Breaking News
Home » Breaking News » BRICS की मेज पर पुतिन-शी, बाहर अमेरिका की नजर! क्या भारत साध पाएगा रूस-चीन और पश्चिम के बीच संतुलन? जानिए विस्तार से…

BRICS की मेज पर पुतिन-शी, बाहर अमेरिका की नजर! क्या भारत साध पाएगा रूस-चीन और पश्चिम के बीच संतुलन? जानिए विस्तार से…

BRICS Summit 2026: भारत की मेजबानी में होने वाला BRICS शिखर सम्मेलन सिर्फ एक बहुपक्षीय बैठक नहीं है। नई दिल्ली में दुनिया की उभरती अर्थव्यवस्थाओं के नेताओं की मौजूदगी के बीच भारत के सामने एक बेहद नाजुक कूटनीतिक परीक्षा भी होगी। एक तरफ रूस है, जिसके साथ भारत के रिश्ते दशकों पुराने हैं; दूसरी तरफ चीन है, जो पड़ोसी होने के साथ भारत का बड़ा रणनीतिक प्रतिद्वंद्वी भी है। वहीं अमेरिका और यूरोप भारत के हर बड़े फैसले को अपनी रणनीतिक नजर से देख रहे हैं

यानी दिल्ली में सवाल सिर्फ यह नहीं होगा कि BRICS क्या हासिल करता है? असली सवाल यह होगा कि भारत BRICS को किस दिशा में ले जाता है—पश्चिम के खिलाफ या वैश्विक सहयोग के एक स्वतंत्र मंच के रूप में?

पहले समझिए BRICS इतना महत्वपूर्ण क्यों है?

BRICS की शुरुआत ब्राजील, रूस, भारत और चीन के साथ हुई थी। बाद में दक्षिण अफ्रीका इसके साथ जुड़ा और हाल के विस्तार के बाद संगठन का दायरा और बड़ा हुआ है। इस विस्तार ने BRICS को सिर्फ उभरती अर्थव्यवस्थाओं का समूह नहीं रहने दिया। अब यह वैश्विक अर्थव्यवस्था, ऊर्जा, व्यापार, विकास और ग्लोबल साउथ की राजनीति में प्रभाव रखने वाला मंच बन चुका है। IMF के PPP यानी Purchasing Power Parity आधार पर दिए आंकड़ों का इस्तेमाल करते हुए BRICS की आर्थिक ताकत को G7 से तुलना में दिखाया जाता है। लेकिन यहां एक जरूरी अंतर समझना होगा . PPP के आंकड़े देशों की घरेलू क्रय शक्ति को मापते हैं, इसलिए इन्हें डॉलर में वास्तविक बाजार आकार या वैश्विक वित्तीय प्रभाव के बराबर नहीं माना जा सकता. यही वजह है कि BRICS की आर्थिक ताकत बड़ी होने के बावजूद उसकी राजनीतिक एकजुटता को लेकर सवाल बने रहते हैं।

BRICS Summit 2026: सवाल 1: रूस भारत के लिए इतना महत्वपूर्ण क्यों है?

रूस के साथ भारत का रिश्ता सिर्फ रक्षा खरीद तक सीमित नहीं है। ऊर्जा, परमाणु सहयोग, अंतरिक्ष और रणनीतिक मामलों तक दोनों देशों के संबंध फैले हुए हैं। यूक्रेन युद्ध के बाद भारत ने रूस से बड़े पैमाने पर कच्चा तेल खरीदना जारी रखा। इससे भारत को ऊर्जा आयात की लागत और आपूर्ति को लेकर अपने हित साधने में मदद मिली। दूसरी तरफ पश्चिमी देशों ने रूस के साथ कारोबार को लेकर भारत पर कई बार दबाव बनाया। भारत का तर्क रहा है कि ऊर्जा सुरक्षा उसके राष्ट्रीय हित का विषय है।

लेकिन यहां एक नई चुनौती भी पैदा हुई है, रूस और चीन की बढ़ती नजदीकी। यूक्रेन युद्ध के बाद पश्चिमी प्रतिबंधों ने रूस को चीन के और करीब धकेला है। भारत के लिए यह स्थिति आसान नहीं है, क्योंकि वह रूस को अपने रणनीतिक दायरे में बनाए रखना चाहता है, लेकिन साथ ही नहीं चाहता कि मॉस्को पूरी तरह बीजिंग के प्रभाव में चला जाए।

सवाल 2: चीन के साथ एक टेबल पर बैठना भारत के लिए क्यों मुश्किल है?

