Hamid Ansari’s statements: पूर्व उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी के एक बयान ने एक बार फिर देश की राजनीति में पुरानी बहस को सामने ला दिया है। अंसारी ने एजी नूरानी की किताब का हवाला देते हुए पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू से जुड़ी एक टिप्पणी दोहराई, जिसमें कथित तौर पर हिंदू दक्षिणपंथी सांप्रदायिकता को भारत के लिए साम्यवाद से बड़ा खतरा बताया गया था। इसके बाद उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अंसारी पर तीखा हमला बोला और उनके बयान को भारतीय संस्कृति और परंपरा के खिलाफ बताया।
लेकिन यह विवाद सिर्फ ताजा बयान तक सीमित नहीं है। हामिद अंसारी उपराष्ट्रपति पद छोड़ने से ठीक पहले भी मुस्लिम समुदाय में असुरक्षा की भावना को लेकर बयान दे चुके हैं। इसके अलावा ईरान में भारत के राजदूत रहते हुए RAW के कथित नेटवर्क से जुड़े गंभीर आरोप भी उनके खिलाफ लगाए गए थे। अंसारी ने इन आरोपों को खारिज किया था। ऐसे में सवाल है कि पूरा विवाद आखिर क्या है और इसके पुराने संदर्भ क्या हैं?
पहले समझिए इस बार हामिद अंसारी ने क्या कहा?
नई दिल्ली में एजी नूरानी की स्मृति में आयोजित कार्यक्रम में बोलते हुए हामिद अंसारी ने नूरानी की 2019 में प्रकाशित किताब The RSS: A Menace to India का संदर्भ दिया। अंसारी ने एक कथन का हवाला दिया, जिसे उन्होंने पूर्व विदेश सचिव जगत सिंह गुंडेविया द्वारा दर्ज नेहरू की टिप्पणी बताया। उनके अनुसार, नेहरू ने कहा था कि भारत के लिए वास्तविक खतरा साम्यवाद नहीं बल्कि हिंदू दक्षिणपंथी सांप्रदायिकता है। अंसारी ने इसी संदर्भ में मौजूदा दौर में नागरिक राष्ट्रवाद और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को लेकर भी चिंता जताई। यानी तकनीकी रूप से अंसारी ने यह बात अपने मूल कथन के तौर पर नहीं, बल्कि नूरानी की किताब और उसमें उद्धृत नेहरू के कथन के संदर्भ में रखी थी।
योगी आदित्यनाथ ने क्यों दिया जवाब?
अंसारी के बयान के अगले दिन मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने उनकी आलोचना की। योगी ने कहा कि इतने बड़े संवैधानिक पद पर रह चुके व्यक्ति को अपने पद की गरिमा का ध्यान रखना चाहिए। उन्होंने अंसारी की टिप्पणी को भारतीय संस्कृति और परंपरा के खिलाफ बताते हुए आरोप लगाया कि इससे भारत की छवि खराब करने की कोशिश होती है। यानी योगी की आपत्ति का केंद्र अंसारी का वह संदर्भ था, जिसमें हिंदू दक्षिणपंथी सांप्रदायिकता को भारत के लिए खतरे के रूप में पेश किया गया।
Hamid Ansari’s statements: क्या हामिद अंसारी पहली बार ऐसा बयान दे रहे हैं?
नहीं। 2017 में उपराष्ट्रपति के रूप में अपना दूसरा कार्यकाल पूरा करने से ठीक पहले अंसारी ने एक इंटरव्यू में कहा था कि देश के मुसलमानों में ‘बेचैनी’ और ‘असुरक्षा’ की भावना पैदा हो रही है। उन्होंने कहा था कि भारत में लंबे समय से चली आ रही ‘स्वीकार्यता की भावना’ पर खतरा महसूस किया जा रहा है। उन्होंने मॉब लिंचिंग, असहिष्णुता और कुछ अन्य घटनाओं का संदर्भ भी दिया था। उस समय भी उनके बयान पर राजनीतिक विवाद हुआ था। उनके आलोचकों ने इसे मुस्लिम समुदाय को लेकर राजनीतिक नैरेटिव बनाने की कोशिश बताया, जबकि अंसारी ने इसे सामाजिक माहौल को लेकर अपनी चिंता के तौर पर रखा था।
पद छोड़ने के बाद भी जारी रही यह बहस
उपराष्ट्रपति पद से हटने के बाद भी अंसारी ने अपने सार्वजनिक लेखन और बयानों में बहुलतावाद, अल्पसंख्यक अधिकार और ‘आइडिया ऑफ इंडिया’ जैसे मुद्दों पर बात की। 2018 में उन्होंने अपने कार्यकाल के बारे में लिखते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विदाई भाषण का भी उल्लेख किया। अंसारी ने कहा कि मोदी की टिप्पणी में उनके मुस्लिम देशों में राजनयिक अनुभव और बाद में अल्पसंख्यक मामलों से जुड़े सार्वजनिक हस्तक्षेप का संदर्भ था। इससे यह स्पष्ट है कि मुस्लिम असुरक्षा, बहुलतावाद और राष्ट्रवाद से जुड़े सवाल अंसारी के सार्वजनिक विमर्श का हिस्सा उनके कार्यकाल के बाद भी बने रहे।

Hamid Ansari’s statements: अब आता है RAW वाला पुराना विवाद
हामिद अंसारी के खिलाफ सबसे गंभीर पुराने आरोपों में से एक उनके ईरान में राजदूत रहने के समय से जुड़ा है। अंसारी 1990 से 1992 के बीच ईरान में भारत के राजदूत थे। बाद में पूर्व RAW अधिकारी एन.के. सूद ने आरोप लगाया कि उनके कार्यकाल के दौरान ईरान में भारत की खुफिया गतिविधियों और RAW से जुड़े नेटवर्क को नुकसान पहुंचा तथा संवेदनशील जानकारी सामने आई। यह आरोप बाद के वर्षों में राजनीतिक बहस का हिस्सा बना। 2022 में भाजपा ने भी पूर्व RAW अधिकारी के आरोपों का हवाला देकर अंसारी से जवाब मांगा था। यह स्थापित तथ्य नहीं बल्कि पूर्व RAW अधिकारी द्वारा लगाया गया आरोप है। हामिद अंसारी ने इन आरोपों को सिरे से खारिज किया और इन्हें ‘झूठ का पुलिंदा’ बताया था।
अंबेडकर का जिक्र क्यों आता है?
