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13 साल की उम्र में नौकरी, 35 रुपये सैलरी और 16 KM पैदल सफर… कैसे सुपरस्टार बने नाना पाटेकर? समझिए पूरा सफर

नाना पाटेकर का 75 वर्ष में हुआ निधन

Actor Nana Patekar Explainer: नाना पाटेकर का 75 साल की उम्र में निधन हो गया। लेकिन पर्दे पर अपनी अलग पहचान बनाने वाले नाना की जिंदगी की शुरुआत ग्लैमर से नहीं, बल्कि संघर्ष से हुई थी। 13 साल की उम्र में उन्होंने परिवार की मदद के लिए काम शुरू किया। फिल्मों के पोस्टर पेंट किए और इसके लिए उन्हें महीने के सिर्फ 35 रुपये मिलते थे। रोजाना करीब 16 किलोमीटर पैदल चलकर काम पर जाना पड़ता था। यहीं से शुरू हुआ वह सफर, जिसने आगे चलकर उन्हें भारतीय सिनेमा के सबसे अलग और प्रभावशाली अभिनेताओं में शामिल कर दिया।

13 साल की उम्र में क्यों करनी पड़ी नौकरी?

नाना पाटेकर का जन्म 1 जनवरी 1951 को महाराष्ट्र के मुरुड-जंजीरा में हुआ था। उनका बचपन आर्थिक मुश्किलों के बीच बीता। एक पुराने इंटरव्यू में उन्होंने बताया था कि महज 13 साल की उम्र में उन्होंने परिवार की मदद के लिए काम शुरू कर दिया था।

उनका काम फिल्मों के पोस्टर पेंट करना था। इसके लिए उन्हें करीब 35 रुपये महीने मिलते थे। काम की जगह घर से लगभग 8 किलोमीटर दूर थी। यानी आने-जाने में रोज करीब 16 किलोमीटर का सफर पैदल तय करना पड़ता था। यह दौर उनके लिए सिर्फ आर्थिक संघर्ष का नहीं था, बल्कि इसी समय उन्होंने जिंदगी को बेहद करीब से देखा। बाद में उनके अभिनय में दिखाई देने वाली तीव्रता और आम आदमी से जुड़े किरदारों को उनके जीवन के इन अनुभवों से भी जोड़कर देखा गया।

Actor Nana Patekar Explainer:  पोस्टर पेंट करने वाले लड़के से अभिनेता बनने तक कैसे पहुंचे?

नाना पाटेकर ने कला की पढ़ाई भी की। उन्होंने मुंबई के सर जे.जे. स्कूल ऑफ आर्ट से शिक्षा हासिल की। इसके बाद उनका झुकाव थिएटर की ओर बढ़ा और अभिनय की दुनिया में उनकी शुरुआत रंगमंच से हुई। थिएटर ने उन्हें सिर्फ अभिनय का मौका नहीं दिया, बल्कि संवाद बोलने, भावनाओं को समझने और अलग-अलग किरदारों को जीने की बारीकियां भी सिखाईं। यही अनुभव आगे चलकर उनके फिल्मी अभिनय की पहचान बना।

Actor Nana Patekar Explainer
                                              Actor Nana Patekar Explainer
फिल्मों में एंट्री कैसे हुई?

नाना पाटेकर ने 1978 में फिल्म ‘गमन’ से सिनेमा में कदम रखा। शुरुआती दौर में उन्हें तुरंत वह लोकप्रियता नहीं मिली, जिसके लिए बाद में उन्हें जाना गया। उन्होंने हिंदी और मराठी सिनेमा में अलग-अलग तरह के किरदार निभाते हुए अपनी जगह बनाई। उनका करियर धीरे-धीरे आगे बढ़ा, लेकिन असली पहचान उन्हें ऐसे किरदारों से मिली, जिनमें सिर्फ संवाद बोलना नहीं बल्कि किरदार की आंतरिक बेचैनी और आक्रामकता को पर्दे पर उतारना जरूरी था।

Actor Nana Patekar Explainer: ‘परिंदा’ ने बदल दी पहचान

1989 में आई ‘परिंदा’ नाना पाटेकर के करियर का बड़ा मोड़ साबित हुई। फिल्म में उनके अभिनय को काफी सराहना मिली और इसके लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला। इसी भूमिका के लिए उन्हें फिल्मफेयर पुरस्कार भी मिला। यहीं से नाना पाटेकर को इंडस्ट्री में एक ऐसे अभिनेता के तौर पर देखा जाने लगा, जो नायक से ज्यादा अपने किरदार की ताकत से दर्शकों पर असर छोड़ सकता है।

फिर ‘क्रांतिवीर’ ने बना दिया बड़ा नाम

1994 की ‘क्रांतिवीर’ ने नाना पाटेकर को नई ऊंचाई दी। फिल्म में उनके अभिनय को दर्शकों और समीक्षकों दोनों से काफी सराहना मिली। इस भूमिका के लिए उन्हें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार और फिल्मफेयर का सर्वश्रेष्ठ अभिनेता पुरस्कार मिला। ‘क्रांतिवीर’ के बाद उनकी पहचान सिर्फ गंभीर अभिनेता की नहीं रही, बल्कि उनकी संवाद अदायगी और स्क्रीन प्रेजेंस भी उनकी पहचान का हिस्सा बन गई।