भारत और चीन के बीच संबंधों में सबसे बड़ी समस्या सीमा विवाद और आपसी अविश्वास है। 2020 की गलवान घाटी की हिंसक झड़प ने दोनों देशों के रिश्तों को गहरा झटका दिया। इसके बाद सीमा पर सैन्य तैनाती और तनाव ने दोनों देशों के बीच सामान्य संबंधों को प्रभावित किया। फिर भी भारत और चीन को पूरी तरह अलग रखना आसान नहीं है।

दोनों BRICS के संस्थापक सदस्य हैं। दोनों वैश्विक दक्षिण की आवाज को मजबूत करने की बात करते हैं और दोनों बहुपक्षीय संस्थाओं में विकासशील देशों की भूमिका बढ़ाने की वकालत करते हैं। यहीं भारत की कूटनीति की पेचीदगी सामने आती है- सीमा पर प्रतिद्वंद्विता, लेकिन वैश्विक मंच पर सहयोग। भारत BRICS को चीन-केंद्रित संगठन बनने से रोकना चाहता है। वहीं चीन के साथ संवाद के दरवाजे भी खुले रखना भारत के रणनीतिक हित में है।

BRICS Summit 2026: सवाल 3: फिर अमेरिका और यूरोप को भारत की चिंता क्यों होगी?

भारत पिछले कुछ वर्षों में अमेरिका और उसके सहयोगियों के साथ भी तेजी से करीब आया है। क्वाड में भारत की भूमिका, रक्षा सहयोग, सेमीकंडक्टर, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, महत्वपूर्ण तकनीक और सप्लाई चेन जैसे क्षेत्रों में भारत-अमेरिका साझेदारी लगातार महत्वपूर्ण हुई है। अमेरिका भारत को हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीन के बढ़ते प्रभाव के बीच एक महत्वपूर्ण साझेदार के रूप में देखता है। लेकिन इसी समय भारत रूस के साथ रक्षा और ऊर्जा संबंध बनाए रखता है। यही वह जगह है जहां पश्चिम को भारत की नीति कभी-कभी विरोधाभासी दिखाई दे सकती है। भारत के लिए इसका जवाब है—Strategic Autonomy यानी रणनीतिक स्वायत्तता। मतलब साफ है: भारत किसी एक सैन्य या राजनीतिक खेमे का हिस्सा बनने के बजाय अलग-अलग मुद्दों पर अलग-अलग देशों के साथ अपने हित के अनुसार सहयोग करना चाहता है।

BRICS Summit 2026
BRICS Summit 2026
सवाल 4: क्या BRICS को पश्चिम-विरोधी मंच बनने से भारत रोक सकता है?

यही दिल्ली सम्मेलन की सबसे बड़ी कूटनीतिक चुनौती हो सकती है। अगर BRICS की राजनीति मुख्य रूप से अमेरिका और पश्चिमी देशों के विरोध के इर्द-गिर्द घूमती है, तो भारत के लिए स्थिति मुश्किल होगी। क्योंकि भारत एक तरफ BRICS में रूस और चीन के साथ है, लेकिन दूसरी तरफ अमेरिका, यूरोप, जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ आर्थिक और रणनीतिक साझेदारी भी बढ़ा रहा है। इसलिए भारत के लिए बेहतर विकल्प यह है कि BRICS को “एंटी-वेस्ट” क्लब की जगह “ग्लोबल साउथ” के विकास और सुधार का मंच बनाए रखने पर जोर दिया जाए। व्यापार, ऊर्जा सुरक्षा, डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर, स्वास्थ्य, खाद्य सुरक्षा, जलवायु वित्त और विकासशील देशों की वित्तीय जरूरतें ऐसे क्षेत्र हैं, जहां भारत बिना किसी एक देश के खिलाफ खड़े हुए साझा एजेंडा आगे बढ़ा सकता है।

BRICS Summit 2026: सवाल 5: BRICS की आर्थिक ताकत क्या भारत के लिए मौका है?

बिल्कुल। BRICS के विस्तारित स्वरूप ने भारत को ऐसे देशों के साथ आर्थिक संबंध मजबूत करने का अवसर दिया है, जिनके बाजार तेजी से बढ़ रहे हैं। लेकिन केवल GDP या PPP के आंकड़ों से BRICS की सफलता तय नहीं होगी।

असली सवाल यह है कि क्या सदस्य देश- आपसी व्यापार बढ़ा सकते हैं? स्थानीय मुद्राओं में व्यापार को आसान बना सकते हैं? भुगतान व्यवस्था को मजबूत कर सकते हैं? ऊर्जा सुरक्षा में सहयोग कर सकते हैं? विकासशील देशों के लिए वित्तीय संस्थाओं को मजबूत कर सकते हैं? वैश्विक संस्थाओं में सुधार की साझा आवाज बना सकते हैं? अगर इन क्षेत्रों में ठोस प्रगति होती है तो BRICS भारत के लिए आर्थिक और कूटनीतिक दोनों लिहाज से बड़ा मंच बन सकता है।

सवाल 6: दिल्ली में मोदी-शी-पुतिन की तस्वीर क्यों महत्वपूर्ण होगी?