इस बहस में डॉ. भीमराव आंबेडकर की किताब Pakistan or the Partition of India के कुछ अंशों का भी अक्सर हवाला दिया जाता है। आंबेडकर ने मुस्लिम राजनीतिक सोच और राष्ट्रवाद पर चर्चा करते हुए उस दौर के कुछ मुस्लिम नेताओं और इस्लामी राजनीतिक अवधारणाओं के संदर्भ में धार्मिक निष्ठा और राष्ट्रीय निष्ठा के बीच संबंध का विश्लेषण किया था। उनके लेखन में इस विषय पर बेहद तीखी टिप्पणियां मिलती हैं। लेकिन यहां भी एक जरूरी अंतर है। आंबेडकर का यह विश्लेषण उस समय के राजनीतिक संदर्भ और मुस्लिम राजनीतिक नेतृत्व की विचारधाराओं पर था। इसे आज के हर भारतीय मुसलमान के बारे में सार्वभौमिक निष्कर्ष के रूप में प्रस्तुत करना उनके मूल संदर्भ को बदल देगा। “किसी मुसलमान की निष्ठा उस देश में उसके निवास पर नहीं, बल्कि उस धर्म पर आधारित होती है, जिससे वह संबंधित है। मुसलमान के लिए ‘जहां वह रहता है, वही उसकी मातृभूमि है’ की धारणा अस्वीकार्य है। जहां इस्लाम का शासन है, वहीं उसका अपना देश है। दूसरे शब्दों में, इस्लाम किसी सच्चे मुसलमान को भारत को अपनी मातृभूमि मानने और किसी हिंदू को अपना निकट संबंधी समझने की अनुमति नहीं देता।”
Hamid Ansari’s statements: ‘इस्लाम पहले, देश बाद में’ वाली बात कहां से आती है?
अंसारी के मामले में यह बात उनके आलोचकों की राजनीतिक व्याख्या के रूप में सामने आती है। उनके 2017 के मुस्लिम असुरक्षा वाले बयान, अल्पसंख्यक मुद्दों पर उनकी टिप्पणियों और पश्चिम एशिया में उनके राजनयिक करियर को जोड़कर कुछ आलोचक उनकी सोच पर सवाल उठाते रहे हैं। लेकिन अंसारी ने स्वयं सार्वजनिक रूप से यह नहीं कहा कि ‘मेरे लिए इस्लाम देश से पहले है।’ दस्तावेजित बयान: मुस्लिम समुदाय में असुरक्षा की बात, बहुलतावाद और नागरिक राष्ट्रवाद पर चिंता जताई ।
भारत ने हामिद अंसारी को क्या सम्मान दिया?
हामिद अंसारी का सार्वजनिक जीवन लंबा रहा है। वह भारतीय विदेश सेवा के अधिकारी रहे, कई देशों में राजनयिक पदों पर रहे और बाद में भारत के उपराष्ट्रपति बने। उन्होंने 2007 से 2017 तक दो कार्यकाल उपराष्ट्रपति के रूप में पूरे किए और राज्यसभा के सभापति भी रहे। इसलिए आज जब उनके किसी बयान पर विवाद होता है, तो उनके आलोचक यह सवाल उठाते हैं कि इतने बड़े संवैधानिक पद पर रह चुके व्यक्ति से राष्ट्रीय एकता और संवैधानिक मूल्यों को ध्यान में रखते हुए सार्वजनिक टिप्पणी की अपेक्षा क्यों न की जाए? दूसरी ओर, उनके समर्थक उनके बयानों को अल्पसंख्यकों की सुरक्षा, बहुलतावाद और संवैधानिक नागरिकता से जुड़ी चिंताओं के रूप में देखते हैं।
Hamid Ansari’s statements: पूरा विवाद आखिर किस बात पर है?
मौजूदा विवाद को तीन स्तरों पर समझा जा सकता है। पहला- नेहरू का कथन: अंसारी ने नूरानी की किताब के हवाले से नेहरू से जुड़ी उस टिप्पणी को दोहराया जिसमें हिंदू दक्षिणपंथी सांप्रदायिकता को खतरे के रूप में बताया गया था। दूसरा- अंसारी का पुराना रिकॉर्ड: 2017 में उन्होंने मुस्लिम समुदाय में असुरक्षा की भावना की बात कही थी और बाद में भी बहुलतावाद तथा नागरिक राष्ट्रवाद पर अपनी राय व्यक्त की। तीसरा-RAW विवाद: पूर्व RAW अधिकारी एन.के. सूद ने ईरान में अंसारी के कार्यकाल को लेकर आरोप लगाए थे, लेकिन अंसारी ने उन आरोपों को खारिज किया था।
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