Glaucoma Risk Groups: ग्लूकोमा यानी काला मोतियाबिंद आंखों की रोशनी के लिए गंभीर खतरा बन सकता है। शुरुआत में इसके लक्षण आसानी से महसूस नहीं होते, लेकिन धीरे-धीरे ऑप्टिक नर्व को नुकसान पहुंचता रहता है। जब आंखों में बदलाव महसूस होने लगते हैं, तब तक काफी नुकसान हो चुका हो सकता है। इसलिए जिन लोगों में ग्लूकोमा का खतरा ज्यादा होता है, उन्हें नियमित रूप से आंखों की जांच करानी चाहिए। इस बारे में डॉ. पुरेंद्र भसीन, ऑप्थल्मोलॉजिस्ट और फाउंडर-डायरेक्टर, रतन ज्योति नेत्रालय, ग्वालियर ने जानकारी दी।
Glaucoma Risk Groups: बढ़ती उम्र में बढ़ता है ग्लूकोमा का खतरा
डॉ. पुरेंद्र भसीन के मुताबिक, बढ़ती उम्र ग्लूकोमा के प्रमुख रिस्क फैक्टर्स में से एक है। खासकर 40 साल की उम्र के बाद नियमित रूप से आंखों की जांच कराना जरूरी हो जाता है। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि कम उम्र के लोगों को ग्लूकोमा नहीं हो सकता। परिवार में ग्लूकोमा की हिस्ट्री होने पर कम उम्र में भी इसका खतरा हो सकता है।
Glaucoma Risk Groups: परिवार में ग्लूकोमा की हिस्ट्री-
अगर माता-पिता या परिवार के किसी करीबी सदस्य को ग्लूकोमा है, तो नियमित आंखों की जांच और भी जरूरी हो जाती है। परिवार में ग्लूकोमा की जानकारी होने पर आंखों की जांच को टालना नहीं चाहिए, क्योंकि आनुवंशिक कारणों से भी इसका जोखिम बढ़ सकता है।
डायबिटीज के मरीज रहें सावधान-
डायबिटीज का असर सिर्फ ब्लड शुगर तक सीमित नहीं रहता। लंबे समय तक अनियंत्रित ब्लड शुगर आंखों को भी प्रभावित कर सकता है और ग्लूकोमा का जोखिम बढ़ा सकता है। इसलिए डायबिटीज के मरीजों को नियमित रूप से आंखों की जांच कराते रहना चाहिए, ताकि किसी समस्या का समय रहते पता लगाया जा सके।
मायोपिया या हाइपरोपिया वाले लोग-
जिन लोगों को हाई मायोपिया यानी दूर की चीजें देखने में परेशानी होती है, उनमें ग्लूकोमा का खतरा बढ़ सकता है। वहीं, कुछ स्थितियों में हाइपरोपिया वाले लोगों में भी ग्लूकोमा का जोखिम बढ़ सकता है। हालांकि, सिर्फ चश्मे के नंबर से ग्लूकोमा का अंदाजा नहीं लगाया जा सकता। आंखों की बनावट और ऑप्टिक नर्व की स्थिति भी महत्वपूर्ण होती है।
लंबे समय तक स्टेरॉयड लेने वाले-
अमेरिकन एकेडमी ऑफ ऑप्थल्मोलॉजी के मुताबिक, लंबे समय तक स्टेरॉयड का इस्तेमाल ग्लूकोमा का जोखिम बढ़ा सकता है। खासकर स्टेरॉयड आई ड्रॉप्स के लंबे समय तक इस्तेमाल से आंखों का दबाव बढ़ सकता है। इसलिए स्टेरॉयड दवाओं का इस्तेमाल डॉक्टर की सलाह के अनुसार ही करना चाहिए और आंखों के दबाव की नियमित जांच करानी चाहिए।
आंख में चोट या सर्जरी करा चुके लोग-
आंख में लगी पुरानी या नई चोट को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। इसी तरह आंख की सर्जरी के बाद होने वाली कुछ समस्याओं के कारण भी ग्लूकोमा का जोखिम बढ़ सकता है। आंख में चोट या सर्जरी के बाद डॉक्टर से नियमित जांच कराना जरूरी है।
आंखों में बार-बार सूजन होने पर सावधान-
आंखों के अंदर होने वाली सूजन कुछ मामलों में सेकेंडरी ग्लूकोमा से जुड़ी हो सकती है। इसके अलावा सूजन के इलाज में इस्तेमाल होने वाली स्टेरॉयड दवाएं भी आंखों के दबाव को प्रभावित कर सकती हैं। अगर आंखों में बार-बार लालिमा, दर्द, रोशनी से परेशानी या सूजन होती है, तो इसे सामान्य समझकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।
समय पर जांच से नुकसान को कम किया जा सकता है-
डॉ. पुरेंद्र भसीन के अनुसार, ग्लूकोमा को पूरी तरह रोकना संभव नहीं है, लेकिन अगर इसकी पहचान समय रहते हो जाए तो बीमारी की गति को धीमा किया जा सकता है। इसलिए नियमित आंखों की जांच और ऑप्टिक नर्व की निगरानी बेहद जरूरी है। खासकर उन लोगों को ज्यादा सतर्क रहना चाहिए, जिनमें ग्लूकोमा के एक या अधिक जोखिम कारक मौजूद हैं।
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