में चौथी पीढ़ी की स्पाइक लंबी दूरी की मिसाइलों की आपात खरीद की।इसके बाद 2023 में कल्याणी रफाएल एडवांस सिस्टम को रक्षा मंत्रालय से 287.51 करोड़ रुपये का ऑर्डर भी मिला।हालांकि इन प्रयासों के बावजूद भारतीय सेना की एंटी-टैंक गाइडेड मिसाइलों की जरूरत पूरी तरह खत्म नहीं हुई। इसी वजह से जैवलिन मिसाइल की चर्चा एक बार फिर शुरू होने लगी।
Javelin Missile India: भारत फिर जैवलिन की ओर क्यों लौटा?
इस बार भारत और अमेरिका के संबंध साल 2010 की तुलना में काफी बदल चुके थे। पिछले डेढ़ दशक में दोनों देशों के बीच रक्षा सहयोग काफी मजबूत हुआ है।अब दोनों देशों के बीच बातचीत सिर्फ अमेरिकी हथियार खरीदने तक सीमित नहीं रही। रक्षा उत्पादन, सह-निर्माण और भारतीय कंपनियों के साथ औद्योगिक स्तर पर साझेदारी पर भी ज्यादा जोर दिया जाने लगा।इसी बदले हुए माहौल में जैवलिन एक बार फिर चर्चा में आई।2025 में अमेरिकी कांग्रेस की रिसर्च सर्विस ने जैवलिन के सह-उत्पादन को लेकर चल रही बातचीत का उल्लेख किया। फरवरी 2025 में जैवलिन के संयुक्त उपक्रम ने भारत में इसकी को-असेंबली और को-प्रोडक्शन की संभावनाएं तलाशने की बात कही।इसी दौरान भारत डायनेमिक्स लिमिटेड के साथ एक समझौता ज्ञापन पर भी हस्ताक्षर किए गए।इससे संकेत मिला कि इस बार बातचीत सिर्फ मिसाइल खरीदने और उसके इस्तेमाल तक सीमित नहीं थी। भारत भविष्य में जैवलिन के उत्पादन से जुड़े इकोसिस्टम में अपनी भूमिका बढ़ाना चाहता था।
ऑपरेशन सिंदूर के बाद जैवलिन की अहमियत क्यों बढ़ी?
साल 2025 में ऑपरेशन सिंदूर के बाद सटीक हमलों की जरूरत और दुश्मन के बख्तरबंद वाहनों, टैंकों तथा युद्ध क्षेत्र में इस्तेमाल होने वाली गाड़ियों को नष्ट करने की क्षमता पर ज्यादा ध्यान गया।इसी दौरान भारत और अमेरिका के बीच व्यापक रणनीतिक और व्यापारिक बातचीत भी चल रही थी।जुलाई 2025 तक यह सामने आ चुका था कि भारत जैवलिन की खरीद को लेकर अमेरिका से बातचीत कर रहा है। इसमें तत्काल जरूरत पूरी करने के लिए आपात खरीद और लंबी अवधि के लिए अलग समझौते की संभावना शामिल थी।अमेरिका ने नवंबर 2025 में इस बिक्री को मंजूरी दी।इसके बाद 28 अगस्त 2026 को भारतीय सेना ने समझौते से जुड़े लेटर ऑफ ऑफर एंड एक्सेप्टेंस पर हस्ताक्षर कर दिए। इस तरह 2010 में शुरू हुई जैवलिन की कहानी 16 साल बाद एक महत्वपूर्ण पड़ाव तक पहुंच गई।

क्या इसका मतलब स्वदेशी एटीजीएम कार्यक्रम नाकाम रहा?
ऐसा नहीं है। भारत विदेशी एंटी-टैंक गाइडेड मिसाइल की तत्काल जरूरत पूरी करने के साथ-साथ अपनी स्वदेशी क्षमता विकसित करने पर भी लगातार काम कर रहा है।डीआरडीओ का मैन-पोर्टेबल एंटी-टैंक गाइडेड मिसाइल कार्यक्रम इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।इस साल डीआरडीओ ने महाराष्ट्र के केके रेंज में चलते हुए लक्ष्य के खिलाफ टॉप-अटैक प्रोफाइल में इस मिसाइल का फ्लाइट टेस्ट किया।स्वदेशी मैन-पोर्टेबल एटीजीएम में इमेजिंग इंफ्रारेड होमिंग सीकर, फायर कंट्रोल सिस्टम, टैंडम वॉरहेड, प्रोपल्शन सिस्टम और एडवांस साइटिंग सिस्टम जैसी तकनीकें शामिल हैं।इसे ट्राइपॉड या सैन्य वाहन पर लगे लॉन्चर से भी इस्तेमाल किया जा सकता है।
Javelin Missile India: भारत की रणनीति क्या है?
पूरी तस्वीर को देखें तो भारत की रणनीति अब दो स्तरों पर आगे बढ़ रही है।एक तरफ सेना की तत्काल जरूरत पूरी करने के लिए विदेशी आधुनिक सिस्टम हासिल किए जा रहे हैं। दूसरी तरफ लंबी अवधि के लिए स्वदेशी एंटी-टैंक गाइडेड मिसाइल क्षमता विकसित की जा रही है।यानी जैवलिन की खरीद को केवल एक मिसाइल की खरीद के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए। इसके पीछे तत्काल सैन्य जरूरत, तकनीक, रक्षा उत्पादन और भारत की लंबी अवधि की आत्मनिर्भरता इन सभी पहलुओं की भूमिका रही है।








