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चुनाव हारे तो EVM पर सवाल, अब EC पर आरोप, क्या विपक्ष की हर बार आरोप लगाने की आदत बन चुकी है?

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CEC: भारत में चुनावी राजनीति के साथ EVM, मतदाता सूची और निर्वाचन आयोग की भूमिका को लेकर विवाद भी लगातार सामने आते रहे हैं। अलग-अलग चुनावों के बाद विपक्षी दलों ने कभी EVM की विश्वसनीयता, कभी VVPAT, कभी मतदाता सूची और अब निर्वाचन आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए हैं। मौजूदा समय में कांग्रेस समेत INDIA ब्लॉक के कई दल मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे हैं और उनके इस्तीफे की मांग उठा रहे हैं। ऐसे में बहस केवल किसी एक चुनाव या एक फैसले तक सीमित नहीं है, बल्कि संवैधानिक संस्था के प्रति राजनीतिक दलों के रवैये तक पहुंच गई है।

EVM से शुरू हुआ आरोपों का सिलसिला

EVM को लेकर सवाल कई चुनावों से राजनीतिक बहस का हिस्सा रहे हैं। विपक्षी दलों की ओर से मशीनों में गड़बड़ी, छेड़छाड़ और हैकिंग की आशंका जैसे आरोप लगाए जाते रहे हैं। इसके जवाब में निर्वाचन आयोग EVM की सुरक्षा, रैंडमाइजेशन, सीलिंग, स्ट्रांग रूम और VVPAT जैसी प्रक्रियाओं की जानकारी देता रहा है। 2024 में EVM और VVPAT से जुड़े मामले सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचे। अदालत ने बैलेट पेपर से चुनाव कराने की मांग को स्वीकार नहीं किया। इसके बावजूद राजनीतिक स्तर पर EVM को लेकर सवाल पूरी तरह समाप्त नहीं हुए।

CEC: अब सवाल EVM से आगे निर्वाचन आयोग तक

मौजूदा विवाद में विपक्ष का निशाना सीधे निर्वाचन आयोग की कार्यप्रणाली पर है। मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR को लेकर कांग्रेस और INDIA ब्लॉक के दलों ने गंभीर सवाल उठाए हैं। विपक्ष का आरोप है कि मतदाता सूची में बदलाव से मतदाताओं के अधिकार प्रभावित हो सकते हैं। अक्टूबर 2026 में राहुल गांधी समेत विपक्षी नेताओं ने निर्वाचन आयोग के खिलाफ प्रदर्शन किया। दिल्ली में आयोग की ओर मार्च करने की कोशिश के दौरान कई विपक्षी नेताओं को हिरासत में लिया गया। इसके बाद भी प्रदर्शन और मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग जारी रही।

ज्ञानेश कुमार पर विपक्ष के आरोप

इस विवाद में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार भी विपक्ष के निशाने पर हैं। विपक्षी सांसदों ने उनके खिलाफ कार्रवाई और पद से हटाने की मांग तक की है। आरोपों का केंद्र चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली, SIR और मतदाता सूची से जुड़े फैसले हैं। हालांकि इन आरोपों को प्रमाणित तथ्य के रूप में नहीं, बल्कि विपक्ष के राजनीतिक दावों के रूप में देखना जरूरी है। निर्वाचन आयोग ने चुनावी प्रक्रिया को लेकर उठाए गए आरोपों पर अपने जवाब और प्रक्रियाओं का हवाला दिया है। यानी एक तरफ विपक्ष आरोप लगा रहा है, तो दूसरी तरफ आयोग उन आरोपों को स्वीकार नहीं करता।

CEC: कांग्रेस से INDIA ब्लॉक तक विरोध

यह विरोध केवल कांग्रेस तक सीमित नहीं है। INDIA ब्लॉक के कई विपक्षी दल भी निर्वाचन आयोग के खिलाफ आंदोलन में शामिल हुए हैं। राहुल गांधी, प्रियंका गांधी समेत विपक्षी नेताओं ने चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए प्रदर्शन किया है। इसके समानांतर CJP से जुड़े विरोध-प्रदर्शनों को लेकर भी दिल्ली में राजनीतिक और कानूनी विवाद सामने आया है। जुलाई 2026 के प्रदर्शन से जुड़े मामलों की जांच के लिए दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच और स्पेशल सेल को जिम्मेदारी दी गई। इस पूरे घटनाक्रम ने चुनाव, विरोध और संवैधानिक संस्थाओं की भूमिका को लेकर बहस को और व्यापक किया है।

CEC: संवैधानिक संस्था पर सवाल और लोकतांत्रिक मर्यादा

निर्वाचन आयोग संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत स्थापित संवैधानिक संस्था है। चुनावों के अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण की जिम्मेदारी आयोग को दी गई है। इसलिए किसी राजनीतिक दल को आयोग के किसी फैसले से असहमति हो सकती है और उसे चुनौती देने का अधिकार भी है। लेकिन इसके लिए संवैधानिक और न्यायिक प्रक्रियाएं मौजूद हैं। EVM से लेकर VVPAT, मतदाता सूची, SIR और अब मुख्य चुनाव आयुक्त तक विवाद का दायरा बढ़ता गया है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में राजनीतिक दलों को सवाल उठाने और विरोध करने का अधिकार है, लेकिन संवैधानिक संस्थाओं के फैसलों को लेकर असहमति के साथ निर्धारित संस्थागत प्रक्रिया का पालन भी लोकतांत्रिक व्यवस्था का हिस्सा है। मौजूदा विवाद ने एक बार फिर यही सवाल सामने रखा है कि चुनावी असहमति और संवैधानिक संस्थाओं की विश्वसनीयता पर लगातार सवाल उठाने के बीच संतुलन कैसे कायम रहे।

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