Coal Producing States: भारत में बिजली उत्पादन का तरीका तेजी से बदल रहा है। एक ओर सरकार सौर और पवन ऊर्जा जैसे स्वच्छ ऊर्जा स्रोतों को बढ़ावा दे रही है, तो दूसरी ओर बिजली की जरूरत पूरी करने के लिए कोयले पर निर्भरता अब भी काफी ज्यादा है। देश ने 2070 तक नेट-जीरो उत्सर्जन का लक्ष्य रखा है, लेकिन इस बदलाव का असर उन राज्यों पर भी पड़ रहा है, जिनकी अर्थव्यवस्था कोयले के सहारे चलती है। झारखंड, छत्तीसगढ़, ओडिशा और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में लाखों लोगों की आजीविका खनन और उससे जुड़े कारोबार पर निर्भर है। राज्य सरकारों को भी कोयले से रॉयल्टी और दूसरे शुल्कों के रूप में बड़ी आमदनी होती है। ऐसे में सवाल है कि अगर भारत में कोयले की भूमिका धीरे-धीरे कम होती है, तो इन राज्यों की अर्थव्यवस्था, रोजगार और सरकारी खजाने का क्या होगा? क्या सौर और पवन ऊर्जा इस नुकसान की भरपाई कर पाएगी? आइए सवाल-जवाब में पूरा गणित समझते हैं।
भारत में बिजली उत्पादन का तरीका क्यों बदल रहा है?
भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के साथ-साथ प्रदूषण और कार्बन उत्सर्जन कम करने की दिशा में भी काम कर रहा है। इसी रणनीति के तहत सौर, पवन, जलविद्युत और परमाणु ऊर्जा जैसे गैर-जीवाश्म स्रोतों की क्षमता बढ़ाई जा रही है।
भारत ने वर्ष 2070 तक नेट-जीरो उत्सर्जन का लक्ष्य रखा है। इसका मतलब है कि देश से होने वाले ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन और उसे कम करने या सोखने की क्षमता के बीच संतुलन हासिल करना। बिजली क्षेत्र इस लक्ष्य के लिए बेहद महत्वपूर्ण है, क्योंकि देश में बिजली उत्पादन का बड़ा हिस्सा अब भी कोयले से होता है। नवीकरणीय ऊर्जा की क्षमता बढ़ने से भारत को ऊर्जा के अलग-अलग स्रोतों का विकल्प मिलता है। इससे भविष्य में कोयले पर निर्भरता कम करने और स्वच्छ ऊर्जा का इस्तेमाल बढ़ाने में मदद मिल सकती है।
Coal Producing States: सौर और पवन ऊर्जा का उत्पादन कोयले से आगे निकल गया है?
स्थापित क्षमता के मामले में गैर-जीवाश्म ऊर्जा स्रोतों की हिस्सेदारी तेजी से बढ़ी है। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, अक्टूबर में भारत की कुल बिजली उत्पादन क्षमता 500 गीगावाट से अधिक हो गई थी। इसमें आधे से ज्यादा हिस्सा गैर-जीवाश्म ऊर्जा स्रोतों का था। लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है। बिजली उत्पादन की स्थापित क्षमता और वास्तव में पैदा होने वाली बिजली एक जैसी चीजें नहीं हैं। सौर ऊर्जा संयंत्र दिन में धूप मिलने पर बिजली पैदा करते हैं, जबकि रात में उनसे उत्पादन नहीं होता। इसी तरह पवन ऊर्जा का उत्पादन हवा की उपलब्धता पर निर्भर करता है। दूसरी ओर, कोयला आधारित बिजली संयंत्र जरूरत के मुताबिक लंबे समय तक बिजली पैदा कर सकते हैं। इसके लिए बिजली ग्रिड, ट्रांसमिशन नेटवर्क और ऊर्जा भंडारण की व्यवस्था भी मजबूत करनी होगी।
ऊर्जा बदलाव से झारखंड, छत्तीसगढ़ और ओडिशा की चिंता क्यों बढ़ रही है?
