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काउंसलिंग सेंटर से हॉस्टल की छठी मंजिल तक… IIT कैंपस में आखिर कहां टूट रहा सिस्टम? 5 साल में 75 मौतें

IIT Students’ Suicides: IIT दिल्ली के डीन पर ऋषिकेश कुमार के परिवार ने यह बात कहने का आरोप लगाया है। परिवार के मुताबिक, उस समय ऋषिकेश भी वहीं मौजूद थे। मां के सामने कही गई इस बात से वह आहत हुए। भाई अभिषेक के अनुसार, ऋषिकेश ने मां से कहा था कि अब और बेइज्जती बर्दाश्त नहीं कर सकते।

इसके कुछ समय बाद 22 अगस्त को ऋषिकेश की मौत हो गई। परिवार का आरोप है कि मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी परेशानी के दौरान संस्थान का रवैया उनके लिए मददगार नहीं रहा। मामले में IIT दिल्ली ने छात्रों की मांग के बाद बाहरी जांच समिति गठित किए जाने की बात कही है। संस्थान के PRO शिव यादव के मुताबिक, जांच जारी है, इसलिए फिलहाल मामले पर ज्यादा जानकारी साझा नहीं की जा सकती।

यह सिर्फ एक परिवार की कहानी नहीं है। पिछले पांच साल में IITs में 75 छात्रों की आत्महत्या की घटनाओं का आंकड़ा सामने आया है। सवाल सिर्फ यह नहीं है कि छात्रों पर पढ़ाई का कितना दबाव है। सवाल यह भी है कि जब कोई छात्र मानसिक या व्यक्तिगत संकट से गुजरता है, तब IIT का सिस्टम उसे किस तरह संभालता है? इसी सवाल का जवाब तलाशने के लिए परिवारों, मौजूदा और पूर्व IIT छात्रों, अधिकारियों और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े लोगों से बातचीत की गई।

ऋषिकेश कुमार: ‘जब तक सही था, सबका दुलारा था’

31 साल के ऋषिकेश कुमार IIT दिल्ली में फिजिक्स से M.Sc. कर रहे थे। परिवार के मुताबिक, उनके पिता की पहले ही मौत हो चुकी थी और परिवार पर करीब 40 लाख रुपये का कर्ज था। ऋषिकेश अपनी मां से कहते थे कि पढ़ाई पूरी करने के बाद वह परिवार का कर्ज उतार देंगे। भाई अभिषेक बताते हैं कि IIT में दाखिले के बाद ऋषिकेश काफी खुश थे। पढ़ाई ठीक चल रही थी और वह क्लास रिप्रेजेंटेटिव भी रहे। लेकिन परिवार में पिता की मौत के बाद वह मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी परेशानी से गुजर चुके थे और दवाइयां ले रहे थे।

परिवार के मुताबिक, IIT के एक होली फेस्ट के दौरान साथियों ने उन्हें भांग पिला दी। इसके बाद पुरानी परेशानियां दोबारा उभर आईं। उनकी तबीयत बिगड़ने पर IIT के अस्पताल में भर्ती कराया गया और काउंसलिंग भी हुई। अभिषेक के मुताबिक, IIT की ओर से आगे इलाज कराने की सलाह दी गई। परिवार ने IIT दिल्ली के पार्टनर अस्पताल VIMHANS में इलाज कराया। वहां डॉक्टर ने उन्हें पढ़ाई के लिए फिट बताया। लेकिन परिवार के मुताबिक, इसके बाद भी मुश्किलें खत्म नहीं हुईं।

IIT Students’ Suicides: ‘मेंटल हेल्थ का पता चला तो नजरिया बदल गया’

अभिषेक का आरोप है कि मानसिक स्वास्थ्य की परेशानी सामने आने के बाद ऋषिकेश के प्रति संस्थान के रवैये में बदलाव आया। उनका कहना है कि हॉस्टल से जुड़े मामले को लेकर परिवार को काउंसलर से HOD और फिर डीन तक जाना पड़ा। इसी दौरान परिवार ने डीन के सामने हुई कथित बातचीत का जिक्र किया है। परिवार का आरोप है कि ऋषिकेश की मां से कहा गया कि वह एक बच्चा नहीं संभाल पा रही हैं, जबकि IIT हजारों बच्चों को संभाल रहा है। परिवार के अनुसार, ऋषिकेश इस बातचीत से काफी आहत हुए।

