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गलवान से दिल्ली तक… क्या बदल गया भारत-चीन का रिश्ता? जिनपिंग के दौरे के 5 बड़े मायने, जानिए असली कहानी

China India Relations: गलवान की हिंसक झड़प के बाद जिस भारत-चीन रिश्ते में कई साल तक तनाव और अविश्वास हावी रहा, उसमें अब धीरे-धीरे बातचीत की वापसी दिखाई दे रही है। सात साल बाद चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग का दिल्ली पहुंचना और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ उनकी करीब 50 मिनट की द्विपक्षीय बैठक इसी बदलाव का बड़ा संकेत है। हालांकि इसे दोनों देशों की दोस्ती की वापसी कहना अभी जल्दबाजी होगी।

असल तस्वीर यह है कि भारत और चीन टकराव से बचने और संवाद बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन सीमा विवाद, चीन-पाकिस्तान की नजदीकी और भारी व्यापार घाटा अब भी रिश्तों की सबसे बड़ी बाधाएं हैं। ऐसे में जिनपिंग का दिल्ली दौरा किसी बड़े गठबंधन से ज्यादा रिश्तों को स्थिर करने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है।

1. गलवान के बाद पहली बड़ी तस्वीर- बातचीत का रास्ता फिर खुला

शी जिनपिंग अक्टूबर 2019 में आखिरी बार भारत आए थे। इसके कुछ महीनों बाद दुनिया कोविड महामारी की चपेट में आई और जून 2020 में गलवान घाटी की हिंसक झड़प ने भारत-चीन संबंधों को गंभीर संकट में डाल दिया।

दोनों देशों ने LAC पर बड़ी संख्या में सैनिक और सैन्य संसाधन तैनात किए। इसके साथ ही राजनीतिक और आर्थिक रिश्तों पर भी तनाव का असर पड़ा। लेकिन 2024 में सीमा पर कुछ क्षेत्रों में डिसइंगेजमेंट के बाद संवाद की प्रक्रिया फिर आगे बढ़ी। इसके बाद मोदी और जिनपिंग की मुलाकातों का सिलसिला भी शुरू हुआ। यही वजह है कि सात साल बाद जिनपिंग का दिल्ली आना महज BRICS सम्मेलन में भागीदारी नहीं, बल्कि रिश्तों को धीरे-धीरे सामान्य करने की कोशिश का अगला पड़ाव माना जा रहा है। हालांकि विशेषज्ञ इसे पूर्ण रणनीतिक बदलाव के बजाय फिलहाल टैक्टिकल थॉ यानी तनाव में अस्थायी नरमी मानते हैं।

China India Relations: 2. चीन के साथ रिश्ते सुधारना भारत की मजबूरी भी, जरूरत भी

भारत और चीन एशिया की दो बड़ी अर्थव्यवस्थाएं हैं। दोनों के बीच राजनीतिक मतभेद होने के बावजूद आर्थिक निर्भरता पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। 2025-26 में दोनों देशों के बीच करीब 151 अरब डॉलर का द्विपक्षीय व्यापार हुआ। भारत ने चीन से लगभग 132 अरब डॉलर का आयात किया, जबकि निर्यात करीब 19 अरब डॉलर रहा। यानी भारत का व्यापार घाटा करीब 112 अरब डॉलर तक पहुंच गया।

इलेक्ट्रॉनिक्स, मशीनरी, बैटरी, सोलर कंपोनेंट्स और कई औद्योगिक क्षेत्रों में भारतीय कंपनियां चीनी सप्लाई चेन पर निर्भर हैं। यही भारत की सबसे बड़ी चुनौती है। भारत चीन के साथ व्यापार बढ़ाना चाहता है, लेकिन ऐसा व्यापार नहीं चाहता जिसमें आयात लगातार बढ़े और निर्यात पीछे रह जाए। इसलिए रिश्तों में स्थिरता भारत के लिए सिर्फ कूटनीतिक नहीं, बल्कि आर्थिक और औद्योगिक जरूरत भी है।

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3. जिनपिंग-मोदी की मुलाकात का तीसरा बड़ा संदेश- भारत किसी एक खेमे में नहीं

BRICS में मोदी, जिनपिंग और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की मौजूदगी ने इस दौरे को और महत्वपूर्ण बना दिया है। दुनिया इस समय अमेरिका-चीन प्रतिस्पर्धा, रूस-यूक्रेन युद्ध और पश्चिम एशिया के तनाव जैसे कई संकटों से गुजर रही है। ऐसे में भारत का चीन और रूस के साथ एक मंच पर दिखाई देना कूटनीतिक रूप से महत्वपूर्ण जरूर है।

लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि भारत अमेरिका से दूरी बना रहा है। भारत एक तरफ अमेरिका और यूरोप के साथ रणनीतिक एवं आर्थिक संबंध मजबूत कर रहा है, वहीं रूस के साथ रक्षा और ऊर्जा संबंध बनाए हुए है और चीन के साथ BRICS तथा SCO जैसे मंचों पर संवाद जारी रखता है। यानी भारत का संदेश साफ है- साझेदारी कई देशों से हो सकती है, लेकिन विदेश नीति किसी एक खेमे की शर्तों पर नहीं चलेगी।

China India Relations: 4. BRICS में चीन और भारत की दूरी कम होना क्यों जरूरी?