Actor Nana Patekar Explainer: विलेन से कॉमेडी तक, हर किरदार में अलग अंदाज

नाना पाटेकर की खासियत यह रही कि उन्होंने खुद को किसी एक तरह के किरदार तक सीमित नहीं रखा। ‘अंगार’ में नकारात्मक भूमिका से लेकर ‘अग्निसाक्षी’, ‘खामोशी: द म्यूजिकल’, ‘अब तक छप्पन’, ‘अपहरण’ और ‘राजनीति’ जैसी फिल्मों में उन्होंने अलग-अलग तरह के किरदार निभाए। फिर 2007 में आई ‘वेलकम’ में उदय शेट्टी का किरदार उनके करियर का एक बिल्कुल अलग पक्ष सामने लेकर आया। गंभीर और तीखे किरदारों के लिए मशहूर नाना ने कॉमेडी में भी अपनी अलग छाप छोड़ी। ‘वेलकम’ के बाद उनकी लोकप्रियता का दायरा और बड़ा हुआ।

Actor Nana Patekar Explainer
Actor Nana Patekar Explainer
नाना को ‘सुपरस्टार’ किसने बनाया?

नाना पाटेकर की लोकप्रियता का आधार सिर्फ बॉक्स ऑफिस नहीं था। उनकी सबसे बड़ी ताकत उनका अलग अभिनय अंदाज था। वह संवादों को सिर्फ बोलते नहीं थे, बल्कि उन्हें किरदार के गुस्से, दर्द, बेचैनी और भावनाओं के साथ पेश करते थे। यही वजह रही कि उनके कई संवाद और किरदार फिल्मों से बाहर भी लोगों की याद में बने रहे। उनकी फिल्मोग्राफी में गंभीर ड्रामा, क्राइम, नेगेटिव रोल, सामाजिक विषय और कॉमेडी- सभी तरह के किरदार मिलते हैं। यही विविधता उन्हें अपने दौर के दूसरे अभिनेताओं से अलग बनाती है।

Actor Nana Patekar Explainer: अभिनय के लिए मिले बड़े सम्मान

नाना पाटेकर के नाम तीन राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार दर्ज हैं- परिंदा के लिए सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता, क्रांतिवीर के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेता और अग्निसाक्षी के लिए फिर सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता। उन्हें कई फिल्मफेयर पुरस्कार भी मिले। 2013 में भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया। मराठी सिनेमा में भी उनका योगदान महत्वपूर्ण रहा। ‘नटसम्राट’ में उनके अभिनय को काफी सराहना मिली और उन्हें फिल्मफेयर मराठी पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

35 रुपये से शोहरत तक का सफर

नाना पाटेकर की कहानी इसलिए अलग नजर आती है क्योंकि इसकी शुरुआत किसी फिल्मी परिवार या बड़े मंच से नहीं हुई थी। 13 साल की उम्र में परिवार की मदद के लिए काम करना, पोस्टर पेंट करना और रोज 16 किलोमीटर पैदल चलना उनके शुरुआती जीवन की हकीकत थी।

इसके बाद थिएटर, फिल्मों में शुरुआती संघर्ष, परिंदा से पहचान, क्रांतिवीर से बड़ी सफलता और फिर गंभीर से लेकर कॉमेडी तक अलग-अलग भूमिकाओं में खुद को साबित करने का लंबा सफर रहा। यही वजह है कि नाना पाटेकर की कहानी सिर्फ एक अभिनेता के सफल होने की कहानी नहीं है। यह उस कलाकार के सफर की कहानी है जिसने छोटे-से संघर्ष से शुरुआत की और अपनी आवाज, संवाद अदायगी और अभिनय की अलग शैली से हिंदी और मराठी सिनेमा में अपनी पहचान बनाई।

Actor Nana Patekar Explainer: 75 साल की उम्र में हुआ निधन

8 अक्टूबर 2026 को 75 वर्ष की उम्र में नाना पाटेकर का निधन हो गया। उन्हें गोवा स्थित उनके घर पर बेहोशी की हालत में पाया गया था और अस्पताल ले जाने पर डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित किया। रिपोर्टों के मुताबिक उनकी मौत कार्डियक अरेस्ट के कारण हुई।

उनके निधन के साथ भारतीय सिनेमा ने ऐसा अभिनेता खो दिया, जिसकी पहचान किसी एक तरह के किरदार से नहीं बल्कि अलग-अलग भूमिकाओं को अपनी आवाज और अंदाज देने से बनी थी। 13 साल की उम्र में 35 रुपये की नौकरी से शुरू हुआ सफर आखिरकार भारतीय सिनेमा के बड़े नामों में शामिल होने तक पहुंचा और यही नाना पाटेकर की जिंदगी की सबसे खास कहानी है।

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