Amit Shah Drug-free by 2029: मध्य प्रदेश में ड्रग्स को लेकर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की 2029 तक नशामुक्ति की घोषणा ने एक बड़े सवाल को सामने ला दिया है-आखिर प्रदेश में नशे का नेटवर्क कितना फैला हुआ है और सरकार के सामने चुनौती क्या है? भोपाल की करोड़ों रुपये की ड्रग्स फैक्ट्री से लेकर गुप्त लैब, कार की स्टेपनी और कपड़ों में छिपाकर की जा रही तस्करी के मामले बताते हैं कि नशीले पदार्थों की सप्लाई का तरीका लगातार बदल रहा है। शाह ने भोपाल में कहा कि 31 दिसंबर 2029 के बाद मध्य प्रदेश में बच्चों के लिए नशे की जगह नहीं होगी। यह बयान ऐसे समय आया है जब राज्य में सिंथेटिक ड्रग्स की बरामदगी, अवैध निर्माण और अंतरराज्यीय सप्लाई से जुड़े कई मामले सामने आए हैं।
शाह ने 2029 की डेडलाइन क्यों दी?
अमित शाह की घोषणा को केवल एक लक्ष्य के तौर पर देखने के बजाय इसे केंद्र और राज्य की नारकोटिक्स के खिलाफ चल रही कार्रवाई के बड़े अभियान से जोड़कर देखना होगा। केंद्र सरकार ने 2026-29 के लिए ड्रग कंट्रोल पर अपना विजन डॉक्यूमेंट भी जारी किया है।
मध्य प्रदेश सरकार की ओर से भी पूरे ड्रग सिंडिकेट को खत्म करने, आदतन अपराधियों के खिलाफ कार्रवाई तेज करने और पड़ोसी राज्यों के साथ समन्वय बढ़ाने की बात कही गई है। यानी सरकार का फोकस सिर्फ ड्रग्स पकड़ने तक सीमित नहीं है। सप्लाई चेन, निर्माण, तस्करी, वित्तीय नेटवर्क और युवाओं तक पहुंच—इन सभी स्तरों पर कार्रवाई की दिशा में कदम उठाए जा रहे हैं।
Amit Shah Drug-free by 2029: भोपाल की 1800 करोड़ की फैक्ट्री ने क्या दिखाया?
मध्य प्रदेश में सिंथेटिक ड्रग्स के अवैध निर्माण का सबसे बड़ा उदाहरण भोपाल के बगरौदा औद्योगिक क्षेत्र से सामने आया था। अक्टूबर 2024 में एक फैक्ट्री से करीब 907 किलो मेफेड्रोन बरामद की गई थी। इसकी अंतरराष्ट्रीय कीमत 1800 करोड़ रुपये से अधिक आंकी गई थी।
इस मामले ने यह सवाल खड़ा किया कि क्या मध्य प्रदेश सिर्फ ड्रग्स की आवाजाही का रास्ता है या यहां ड्रग्स के निर्माण का भी नेटवर्क तैयार हो रहा है? इसके बाद भी अलग-अलग स्थानों से कथित अवैध ड्रग निर्माण इकाइयों के मामले सामने आए। जगदीशपुर, नीमच, महू और आगर मालवा से जुड़े मामलों में अलग-अलग तरह की कार्रवाई की गई। यानी नेटवर्क का एक हिस्सा निर्माण से जुड़ा है तो दूसरा हिस्सा इसे अलग-अलग शहरों और राज्यों तक पहुंचाने का।
गुप्त लैब से गांवों तक कैसे पहुंचा नेटवर्क?