कूटनीति में तस्वीरें भी संदेश देती हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग एक मंच पर दिखाई देते हैं तो पश्चिमी राजधानियां निश्चित तौर पर यह समझने की कोशिश करेंगी कि भारत BRICS को किस दिशा में ले जाना चाहता है। लेकिन भारत का संदेश यह हो सकता है- “किसी एक खेमे के साथ नहीं, सभी के साथ भारत के अपने हित हैं।” यही अंतर भारत की मौजूदा विदेश नीति को पुराने दौर की गुटनिरपेक्षता से अलग करता है। आज भारत एक साथ अमेरिका के साथ तकनीकी और रक्षा सहयोग कर सकता है, रूस से ऊर्जा और रक्षा संबंध बनाए रख सकता है और चीन के साथ तनाव के बावजूद बहुपक्षीय मंचों पर संवाद कर सकता है।

भारत के सामने असली जोखिम क्या है?

सबसे बड़ा जोखिम है- किसी एक शक्ति के बहुत ज्यादा करीब दिखाई देना। अगर भारत BRICS में चीन और रूस की लाइन का खुला समर्थन करता दिखाई देता है, तो पश्चिम के साथ उसकी रणनीतिक साझेदारी पर सवाल उठ सकते हैं। दूसरी तरफ अगर भारत BRICS के भीतर पश्चिमी हितों को बहुत ज्यादा महत्व देता दिखाई देता है, तो रूस और चीन के साथ उसके संबंध प्रभावित हो सकते हैं।

इसलिए भारत के लिए सबसे सुरक्षित रास्ता है, मुद्दे के आधार पर साझेदारी। जहां भारत का हित रूस के साथ है, वहां रूस के साथ; जहां तकनीक और निवेश के लिए अमेरिका या यूरोप जरूरी हैं, वहां पश्चिम के साथ; और जहां चीन के साथ संवाद जरूरी है, वहां बातचीत।

BRICS Summit 2026: तो क्या भारत संतुलन साध पाएगा?

भारत के पास इसका अनुभव पहले से है। यूक्रेन युद्ध के दौरान भारत ने रूस के साथ संबंध बनाए रखे, लेकिन पश्चिमी देशों के साथ भी रणनीतिक साझेदारी को कमजोर नहीं होने दिया। क्वाड में सक्रिय भूमिका निभाते हुए भारत BRICS और SCO जैसे मंचों पर रूस और चीन के साथ भी बैठता रहा है। यानी दिल्ली की रणनीति किसी एक पक्ष को चुनने की नहीं, बल्कि अपनी रणनीतिक स्वतंत्रता बचाए रखने की है। BRICS सम्मेलन की असली सफलता इस बात से तय होगी कि भारत कितनी मजबूती से तीन अलग-अलग जरूरतों को एक साथ संभाल पाता है- रूस से ऊर्जा और रणनीतिक संबंध,पश्चिम से तकनीक और निवेश और चीन के साथ प्रतिस्पर्धा के बीच संवाद।

दिल्ली में सिर्फ BRICS की बैठक नहीं, भारत की कूटनीतिक परीक्षा होगी

दिल्ली का BRICS सम्मेलन भारत के लिए अपनी विदेश नीति का प्रदर्शन करने का बड़ा मौका है। भारत अगर BRICS को पश्चिम-विरोधी मंच बनने से रोककर विकास, व्यापार और ग्लोबल साउथ की प्राथमिकताओं पर केंद्रित रखता है, तो वह रूस और चीन के साथ संबंधों को संभालते हुए अमेरिका और यूरोप के साथ अपनी साझेदारी भी बचाए रख सकता है।

यही भारत की ‘रणनीतिक स्वायत्तता’ की असली परीक्षा होगी, क्या नई दिल्ली एक ही समय में मॉस्को से दोस्ती, बीजिंग से प्रतिस्पर्धा और वॉशिंगटन से साझेदारी निभा सकती है?अगर जवाब हां है, तो BRICS की मेजबानी सिर्फ एक शिखर सम्मेलन नहीं, बल्कि भारत की बढ़ती वैश्विक भूमिका का बड़ा कूटनीतिक प्रदर्शन साबित हो सकती है।

ये भी पढ़े… बिग बॉस 20 में बेटी रीति को छोड़ने पहुंचे मनोज तिवारी, सलमान के एक डायलॉग ने याद दिलाया पुराना विवाद