अभिषेक बताते हैं कि ऋषिकेश कहा करते थे कि जब तक वह ठीक थे, सब उनसे प्यार करते थे। लेकिन मानसिक स्वास्थ्य की परेशानी सामने आने के बाद उन्हें लगता था कि लोग उनसे अलग तरह से व्यवहार कर रहे हैं। IIT दिल्ली ने इस मामले की बाहरी जांच शुरू होने की पुष्टि की है। जांच पूरी होने के बाद ही परिवार के आरोपों और संस्थान की भूमिका को लेकर अंतिम स्थिति स्पष्ट होगी।

प्रकाश की जिंदगी बची, लेकिन IIT की पढ़ाई छूट गई

IIT मद्रास के 2019 बैच के पूर्व छात्र प्रकाश की कहानी अलग है। उन्होंने पहचान सार्वजनिक नहीं करने की शर्त पर अपना अनुभव साझा किया। प्रकाश के मुताबिक, उनके माता-पिता का सितंबर 2018 में तलाक हुआ था। अगले साल उनका IIT में दाखिला हुआ, लेकिन निजी परेशानियों के बीच पढ़ाई में मन लगाना मुश्किल हो गया। वे बताते हैं कि पहले सेमेस्टर में अपेक्षा के मुताबिक नंबर नहीं आए। धीरे-धीरे उन्होंने लोगों से बातचीत कम कर दी और नींद से जुड़ी परेशानी बढ़ने लगी।

IIT Students' Suicides
                                 IIT Students’ Suicides

एक समय उनकी तबीयत इतनी बिगड़ी कि उन्हें अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा। इलाज के बाद जब उन्होंने दोबारा IIT लौटने की कोशिश की, तो हॉस्टल में रहने के लिए साइकोलॉजिस्ट का फिटनेस सर्टिफिकेट मांगा गया। प्रकाश का कहना है कि सर्टिफिकेट देने के बाद भी उन्हें हॉस्टल में रहने की अनुमति नहीं मिली। बाहर रहने का खर्च वहन करना मुश्किल था। आखिरकार उन्हें IIT की पढ़ाई छोड़नी पड़ी। यानी एक मामले में परिवार का आरोप संस्थान के व्यवहार पर सवाल उठाता है, तो दूसरे मामले में छात्र का अनुभव बताता है कि इलाज के बाद कैंपस में वापसी की प्रक्रिया भी किसी छात्र के लिए कितनी अहम हो सकती है।

IIT Students’ Suicides: 2011 का अनुभव, आज भी नहीं भूले शशांत

IIT दिल्ली के पूर्व छात्र शशांत शेखर ने करीब 15 साल पुराना अनुभव साझा किया। 2011 में उनके नाना की मौत हुई। अंतिम संस्कार के लिए वह पटना गए। लौटने तक उनके दो छोटे एग्जाम छूट चुके थे। री-एग्जाम की अनुमति लेने के लिए जब वह प्रोफेसर के पास गए, तो उनके मुताबिक उन्हें बेहद आपत्तिजनक टिप्पणी सुननी पड़ी। शशांत का दावा है कि उनसे कहा गया कि बिहार से रिजर्वेशन के जरिए आने वाले छात्र दबाव नहीं झेल पाते और बहाने बनाते हैं। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि परिवार में हुई मौत पर भी उनसे डेथ सर्टिफिकेट मांगा गया। शशांत कहते हैं कि उस समय वह सिर्फ 20 साल के थे और नाना की मौत से पहले ही दुखी थे। वह मानते हैं कि IIT ने उन्हें आगे बढ़ने का मंच दिया, लेकिन उनका कहना है कि संस्थान में जो गलत है, उस पर बात करना भी जरूरी है।

‘हर हफ्ते नई डेडलाइन, दबाव कभी खत्म नहीं होता’