ड्रग्स के अवैध निर्माण की तस्वीर केवल औद्योगिक क्षेत्रों तक सीमित नहीं है। उपलब्ध मामलों में गांवों के मकान, यूनिट और यहां तक कि नर्सरी जैसी जगहों के कथित तौर पर इस्तेमाल की बात सामने आई है। महू के थावलाय गांव में सामने आए मामले में मेफेड्रोन के साथ बड़ी मात्रा में प्रिकर्सर केमिकल बरामद होने की बात कही गई। जांच एजेंसियों के मुताबिक इसका नेटवर्क दूसरे शहरों तक जुड़ा था। इस तरह के मामले जांच एजेंसियों के सामने एक अलग चुनौती रखते हैं-ड्रग्स बनाने वाली जगह और उसे सप्लाई करने वाले नेटवर्क को अलग-अलग पहचानना।
Amit Shah Drug-free by 2029: स्टेपनी से सलवार-कुर्ते तक कैसे बदल रहा तस्करी का तरीका?
ड्रग्स की तस्करी का दूसरा बड़ा पहलू तरीका है। हाल के मामलों में जांच एजेंसियों ने ऐसे तरीके पकड़े हैं जिनमें नशीले पदार्थों को वाहनों और कपड़ों के भीतर छिपाकर ले जाया जा रहा था। 30 सितंबर को इंदौर में DRI की कार्रवाई में एक महिंद्रा थार की स्टेपनी के अंदर छिपाई गई करीब 7.116 किलो एम्फेटामाइन बरामद होने की बात सामने आई। इसकी कीमत करीब 5.69 करोड़ रुपये बताई गई।

24 सितंबर को भोपाल के रानी कमलापति रेलवे स्टेशन पर एक महिला के कपड़ों में बनाए गए विशेष पैकेट से करीब 2.368 किलो क्रिस्टल एम्फेटामाइन बरामद होने की जानकारी सामने आई। इसी तरह इंदौर से पुणे जा रही बस में भी सिंथेटिक ड्रग्स और अन्य नशीले पदार्थों की बरामदगी का मामला सामने आया। इन मामलों से एक बात साफ होती है कि तस्करी का तरीका एक जैसा नहीं है। जांच एजेंसियों के सामने चुनौती यह है कि सप्लाई नेटवर्क लगातार अपने तरीके बदलता रहता है।
MP में नशे का नेटवर्क सिर्फ सिंथेटिक ड्रग्स तक सीमित नहीं
मध्य प्रदेश में ड्रग्स की तस्वीर को सिर्फ मेफेड्रोन और एम्फेटामाइन तक सीमित करके नहीं देखा जा सकता। राज्य में पारंपरिक नशीले पदार्थों के अलावा फार्मास्यूटिकल ड्रग्स और सिंथेटिक ड्रग्स तीनों तरह की चुनौतियां हैं। पहला नेटवर्क – पारंपरिक नशा: इसमें गांजा, अफीम, हेरोइन और पोपी स्ट्रॉ जैसे पदार्थ शामिल हैं। दूसरा नेटवर्क-फार्मास्यूटिकल नशा: इसमें नशीले इंजेक्शन, टैबलेट और कोडीन आधारित कफ सिरप जैसे पदार्थ आते हैं। तीसरा नेटवर्क-सिंथेटिक ड्रग्स: इसमें मेफेड्रोन और एम्फेटामाइन जैसी ड्रग्स शामिल हैं, जिनकी बरामदगी हाल के मामलों में सामने आई है। यानी सरकार के सामने चुनौती किसी एक ड्रग या एक शहर तक सीमित नहीं है।
Amit Shah Drug-free by 2029: 17 गुप्त लैब का भंडाफोड़, अब आगे क्या?