BRICS अब सिर्फ भारत, चीन, रूस, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका का पुराना समूह नहीं है। इसमें अब 11 पूर्ण सदस्य हैं। इस समूह में भारत और चीन के बीच मतभेद हैं, लेकिन दोनों की भूमिका भी बेहद महत्वपूर्ण है। ऐसे में अगर दोनों देश लगातार टकराव की स्थिति में रहें तो BRICS के भीतर सहमति बनाना मुश्किल हो सकता है।

यही वजह है कि दिल्ली में मोदी-जिनपिंग की बातचीत का असर सिर्फ द्विपक्षीय रिश्तों तक सीमित नहीं माना जा रहा। इसका संबंध BRICS की कार्यक्षमता और ग्लोबल साउथ में उसकी भूमिका से भी है। चीन के लिए भी भारत को नजरअंदाज करना आसान नहीं है। भारत एक बड़ा बाजार है और वैश्विक दक्षिण में उसका राजनीतिक प्रभाव बढ़ा है। वहीं चीन के लिए BRICS की एकजुटता बनाए रखना उसके लिए भी रणनीतिक रूप से अहम है।

5. क्या सीमा विवाद पर कुछ ठोस होगा?

यही वह सवाल है, जिस पर सबसे ज्यादा नजर रहेगी। 1962 के युद्ध से लेकर देपसांग, चुमार, डोकलाम और गलवान तक सीमा विवाद ने भारत-चीन रिश्तों को बार-बार प्रभावित किया है। 2024 के बाद सीमा पर तनाव में कुछ कमी जरूर आई, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि सीमा विवाद खत्म हो गया है। भारत की प्राथमिकता यही रहेगी कि सीमा पर शांति और स्थिरता बनी रहे। सैन्य और राजनयिक संवाद जारी रहे तथा भविष्य में गलवान जैसी स्थिति दोबारा पैदा न हो। इसलिए जिनपिंग के दौरे से व्यापार, वीजा, उड़ानों और लोगों के बीच संपर्क जैसे मुद्दों पर व्यावहारिक प्रगति की उम्मीद ज्यादा है। सीमा विवाद पर किसी अंतिम समाधान की उम्मीद फिलहाल कम दिखाई देती है।

China India Relations: डोभाल की चीन यात्रा ने भी तैयार किया था माहौल

जिनपिंग के दिल्ली आने से पहले राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल की चीन यात्रा भी महत्वपूर्ण रही। दोनों देशों के बीच सीमा प्रबंधन और द्विपक्षीय संबंधों से जुड़े मुद्दों पर बातचीत हुई। इससे संकेत मिलता है कि मोदी-जिनपिंग की बैठक अचानक नहीं हुई। इसके पीछे कई स्तरों पर पहले से चल रही बातचीत की प्रक्रिया थी। ग्वांगझू-दिल्ली उड़ान सेवा की बहाली भी दोनों देशों के बीच लोगों के संपर्क को सामान्य बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा सकता है।

तो क्या भारत और चीन फिर दोस्त बनने वाले हैं?

अभी नहीं। दोनों देशों के बीच रिश्ते जरूर बदले हैं, लेकिन भरोसे की कमी अभी भी सबसे बड़ी समस्या है। सीमा विवाद के साथ चीन-पाकिस्तान की रणनीतिक साझेदारी भी भारत की चिंता बनी हुई है। दूसरी तरफ भारत और चीन के आर्थिक रिश्ते इतने बड़े हैं कि दोनों के लिए एक-दूसरे को पूरी तरह नजरअंदाज करना भी आसान नहीं है। इसलिए मौजूदा स्थिति को “दोस्ती की वापसी” से ज्यादा “तनाव के बीच संवाद की वापसी” कहना सही होगा।

China India Relations: गलवान से दिल्ली तक तस्वीर बदली, लेकिन कहानी अभी बाकी है

गलवान के बाद भारत-चीन रिश्तों में जो दूरी बनी थी, उसमें अब धीरे-धीरे संवाद की जगह बन रही है। जिनपिंग का सात साल बाद दिल्ली आना इसका बड़ा प्रतीक है। लेकिन इस दौरे की असली सफलता किसी एक तस्वीर या बैठक से तय नहीं होगी। यह इस बात से तय होगी कि क्या दोनों देश व्यापार असंतुलन, सीमा प्रबंधन, वीजा, उड़ानों और सैन्य संवाद जैसे मुद्दों पर ठोस कदम उठा पाते हैं। फिलहाल इतना जरूर कहा जा सकता है कि गलवान से दिल्ली तक भारत-चीन रिश्तों की दिशा बदली है—टकराव से बातचीत की ओर। लेकिन भरोसे की मंजिल अभी काफी दूर है।

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