Opinion: सनानत संस्कृति के बहुत गहरे मायने हैं। विडंबना ही है कि देश में उत्तर से लेकर दक्षिण तक ऐसे राजनेताओं की कमी नहीं है, जो स्वयं को संस्कृति का ज्यादा जानकार समझने के चक्कर में हास्यास्पद बातें कर जाते हैं। जो अपनी राजनीति चमकाने के मकसद से सनाततन संस्कृति के सर्वमान्य देवताओं को भी बांटने में संकोच नहीं करते। अपनी बात को सही साबित करने के लिए ऐसे कुतर्क पेश करते हैं कि जिससे उनकी छवि और हास्यास्पद हो जाती है। इन दिनों एक तरफ उत्तराखंड के पर्यटन और धर्मस्व मंत्री सतपाल महाराज सोशल मीडिया में ट्रोल हो रहे हैं, तो दूसरी ओर तेलंगाना के मुख्यमंत्री ए रेवंत रेड्डी ने राम और शिव को बांटने की जो बेतुकी कोशिश की उसके कारण एक नया राजनीतिक विवाद खड़ा हो गया है।
भगवानों को बांटने की राजनीति क्यों?
मुख्यमंत्री ए रेवंत रेड्डी से जब पूछा गया कि कांग्रेस दक्षिण भारतीय राज्यों में काफी लोकप्रिय है, लेकिन उत्तर भारत में क्यों नहीं? इस पर उन्होंने जो बात कही वह शायद ही किसी को पच पाए। उन्होंने कहा, ‘भाजपा ने भगवान राम को हथिया लिया है, जिन्हें उत्तर में पूजा जाता है, जबकि दक्षिणी राज्यों में शिव की पूजा होती है।’ उन्होंने दावा किया कि ‘शिव गरीबों के भगवान हैं, राम अमीरों के भगवान हैं और भाजपा अमीरों की पार्टी है।’ वे यहीं नहीं रुके, बल्कि उन्होंने यह भी कहा, ‘हम द्रविड़ हैं। यहां (उत्तर भारत ) में लोग आर्य हैं।हम भगवान शिव के भक्त हैं और ये भगवान राम के भक्त हैं।पता नहीं मुख्यमंत्री रेड्डी ने यह बात किस आधार पर कही है? क्या उन्हें पता नहीं कि उत्तर से लेकर दक्षिण तक इस देश में भगवान राम और शिव के प्रति एक समान आस्था है? ठीक है कि वे भाजपा के विरोध में हैं, लेकिन भाजपा विरोध के नाम पर क्या इस हद तक कुतर्क पेश किये जाएंगे कि सनातन भगवानों को भी बांट दिया जाए?
Opinion: सस्ती स्वार्थी राजनीति क्यों?
मुख्यमंत्री ए रेवंत रेड्डी को समझना चाहिए कि जिस सनातन संस्कृति में वसुधैव कुटुम्बकम् की भावना निहित है, आखिर उसके देवताओं एवं भगवानों को बांटना कैसे उचित होगा? सनातन संस्कृति के अनुसार ब्रह्मांड के संचालनकर्ता त्रिदेव (ब्रह्मा, विष्णु, महेश) के प्रति देश के सभी भागों में एक समान आस्था है। भगवान राम विष्णु के अवतार माने जाते हैं। पौराणिक मान्यताएं तो ये भी हैं कि रामेश्वरम शिवलिंग की स्थापना भगवान श्री राम ने ही की थी। फिर उन्हें किसी एक पार्टी या भू-भाग से जोड़ने की सोच के लिए आखिर क्या कहा जा सकता है? इसे सस्ती स्वार्थी राजनीति न कहा जाए, तो फिर क्या समझा जाए?

आदि शंकराचार्य को समझिए
कितने दुख की बात है कि आदि जगद्गुरु शंकराचार्य ने दक्षिण से लेकर उत्तर तक देश को एक सांस्कृतिक सूत्र में बांधने के उद्देश्य से जो पुनर्जागरण किया था, आज के राजनेता उस महान कार्य को भी भुलाने की अनावश्यक चेष्टा कर रहे हैं। उन्हें मालूम होना चाहिए कि अपने राजनीतिक स्वार्थों के लिए भले ही वे कोई भी बकवास कर लें, लेकिन वास्तविकता यह है कि रामेश्वरम में केसर चढ़ता है, जो हिमालय में पैदा होता है और बदरीनाथ में नारियल चढ़ता है, जो दक्षिण में पैदा होता है। फिर रेवंत रेड्डी ये कैसे भूल गए कि भगवान शिव सिर्फ दक्षिण में ही पूजनीय नहीं हैं, बल्कि उत्तर भारत में भी कई ज्योतिर्लिंग हैं।किसी राज्य के मुख्यमंत्री को यदि संस्कृति की समझ ही न हो, तो उस राज्य का भगवान ही मालिक है।
Opinion: बदरी धाम में डीजे क्यों ?
अब उत्तर की ओर देखें तो इन दिनों बदरी धाम में डीजे की तेज धुन पर आयोजित एक सांस्कृतिक कार्यक्रम को लेकर जनाक्रोश भड़का हुआ है। लोग राज्य सरकार के खिलाफ जमकर आग उगल रहे हैं। जनता का आक्रोश एक बड़े जन आंदोलन में तब्दील होता दिखाई दे रहा है। दरअसल, बदरी धाम में भगवान विष्णु ध्यानमग्न हैं, इसीलिए वहां शंख ध्वनि नहीं की जाती है, यहां तक कि कुत्ते भी वहां इसलिए नहीं भौंकते कि कहीं भगवान का ध्यान भंग न हो जाए। ऐसे में वहां डीजे की तेज धुन पर धाम की पवित्रता के विरुद्ध अमर्यादित कार्यक्रम कराने की भला क्या जरूरत थी? हालांकि जनाक्रोश तेज हुआ तो सरकारी नुमाइन्दों ने पूरा ठीकरा सेना के सिर फोड़ दिया, लेकिन लोग फिर भी संतुष्ट नहीं हुए। इस बीच उत्तराखंड के पर्यटन और धर्मस्व मंत्री सतपाल महाराज ने विवाद को शांत करने के बजाए एक और विवादित बात कहकर आग में घी डालने का काम कर दिया है।
धर्मस्व मंत्री का कुतर्क
सतपाल महाराज मैदान में कूदे तो बड़े जानकार बनकर, लेकिन उल्टे अपनी पार्टी की छिछालेदर करवा गए। उन्होंने कुतर्क पेश कर दिया कि बदरीनाथ मंदिर के भीतर शंख इसलिए नहीं बजाया जाता क्योंकि वह जानवर की हड्डी से बना होता है। उनके कहने का मतलब था कि मंदिर के बाहर शंख बजाने पर किसी प्रकार की रोक नहीं है, मंदिर परिसर में पहले भी कार्यक्रम होते रहे हैं। इस पर चारधाम तीर्थ पुरोहित महापंचायत और स्थानीय पंडा-पुरोहितों ने कड़ी आपत्ति जताते हुए मंत्री महाराज को शास्त्र पढ़ने की सलाह दी है।महाराज का यह बयान धार्मिक मान्यताओं और परंपराओं के विपरीत है। आखिर में यही कहा जा सकता है कि जिस राज्य के धर्मस्व मंत्री को अपने राज्य की धार्मिक एवं सांस्कृतिक परंपराओं की सामान्य समझ भी न हो, उस राज्य का भी भगवान ही मालिक है।