IIT दिल्ली के मौजूदा BTech छात्र सक्षम भारद्वाज बताते हैं कि कैंपस में दबाव सिर्फ किसी एक परीक्षा तक सीमित नहीं रहता। उनके मुताबिक, एक सेमेस्टर में कई कोर्स होते हैं। हर कोर्स में असाइनमेंट, क्विज और लैब वर्क चलता रहता है। कई बार एक ही सप्ताह में कई डेडलाइन आ जाती हैं। इसके साथ ग्रेड, इंटर्नशिप और नौकरी की चिंता जुड़ जाती है। सक्षम कहते हैं कि जब आसपास के ज्यादातर छात्र अच्छा प्रदर्शन कर रहे हों, तो कमजोर प्रदर्शन करने वाला छात्र खुद को लेकर सवाल करने लगता है। उसे लगता है कि अगर बाकी लोग सब कुछ संभाल पा रहे हैं, तो वह क्यों नहीं कर पा रहा। यही तुलना और लगातार प्रदर्शन का दबाव मानसिक स्वास्थ्य की परेशानी से गुजर रहे छात्र के लिए अतिरिक्त चुनौती बन सकता है।

IIT Students’ Suicides: काउंसलर हैं, लेकिन छात्र पहुंच क्यों नहीं रहे?

IITs में मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी सुविधाएं पहले की तुलना में बढ़ी हैं। कई संस्थानों में काउंसलिंग और वेलनेस सेंटर हैं। IIT दिल्ली के छात्र सक्षम के मुताबिक, हॉस्टल स्तर पर भी काउंसलर उपलब्ध हैं। लेकिन समस्या सिर्फ काउंसलर की मौजूदगी की नहीं है। सक्षम के मुताबिक, कई छात्र अपनी मानसिक परेशानी बताने से इसलिए डरते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि उनकी बात दूसरे छात्रों तक पहुंच सकती है या वे गॉसिप का हिस्सा बन सकते हैं। यानी एक तरफ काउंसलिंग सेंटर मौजूद हैं, दूसरी तरफ छात्र और काउंसलर के बीच भरोसे की दूरी बनी हुई है।

ग्लोबल IIT एल्युम्नाई सपोर्ट ग्रुप के फाउंडर धीरज सिंह भी काउंसलर्स की नियुक्ति और उनकी ट्रेनिंग को महत्वपूर्ण मुद्दा मानते हैं। उनका कहना है कि कुछ मामलों में काउंसलर और फैकल्टी के बीच करीबी संबंध होने की वजह से छात्र खुलकर अपनी परेशानी बताने से बच सकते हैं।

50 में से 47 काउंसलर्स को ट्रेनिंग नहीं मिली

IITs में मानसिक स्वास्थ्य को लेकर कई स्तर पर कमेटियां और गाइडलाइन बन चुकी हैं। 2012 में IITs ने आत्महत्या रोकने के लिए टास्क फोर्स बनाई। 2017 में वेलनेस सेंटर जैसी व्यवस्था पर जोर दिया गया। 2023 में केंद्र सरकार ने छात्रों की मानसिक सेहत को लेकर नई गाइडलाइन जारी की। 2025 में सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद नेशनल टास्क फोर्स यानी NTF का गठन हुआ। लेकिन NTF की पड़ताल ने सिस्टम की तैयारी पर गंभीर सवाल खड़े किए।

रिपोर्ट के मुताबिक, 23 IITs में सिर्फ 4 के पास मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ा SOP था। यानी ज्यादातर संस्थानों में ऐसा लिखित प्रोटोकॉल नहीं मिला कि गंभीर मानसिक संकट में फंसे छात्र के मामले में किस स्तर पर कौन-सा कदम उठाया जाना है। फैकल्टी मेंटरशिप की स्थिति भी पूरी तरह मजबूत नहीं मिली। सिर्फ 4 IITs में फैकल्टी को मेंटरशिप के लिए औपचारिक ट्रेनिंग दिए जाने की जानकारी मिली। सबसे अहम बात काउंसलिंग सिस्टम से जुड़ी थी। 50 काउंसलर्स में से 47 को औपचारिक ट्रेनिंग नहीं मिली थी।

सिर्फ संकट से पहले की व्यवस्था ही नहीं, बल्कि किसी छात्र की मौत के बाद की व्यवस्था को लेकर भी कमी सामने आई। NTF के मुताबिक, किसी भी IIT में छात्र की आत्महत्या के बाद कैंपस के लिए स्पष्ट पोस्ट-सुसाइड प्रोटोकॉल नहीं मिला।

