New Delhi: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) प्रमुख मोहन भागवत के न्यूयॉर्क दौरे और मैडिसन स्क्वेयर गार्डन में उनके कार्यक्रम को लेकर विरोध के जो स्वर उठे, उनके कारण संघ को न सिर्फ राष्ट्रीय, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर फायदा मिलने की संभावनाएं हैं।हालांकि न्यूयॉर्क के मेयर जोहरान ममदानी और विरोध में उतरे संगठनों को लग सकता है कि वे अपने उद्देश्य में सफल रहे, लेकिन सच यही है कि विरोध के कारण जहां भागवत के कार्यक्रम को दुनियाभर में पब्लिसिटी मिली, वहीं भविष्य में संघ को राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लाभ मिलेगा।
मीडिया में विशेष चर्चा
अमेरिकन हिंदूज फॉर एंगेजमेंट एंड डायलॉग (AHEAD) और कई अन्य हिंदू संगठनों की ओर से आयोजित कार्यक्रम का जो विरोध हुआ, उसने न सिर्फ अमेरिका के प्रवासी भारतीयों, बल्कि पूरी दुनिया का ध्यान आकर्षित किया है।विरोध-प्रदर्शनों के चलते यह कार्यक्रम अमेरिकी मेनस्ट्रीम मीडिया की सुर्खियों में छा गया।जाहिर है कि संघ विचारधारा और विश्व स्तर के उसके अभियान स्वत: ही मीडिया में चर्चा का विषय बन गए।आयोजक संगठनों और संघ विचार से जुड़े लोगों को बिना कुछ किये ही मीडिया में जगह मिल गई।
New Delhi: विदेशों में विस्तार की संभावनाएं बढ़ी
संघ को विरोध का दूसरा सबसे बड़ा फायदा यह हुआ कि इससे अमेरिका ही नहीं, बल्कि दुनियाभर में प्रवासी भारतीयों के बीच उसकी पहुंच बढ़ी है।अब प्रवासियों में संघ के कार्यक्रमों और अभियानों को लेकर स्वाभाविक रूप से चर्चा होगी।यूनाइटेड स्टेट्स कमीशन ऑन इंटरनेशनल रिलीजियस फ्रीडम (USCIRF) ने अमेरिकी प्रशासन से मोहन भागवत का वीजा रद्द करने और संघ के सदस्यों पर प्रतिबंध लगाने की जो अपील की, न्यूयॉर्क के मेयर जोहरान ममदानी ने जिस तरह आरएसएस के एजेंडे और भागवत के कार्यक्रम की कड़ी आलोचना की, उससे संघ विचार से जुड़े प्रवासियों में एकजुटता बढ़ेगी। उनकी भावनाओं को जो ठेस पहुंची है, उससे वे भला चुप कैसे बैठे रहेंगे? निश्चित ही अब वे अन्य प्रवासियों को भी संघ के करीब लाने के लिए सक्रिय होंगे और विदेशों में संघ के विस्तार की संभावनाएं बढ़ेंगी।
New Delhi: राजनीतिक मोर्चे पर मजबूती
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को न सिर्फ विदेशों में फायदा होगा, बल्कि अपने देश के भीतर भी संघ कार्यकर्ताओं में नई ऊर्जा का संचार होगा।आम भारतीय जनता में भी यह संदेश जा सकता है कि “वसुधैव कुटुम्बकम्” के जिस भाव के साथ संघ अपने लक्ष्य पर आगे बढ़ रहा है, विदेशों में उसे देखते हुए बौखलाहट है।सवाल उठ सकते हैं कि आखिर यह बौखलाहट क्यों? क्या यह हिंदू विचारधारा के प्रति नफरत का नतीजा तो नहीं? राजनीतिक मोर्चे की बात करें तो संघ विचारधारा से निकले राजनेता इस तरह के सवाल आगामी चुनावों में उठा सकते हैं। इसका उन्हें स्वाभाविक तौर पर फायदा मिलेगा।