भारत में सौर और पवन ऊर्जा की क्षमता कुछ राज्यों में अधिक केंद्रित है। राजस्थान, गुजरात, तमिलनाडु और कर्नाटक जैसे राज्य इस क्षेत्र में आगे हैं। इसके उलट झारखंड, छत्तीसगढ़, ओडिशा, मध्य प्रदेश और पश्चिम बंगाल जैसे कई कोयला उत्पादक राज्यों की अर्थव्यवस्था का बड़ा हिस्सा खनन और उससे जुड़े उद्योगों पर निर्भर है।
इस वजह से ऊर्जा बदलाव का फायदा सभी राज्यों को एक समान नहीं मिल रहा। जिन राज्यों में सौर और पवन ऊर्जा की बेहतर संभावनाएं हैं, वे नए निवेश और परियोजनाओं से लाभ उठा सकते हैं। वहीं कोयला उत्पादक राज्यों के सामने सवाल है कि भविष्य में खनन और उससे जुड़े कारोबार में कमी आने पर रोजगार और सरकारी आमदनी की भरपाई कैसे होगी। यही वजह है कि विशेषज्ञ ऊर्जा बदलाव को केवल बिजली उत्पादन का मुद्दा नहीं मानते। यह क्षेत्रीय विकास, रोजगार और आर्थिक असमानता से भी जुड़ा हुआ है।
Coal Producing States: भारत की बिजली व्यवस्था में कोयले की कितनी अहमियत है?
भारत में कोयला अब भी बिजली उत्पादन का प्रमुख स्रोत है। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, देश की करीब 74 फीसदी बिजली कोयले से बनती है। इसका महत्व केवल बिजली उत्पादन तक सीमित नहीं है। कोयला खदानों से लाखों लोगों को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार मिलता है। खनन के साथ परिवहन, मशीनरी, ठेकेदारी, निर्माण और दूसरे छोटे-बड़े कारोबार भी जुड़े हैं। इसके अलावा राज्य सरकारों को रॉयल्टी और विभिन्न शुल्कों से राजस्व मिलता है।
ओडिशा, झारखंड और छत्तीसगढ़ के पास मिलकर देश के कुल कोयला भंडार का बड़ा हिस्सा है। उपलब्ध आंकड़ों में इन तीन राज्यों की हिस्सेदारी करीब 69 फीसदी बताई गई है। देश के कुल कोयला उत्पादन में भी इनका योगदान लगभग 63 फीसदी है। मध्य प्रदेश को शामिल करने पर इन राज्यों की हिस्सेदारी और बढ़ जाती है। इससे साफ है कि कोयले से जुड़ी नीतियों में बदलाव का असर इन राज्यों की अर्थव्यवस्था पर भी पड़ेगा।

ऊर्जा बदलाव से किन राज्यों को सबसे ज्यादा जोखिम है?
कोयला उत्पादन पर निर्भर राज्यों के सामने चुनौतियां अलग-अलग हैं।
छत्तीसगढ़: राज्य की अर्थव्यवस्था में कोयला और दूसरे खनिजों की बड़ी भूमिका है। खनन से रोजगार, औद्योगिक गतिविधियां और सरकारी राजस्व मिलता है। अगर भविष्य में कोयले की मांग घटती है तो खदानों और उनसे जुड़े कारोबार पर असर पड़ सकता है। ऐसे में नए उद्योग और रोजगार के विकल्प तैयार करना जरूरी होगा।
झारखंड: यहां बड़ी आबादी खनन और उससे जुड़े कामों पर निर्भर है। राज्य के राजस्व में भी कोयले का महत्वपूर्ण योगदान है। हालांकि, सौर ऊर्जा की संभावनाएं मौजूद हैं, लेकिन परियोजनाओं के लिए निवेश, जमीन, बुनियादी ढांचे और वित्तीय संसाधनों की जरूरत होगी।
ओडिशा: राज्य की अर्थव्यवस्था में खनन और औद्योगिक गतिविधियों का बड़ा योगदान है। इसके अलावा तटीय क्षेत्रों को चक्रवात और जलवायु परिवर्तन से जुड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। ऐसे में ऊर्जा बदलाव के साथ पर्यावरणीय जोखिमों का प्रबंधन भी जरूरी है।
मध्य प्रदेश: राज्य भी प्रमुख कोयला उत्पादक राज्यों में शामिल है। यहां कोयला खदानों और उनसे जुड़े उद्योगों पर निर्भर क्षेत्रों के लिए भविष्य में रोजगार और आर्थिक गतिविधियों के नए विकल्प तैयार करना महत्वपूर्ण होगा।
Coal Producing States: कोयले से राज्य सरकारों को कितनी कमाई होती है?