IIT Students’ Suicides: सवाल सिर्फ पढ़ाई के दबाव का नहीं

इन घटनाओं को सिर्फ पढ़ाई के दबाव से जोड़कर देखना आसान है, लेकिन तस्वीर इससे ज्यादा जटिल है। किसी छात्र की मानसिक स्थिति पर परिवार, निजी रिश्ते, आर्थिक दबाव, शैक्षणिक प्रदर्शन, अकेलापन, करियर की चिंता और कैंपस का माहौल- कई चीजों का असर हो सकता है। इसलिए किसी एक घटना की एकमात्र वजह तय करना भी सही नहीं होगा। लेकिन परिवारों और छात्रों के अनुभव एक साझा सवाल जरूर सामने रखते हैं- अगर कोई छात्र संकट में है, तो क्या उसे सिर्फ काउंसलिंग तक पहुंचाना पर्याप्त है या संस्थान के पूरे सिस्टम को उसके साथ खड़ा होना होगा?

IIT मद्रास का उदाहरण क्यों चर्चा में है?

ग्लोबल IIT एल्युम्नाई सपोर्ट ग्रुप के फाउंडर धीरज सिंह IIT मद्रास के एक मामले को संस्थागत जवाबदेही के उदाहरण के तौर पर रखते हैं। उनके मुताबिक, 2023 में IIT मद्रास के एक PhD छात्र की आत्महत्या के बाद परिवार ने उसके सुपरवाइजर पर अकादमिक उत्पीड़न के आरोप लगाए थे। मामले में बाहरी जांच समिति बनाई गई। धीरज सिंह के अनुसार, जांच में आरोप सही पाए गए और संबंधित प्रोफेसर को निलंबित किया गया। धीरज सिंह का तर्क है कि सिर्फ नियम बना देना पर्याप्त नहीं है। जब किसी शिकायत में गलती सामने आए तो जवाबदेही भी तय होनी चाहिए। हालांकि किसी संस्थान में बाद की आत्महत्याओं की संख्या को किसी एक कार्रवाई का सीधा परिणाम मानने के लिए व्यापक और स्वतंत्र अध्ययन की जरूरत होगी।

IIT Students’ Suicides: काउंसलिंग सेंटर से हॉस्टल तक आखिर कहां टूट रहा सिस्टम?

IIT देश के सबसे कठिन और प्रतिस्पर्धी शैक्षणिक संस्थानों में गिने जाते हैं। यहां दाखिला खुद एक बड़ी उपलब्धि माना जाता है। लेकिन कैंपस में दाखिले के बाद हर छात्र की परिस्थितियां एक जैसी नहीं होतीं। किसी के सामने परिवार की समस्या है, किसी के सामने आर्थिक दबाव, किसी के सामने पढ़ाई और करियर की चिंता, तो कोई पहले से मानसिक स्वास्थ्य की परेशानी से जूझ रहा होता है। ऐसे में सवाल सिर्फ यह नहीं कि कैंपस में काउंसलर है या नहीं। सवाल यह है कि क्या छात्र उस काउंसलर तक बिना डर पहुंच सकता है? क्या फैकल्टी मानसिक स्वास्थ्य की समस्या को समझने के लिए प्रशिक्षित है? क्या गंभीर संकट में तुरंत कदम उठाने की स्पष्ट व्यवस्था है? और अगर कोई घटना हो जाए तो क्या संस्थान अपनी व्यवस्था की समीक्षा कर जवाबदेही तय करता है?

इन्हीं सवालों को और गंभीर बनाता है

IIT कैंपस की चमक और देश के सबसे कठिन संस्थानों में पढ़ने का दबाव अपनी जगह है, लेकिन ग्राउंड पर सामने आई कहानियां बताती हैं कि मानसिक स्वास्थ्य को लेकर सिर्फ सुविधा बनाना पर्याप्त नहीं। उस सुविधा तक पहुंच, भरोसा, प्रशिक्षित लोग और संकट के समय संस्थान की तत्काल प्रतिक्रिया- इन सभी कड़ियों का मजबूत होना जरूरी है। यही वह जगह है जहां काउंसलिंग सेंटर से लेकर हॉस्टल तक पूरे सिस्टम की असली परीक्षा होती है।

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