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Indian Railways Facts: AC कोच में मिलने वाला तकिया कितना होता है साफ, रेलवे ने बताया नियम

Indian Railways Facts : एसी कोच में चादर और कंबल के साथ जो तकिया मिलता है, उस पर सिर रखते ही नींद आ जाती है। लेकिन क्या कभी सोचा है कि यह तकिया आखिरी बार कब धुला था? कवर तो हर सफर के बाद बदल जाता है, मगर अंदर का तकिया? इसका जवाब थोड़ा चौंकाने वाला है। एक समय था जब रेलवे के नियम कहते थे कि एसी कोच का तकिया पूरे 24 महीने यानी दो साल तक चल सकता है।

कवर तो धुलते थे, पर तकिए को धोने का कोई नियम ही नहीं था। नतीजा यह होता था कि सैकड़ों यात्रियों के इस्तेमाल के बाद तकिए पीले पड़ जाते थे। पसीना, धूल और दाग कवर के पार जाकर तकिए तक पहुंच जाते थे। दिखने में साफ लगने वाला तकिया असल में काफी कुछ झेल चुका होता था।

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लगातार शिकायतों और स्वच्छता को लेकर बढ़ती जागरूकता के बाद रेलवे को भी लगा कि बदलाव जरूरी है। पूर्वोत्तर सीमांत रेलवे ने अपनी मैकेनाइज्ड लॉन्ड्री में तकियों को धोकर टेस्ट किया। नतीजा उम्मीद से बेहतर रहा। मशीन में धुलने के बाद तकिए की क्वालिटी खराब नहीं हुई। बस फिर क्या था, रेलवे ने पूरे देश में नया नियम लागू कर दिया। अब नियम साफ है। एसी कोच में मिलने वाले हर तकिए को कम से कम 6 महीने में एक बार धोना जरूरी है। अगर कोई तकिया ज्यादा गंदा लग रहा है तो उसे 6 महीने से पहले भी लॉन्ड्री भेज दिया जाता है। हां, तकिए की कुल उम्र आज भी 24 महीने ही है। लेकिन फर्क इतना है कि इन दो सालों में वह कई बार मशीन से नहाकर आता है।

इसका हुआ फायदा

सबसे बड़ा फायदा यात्रियों को हुआ। अब तकिए में पहले जैसी बदबू या पीले धब्बे नहीं दिखते। नियमित धुलाई से धूल और बैक्टीरिया का खतरा कम हो गया है। सफर पहले से ज्यादा साफ और आरामदायक लगता है। रेलवे के लिए भी यह स्वच्छ भारत की तरफ एक बड़ा कदम साबित हुआ। तो अगली बार जब आप एसी कोच में तकिए पर सिर रखें तो टेंशन मत लीजिए। 2016 से पहले वाला दौर अब चला गया। अब आपका तकिया सिर्फ ऊपर से ही नहीं, अंदर से भी साफ होता है। हर 6 महीने में कम से कम एक बार तो वह लॉन्ड्री का चक्कर जरूर लगाता है।

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Written By : Mansi Sharma