Mamata vs Ritabrata: पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में भाजपा की प्रचंड जीत और TMC की करारी हार के बाद पार्टी में आंतरिक घमासान अब कानूनी लड़ाई बन चुका है। दोनों विरोधी गुटों ने खुद को ‘असली TMC’ बताते हुए चुनाव आयोग के सामने अलग-अलग सूचियां दाखिल कर दी हैं।
Mamata vs Ritabrata: बागी गुट का बड़ा दांव, 62 विधायक अपने पाले में-
ममता बनर्जी को उस समय बड़ा झटका लगा जब बागी गुट ने 80 में से 62 विधायकों को अपने साथ कर लिया। इसके बाद ऋतब्रत बनर्जी की अगुवाई में ममता बनर्जी को पार्टी चेयरपर्सन पद से हटाकर विधायक अरूप रॉय को नया अध्यक्ष घोषित कर दिया गया।
Mamata vs Ritabrata: क्या है चुनाव आयोग का ‘टू-विंग टेस्ट’-
‘इलेक्शन सिम्बल्स ऑर्डर, 1968’ के तहत EC दो मोर्चों पर जांच करता है। पहले विंग का नाम है, विधायी विंग यह देखता है कि संसद और विधानसभा में किसके पास ज्यादा निर्वाचित सदस्य हैं। दूसरे विंग का नाम है, संगठनात्मक विंग यह देखता है कि पार्टी में राष्ट्रीय कार्यकारिणी और पदाधिकारियों में किसे ज्यादा समर्थन है।
1969 का कांग्रेस विभाजन ,जहां से बना यह नियम-
यह टेस्ट 1969 के कांग्रेस विभाजन की देन है, जब पार्टी ‘कांग्रेस J’ और ‘कांग्रेस O’ में बंट गई थी। दोनों ने ‘बैलों की जोड़ी’ चिह्न पर दावा किया। 1971 में सुप्रीम कोर्ट ने ‘सादिक अली बनाम भारत निर्वाचन आयोग’ मामले में संख्या बल के परीक्षण को वैध ठहराया और तब से यह नजीर बन गई।
शिवसेना-NCP में भी हो चुका है यही फैसला-
महाराष्ट्र में एकनाथ शिंदे की बगावत के बाद EC ने विधायी बहुमत के आधार पर शिंदे गुट को असली शिवसेना और ‘तीर-कमान’ सिंबल दिया। इसी तरह अजित पवार के पास अधिक विधायक होने के कारण उन्हें असली NCP और ‘घड़ी’ का सिंबल मिला।
TMC के लिए क्या होगा आगे-
ऋतब्रत गुट के पास विधायकों का भारी बहुमत होने से उनका पलड़ा भारी दिखता है। लेकिन फैसला आने तक ₹676 करोड़ का पार्टी फंड फ्रीज रहेगा, कोलकाता नगर निगम चुनाव में दोनों गुटों को अंतरिम नाम और सिंबल से उतरना पड़ सकता है।पार्टी का नाम, चिह्न और संपत्ति सब कुछ अधर में लटका रहेगा।
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