Lalbaugcha Raja: मुंबई में गणेशोत्सव की शुरुआत के साथ ही हर तरफ ‘गणपति बप्पा मोरया’ के जयकारे, ढोल-नगाड़ों की आवाज और भक्तों की भीड़ नजर आ रही है। मुंबई की पहचान बन चुके लालबागचा राजा भी भक्तों के बीच विराजमान हो चुके हैं। 11 सितंबर की शाम 7 बजे जैसे ही बप्पा की भव्य मूर्ति से पर्दा हटाया गया, पूरा पंडाल भक्तिभाव और उत्सव के माहौल से भर गया। 14 सितंबर से गणेशोत्सव का शंखनाद भी हो चुका है। ऐसे में आइए जानते हैं कि इस बार लालबाग के राजा का दरबार किस तरह सजाया गया है और उनका वह ऐतिहासिक सफर क्या है, जिसके कारण भक्त लंबी कतारों में खड़े होकर दर्शन करना भी अपना सौभाग्य मानते हैं।
Lalbaugcha Raja: चांदी की परत से सजा भव्य दरबार
इस साल लालबागचा राजा को मंदिर की थीम पर तैयार किए गए बेहद भव्य पंडाल में विराजमान किया गया है। पंडाल की नक्काशी और उसकी बारीक कारीगरी लोगों का ध्यान खींच रही है। इसकी सबसे खास बात यह है कि पंडाल पर चांदी की परत चढ़ाई गई है, जिससे पूरा दरबार शाही महल जैसा नजर आ रहा है। वहीं, बप्पा का स्वरूप इस बार भी पारंपरिक अंदाज में दिखाई दे रहा है। लालबाग के राजा ने संतरी रंग की धोती धारण की है। भक्तों को आशीर्वाद देते हुए बप्पा का यह मनमोहक रूप हर किसी को आकर्षित कर रहा है।
25 सितंबर तक होंगे बप्पा के दर्शन
जो भक्त लालबागचा राजा के दर्शन करना चाहते हैं, उनके लिए दर्शन 14 सितंबर से शुरू हो चुके हैं और 25 सितंबर तक चलेंगे। यानी 11 दिनों तक चलने वाले इस गणेशोत्सव में बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं के पहुंचने की उम्मीद है।

Lalbaugcha Raja: 1934 में हुई थी शुरुआत
लालबागचा राजा के पंडाल की कहानी मुंबई के पुतलाबाई चॉल से जुड़ी है और इसकी जड़ें 1900 के दशक की शुरुआत तक जाती हैं। उस समय परेल का लालबाग इलाका कपड़ा मिलों के लिए जाना जाता था। यहां 100 से ज्यादा मिलें थीं और इसी वजह से इस इलाके को ‘गिरनगांव’ कहा जाता था।
बाजार बंद होने पर लोगों ने मांगी थी बप्पा से मदद
1930 के दशक में औद्योगीकरण बढ़ने के साथ टेक्सटाइल इंडस्ट्री को बड़ा नुकसान पहुंचा। इस दौरान यहां का पुराना बाजार बंद हो गया। इससे स्थानीय व्यापारियों और मछुआरों के सामने रोजगार और रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो गया। परेशान लोगों ने गणपति बप्पा से मदद की प्रार्थना की। मान्यता है कि बप्पा ने उनकी प्रार्थना स्वीकार की और लोगों को एक नई जगह मिली, जहां बाद में आज का प्रसिद्ध लालबाग मार्केट स्थापित हुआ।
इसी मन्नत के पूरा होने की खुशी में 1934 में ‘सार्वजनिक गणेश महोत्सव मंडल’ की स्थापना की गई। बाजार के एक हिस्से को गणपति बप्पा की पूजा के लिए समर्पित किया गया। तभी से लालबागचा राजा को इलाके के ‘राजा’ और ‘नवसाचा गणपति’ के रूप में पूजा जाने लगा। ‘नवसाचा गणपति’ का अर्थ मन्नत पूरी करने वाले गणेश से है।
Lalbaugcha Raja: कंबली परिवार ही बनाता है मूर्ति
लालबागचा राजा की मूर्ति से जुड़ी एक खास बात यह है कि इसे बनाने का काम शुरुआत से लेकर आज तक कंबली परिवार ही करता आ रहा है। यही परिवार मूर्ति के रखरखाव की जिम्मेदारी भी संभालता है। इतना ही नहीं, इस मूर्ति के डिजाइन का पेटेंट भी कंबली परिवार के नाम पर दर्ज है।
दर्शन के लिए घंटों इंतजार करते हैं भक्त
लालबागचा राजा के प्रति भक्तों की आस्था बेहद गहरी है। अपनी मनोकामनाएं लेकर श्रद्धालु नवसाची लाइन में 24 से 40 घंटे तक इंतजार करते हैं। घंटों की इस लंबी कतार के बावजूद भक्त बिना थके अपनी बारी का इंतजार करते हैं, ताकि उन्हें अपने राजा के करीब जाकर उनके दर्शन करने का मौका मिल सके।







