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राजस्थान हाईकोर्ट का स्वागतयोग्य फैसला, धोखेबाज को मिला कड़ा सबक

Opinion: राजस्थान हाईकोर्ट का स्वागतयोग्य फैसला, धोखेबाज को मिला कड़ा सबक
Opinion: सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश पीएन भगवती को जनता का न्यायाधीश कहा जाता था, तो इसके खास मायने थे। हालांकि जनता के न्यायाधीश तो सभी हैं, सभी जनहित में फैसले देते हैं, लेकिन कई बार माननीय न्यायाधीश ऐसे उल्लेखनीय काम कर देते हैं, या ऐसे अहम फैसले सुना देते हैं कि जनता में उनका व्यापक रूप से स्वागत होता है और वे भविष्य के लिए नज़ीर भी बन जाते हैं। न्यायमूर्ति भगवती की अनूठी पहल से देश के आम लोगों के सामान्य पत्रों या पोस्टकार्ड को भी याचिका के रूप में स्वीकार किये जाने की व्यवस्था बनी।गरीब, लाचार और हाशिए पर पड़े लोगों के लिए इससे बढ़कर भला और क्या हो सकता था? इस बीच राजस्थान हाईकोर्ट ने भी एक ऐसा अहम फैसला दिया है जो भविष्य में उन असहाय बुजुर्गों में जीवन जीने की नई उम्मीदें जागाएगा, जो अपने बेटे की मौत के बाद बहू को भरपूर स्नेह देकर उसका ध्यान रखना चाहते हैं, लेकिन बदले में उन्हें सिर्फ धोखा मिलता है।

क्या था मामला?

दरअसल, मामला वर्ष 2017 का है।अजमेर विद्युत वितरण निगम में टेक्निकल हेल्पर के पद पर कार्यरत एक कर्मचारी का निधन हो गया था। बेटे की मृत्यु के बाद सास-ससुर ने उसकी जगह पर बहू को नौकरी दिलवाई, लेकिन अनुकंपा के आधार पर मिली नियुक्ति के बाद बहू को अपने पति के परिजन बोझ लगने लगे, जबकि नियुक्ति के समय उसने शपथ पत्र दिया था कि वह सास-ससुर की देखभाल करेगी।नौकरी मिलने के कुछ समय बाद बहू ने ससुराल छोड़कर दूसरी शादी रचा ली।मजबूरी में सास-ससुर ने वर्ष 2018 में न्याय की गुहार लगाई।हालांकि मामले की सुनवाई के दौरान ससुर का निधन हो गया, लेकिन हाईकोर्ट के फैसले से सास को रोटी के लिए मोहताज नहीं होना पड़ेगा। 

 Opinion: भविष्य के लिए नज़ीर

राजस्थान हाईकोर्ट की जयपुर पीठ ने अपने फैसले में स्पष्ट किया है कि पति की मृत्यु के बाद अनुकंपा के आधार पर नियुक्ति प्राप्त करने वाली बहू यदि दूसरी शादी कर लेती है और ससुराल का सहारा बंद कर देती है, तब भी वह अपनी आश्रित सास के भरण-पोषण के नैतिक व कानूनी दायित्व से मुक्त नहीं हो सकती।जस्टिस आनंद शर्मा की एकलपीठ ने अजमेर विद्युत वितरण निगम लिमिटेड को निर्देश दिये कि बहू के मासिक वेतन में से 25 प्रतिशत राशि काटकर सीधे सास के बैंक खाते में जमा कराई जाए।हाईकोर्ट का यह फैसला न सिर्फ नैतिक और कानूनी दृष्टि से स्वागतयोग्य है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं की दृष्टि से भी दिल को छू लेने वाला है।न्यायमूर्ति शर्मा के ये निर्देश भविष्य में उन असहाय बुजुर्गों के लिए मददगार साबित होंगे जिनके बेटे की जगह बहू अनुकंपा पर नौकरी पा जाए और फिर अपना दायित्व भूल जाए।

हाईकोर्ट की सीख

हाईकोर्ट का फैसला समाज की उन तमाम महिलाओं के लिए सीख है, जो अनुकंपा के आधार पर नियुक्ति तो पा जाती हैं, लेकिन बाद में पति के परिजनों को अधर में छोड़कर अलग राह पकड़ लेती हैं। जिन्हें इस बात का कोई मलाल नहीं रहता कि जिस समाज में वे रह रही हैं, वह समाज उनकी धोखेबाजी को लेकर क्या सोचेगा? यदि कोई महिला नये जीवन की शुरुआत करना चाहती है, तो शौक से कर सकती है, लेकिन इसकी बुनियाद धोखेबाजी पर रखी जाए, तो इसके सफल होने की उम्मीदें कैसे की जा सकती हैं ?
 

Opinion: सरकारें करें विचार

कई बार देखा जाता है कि नौकरी के दौरान कर्मचारी की मृत्यु पर उसकी पत्नी को जीवन यापन के लिए नौकरी, पर्याप्त पैसा और अन्य सुविधाएं मिल जाती हैं, लेकिन बहू के उपेक्षापूर्ण रवैये के कारण दिवंगत कर्मचारी के बुजुर्ग मां-बाप रोटी-रोटी के लिए मोहताज हो जाते हैं।ऐसे संवेदनशील मामलों की गंभीरता को समझते हुए राज्य सरकारों और केंद्र सरकारों को भी इस दिशा में विचार कर कोई कारगर उपाय करने होंगे।सरकारों को चाहिए कि कोई ऐसी व्यवस्था कायम की जाए जिसमें कर्मचारी की मृत्यु के बाद न तो उसकी पत्नी और बच्चों को जीवन यापन के लिए सोचना पड़े और न ही उसके मां-बाप असहाय हो पाएं।