राज्य में ड्रग निर्माण से जुड़ी 17 गुप्त लैब का भंडाफोड़ किए जाने की जानकारी बैठक में सामने आई। इसके साथ ही आदतन ड्रग अपराधियों के खिलाफ PIT-NDPS एक्ट के तहत कार्रवाई तेज करने की बात कही गई है। लेकिन सिर्फ लैब पकड़ लेना पूरे नेटवर्क को खत्म करने के लिए पर्याप्त नहीं होगा। किसी भी ड्रग सिंडिकेट में निर्माण के बाद भंडारण, परिवहन, स्थानीय सप्लायर, खरीदार और पैसों के लेनदेन की अलग-अलग कड़ियां होती हैं। यही वजह है कि सरकार अब पूरे सिंडिकेट पर कार्रवाई की बात कर रही है।
पांच राज्यों की सीमाएं बढ़ाती हैं चुनौती
मध्य प्रदेश की सीमाएं उत्तर प्रदेश, राजस्थान, महाराष्ट्र, गुजरात और छत्तीसगढ़ से लगती हैं। ऐसे में किसी एक राज्य में कार्रवाई के बाद भी नेटवर्क दूसरे राज्य के रास्ते का इस्तेमाल कर सकता है। इसी कारण पड़ोसी राज्यों के साथ संयुक्त इंटेलिजेंस और समन्वित कार्रवाई पर जोर दिया जा रहा है। यही रणनीति ड्रग्स की सप्लाई चेन को एक राज्य की पुलिस कार्रवाई से आगे जाकर अंतरराज्यीय स्तर पर ट्रैक करने की कोशिश है।

Amit Shah Drug-free by 2029: सरकार का 2029 प्लान क्या है?
अब सरकार के सामने सबसे बड़ा सवाल है कि 31 दिसंबर 2029 की डेडलाइन को जमीन पर कैसे हासिल किया जाए। इसके लिए तीन स्तर महत्वपूर्ण होंगे। पहला सप्लाई रोकना: ड्रग्स बनाने वाली लैब, तस्करों और सप्लाई नेटवर्क पर कार्रवाई। दूसरा नेटवर्क तोड़ना: अलग-अलग राज्यों के बीच सूचना साझा करना और वित्तीय नेटवर्क तक पहुंचना। तीसरा डिमांड कम करना: स्कूल, कॉलेज और उच्च शिक्षण संस्थानों में जागरूकता, ड्रग-मुक्त कैंपस और नशे की गिरफ्त में आए युवाओं के पुनर्वास पर जोर। केंद्र सरकार की मौजूदा नारकोटिक्स रणनीति में भी ड्रग्स के खिलाफ कार्रवाई को सिर्फ जब्ती तक सीमित न रखकर व्यापक समन्वय और नियंत्रण की दिशा में ले जाने पर जोर दिया गया है।
असली चुनौती सिर्फ ड्रग्स पकड़ना नहीं
मध्य प्रदेश को 2029 तक नशामुक्त बनाने का लक्ष्य तय हो गया है, लेकिन इस लक्ष्य की असली परीक्षा उन नेटवर्क पर कार्रवाई में होगी जो ड्रग्स के निर्माण से लेकर उसकी सप्लाई और खपत तक फैले हैं।भोपाल की करोड़ों की फैक्ट्री, गुप्त लैब, इंदौर की स्टेपनी और भोपाल में कपड़ों के भीतर छिपाकर ले जाई जा रही ड्रग्स के मामले इस चुनौती के अलग-अलग चेहरे दिखाते हैं। इसलिए 2029 का लक्ष्य सिर्फ कितनी ड्रग्स पकड़ी गईं, इससे तय नहीं होगा। असली सवाल यह होगा कि सरकार कितने पूरे नेटवर्क को तोड़ पाती है और नशे की मांग को कम करने के लिए क्या स्थायी व्यवस्था बनती है।
अमित शाह की 31 दिसंबर 2029 की घोषणा ने मध्य प्रदेश में नशे के खिलाफ लड़ाई के लिए एक स्पष्ट समयसीमा सामने रख दी है। लेकिन प्रदेश में सामने आए मामलों को देखें तो चुनौती बहुस्तरीय है- गुप्त लैब से लेकर अंतरराज्यीय तस्करी और युवाओं तक पहुंचती सिंथेटिक ड्रग्स तक। अब आने वाले तीन साल में सरकार की रणनीति का फोकस सिर्फ ड्रग्स की खेप पकड़ने पर रहता है या पूरे नेटवर्क और उसकी मांग दोनों पर चोट की जाती है, यही 2029 के लक्ष्य की दिशा तय करेगा।