कोयला उत्पादक राज्यों की चिंता का एक बड़ा कारण सरकारी राजस्व है। राज्य सरकारों को कोयला खनन पर रॉयल्टी, जिला खनिज प्रतिष्ठान (DMF) और अन्य शुल्कों से आमदनी होती है। कोयले की बिक्री और उससे जुड़ी आर्थिक गतिविधियों से भी सरकारी राजस्व को सहारा मिलता है।
उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, वित्त वर्ष 2023-24 में कोयला उत्पादक राज्यों को कुल 31,281.7 करोड़ रुपये की आमदनी हुई थी। वहीं 2014 से 2023 के बीच प्रमुख कोयला उत्पादक राज्यों ने रॉयल्टी और दूसरे शुल्कों से करीब 1.52 लाख करोड़ रुपये कमाए। झारखंड के लिए कोयले से मिलने वाला राजस्व खास तौर पर महत्वपूर्ण है। दिए गए आंकड़ों के मुताबिक, राज्य के अपने कर राजस्व में कोयले से मिलने वाली राशि का हिस्सा करीब 30 फीसदी है। ऐसे में कोयले की मांग या उत्पादन में बड़ी गिरावट आने पर राज्य के बजट पर दबाव बढ़ सकता है।
रॉयल्टी को लेकर राज्यों के सामने क्या परेशानी है?
कोयला उत्पादक राज्यों के सामने एक बड़ी चुनौती रॉयल्टी की दरों को लेकर भी है। रॉयल्टी वह राशि है, जो खनिज निकालने के बदले सरकार को मिलती है। इसकी दरें खान और खनिज (विकास और विनियमन) अधिनियम, 1957 के तहत तय होती हैं।
कोल इंडिया के पूर्व अध्यक्ष पार्थ सारथी भट्टाचार्य के मुताबिक, रॉयल्टी राज्यों के लिए राजस्व का महत्वपूर्ण स्रोत है, लेकिन इसकी दरें तय करने का अधिकार केंद्र सरकार के पास है। राज्यों के पास अपनी मर्जी से रॉयल्टी बढ़ाने का स्वतंत्र अधिकार नहीं है। अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन के पूर्व महानिदेशक अजय माथुर ने भी रॉयल्टी की दरों और राज्यों के अधिकारों से जुड़ी व्यवस्था का उल्लेख किया है। इसका मतलब है कि अगर कोयले से मिलने वाली आय कम होती है, तो राज्य सरकारें तुरंत रॉयल्टी बढ़ाकर उस कमी की भरपाई नहीं कर सकतीं। ऐसे में उन्हें राजस्व के दूसरे स्रोत विकसित करने होंगे।
Coal Producing States: क्या सौर और पवन ऊर्जा कमाई की भरपाई कर सकती है?
यह ऊर्जा बदलाव का सबसे बड़ा सवाल है। सौर और पवन ऊर्जा परियोजनाओं से नए निवेश, रोजगार और औद्योगिक गतिविधियों के अवसर पैदा हो सकते हैं। लेकिन इनसे मिलने वाला लाभ कोयला खनन से होने वाली कमाई और रोजगार के बराबर होगा या नहीं, यह कई बातों पर निर्भर करेगा।
कोयला खदानों में काम करने वाले मजदूरों और उनसे जुड़े कारोबारों के लिए नए कौशल और रोजगार तैयार करने होंगे। सौर ऊर्जा संयंत्रों के निर्माण और संचालन में रोजगार के अवसर तो मिलेंगे, लेकिन उनकी प्रकृति और संख्या खनन क्षेत्र से अलग हो सकती है। इसके अलावा परियोजनाओं के लिए जमीन, बिजली ग्रिड, ट्रांसमिशन लाइन, निवेश और प्रशिक्षित कामगारों की जरूरत होगी। इसलिए केवल सौर पैनल लगाने से कोयला आधारित अर्थव्यवस्था का विकल्प तैयार नहीं हो जाएगा। विशेषज्ञों के मुताबिक, ऊर्जा बदलाव की योजना में उन इलाकों को प्राथमिकता देनी होगी जहां कोयला खदानों पर निर्भरता सबसे ज्यादा है।
क्या कोयला उत्पादक राज्यों के लिए जरूरी है?
ऊर्जा बदलाव को सफल बनाने के लिए कोयला उत्पादक राज्यों के लिए अलग रणनीति जरूरी होगी। इसके तहत सबसे पहले उन जिलों की पहचान करनी होगी जहां रोजगार और सरकारी राजस्व का बड़ा हिस्सा खनन से आता है। ऐसे क्षेत्रों में सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, बैटरी भंडारण, बिजली उपकरण निर्माण और दूसरे उद्योगों को बढ़ावा दिया जा सकता है। बंद या कम उपयोग वाली खदानों की जमीन का वैकल्पिक इस्तेमाल भी तलाशा जा सकता है। इसके साथ ही खनन क्षेत्र के कामगारों को नए कौशल का प्रशिक्षण देना होगा, ताकि वे बदलती अर्थव्यवस्था में रोजगार हासिल कर सकें। राज्य सरकारों को केंद्र से वित्तीय सहयोग और ऐसी नीतियों की जरूरत होगी, जिनसे कोयले पर निर्भरता कम होने के दौरान स्थानीय अर्थव्यवस्था को अचानक झटका न लगे।
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