Home » मध्य प्रदेश » शब्द नहीं है… ये तस्वीरें ही बयां कर देंगी जबलपुर बरगी डैम हादसे की कहानी, देखें कैसे मौत के सन्नाटे में जिंदा रही ‘मां की ममता’

शब्द नहीं है… ये तस्वीरें ही बयां कर देंगी जबलपुर बरगी डैम हादसे की कहानी, देखें कैसे मौत के सन्नाटे में जिंदा रही ‘मां की ममता’

जबलपुर बरगी डैम का ‘मौत वाला क्रूज’

MP News: क्योंकि हर तस्वीर सिर्फ दिखती नहीं, बहुत कुछ कह जाती है… और जब कुदरत का कहर टूटता है, तो इंसान को संभलने का मौका तक नहीं मिलता। लेकिन उस अफरातफरी, चीख-पुकार और मौत के सन्नाटे के बीच भी अगर कुछ अमर रह जाता है, तो वह है ‘मां की ममता।‘ दरअसल, मध्य प्रदेश के जबलपुर स्थित बरगी डैम में हुए दर्दनाक क्रूज हादसे ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया है। इस हादसे में अब तक 9 लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि 28 लोगों को सुरक्षित बचा लिया गया है। कई लोग अभी भी लापता हैं, जिनकी तलाश लगातार जारी है।

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रेस्क्यू ऑपरेशन के दौरान जो दृश्य सामने आया, उसने हर किसी की आंखें नम कर दीं। हादसे के करीब 14 घंटे बाद जब पैरामिलिट्री डाइविंग टीम पानी की गहराइयों में उतरी और क्रूज के मलबे तक पहुंची, तो वहां एक ऐसा मंजर था जिसे शब्दों में बयां करना मुश्किल है। संकरी जगहों से गुजरते हुए जब गोताखोर अंदर पहुंचे, तो उन्हें दो शव एक-दूसरे से लिपटे हुए मिले। ये शव दिल्ली की रहने वाली जूलियस मेसी और उनकी मासूम बेटी सिया मेसी के थे।

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डाइविंग टीम के एक सदस्य ने बताया कि जब उन्होंने जूलियस का शव निकालने की कोशिश की, तो वह हिल ही नहीं रहा था। पहले तो उन्हें लगा कि मलबे में फंसा हुआ है, लेकिन जब टॉर्च की रोशनी में पास जाकर देखा, तो दिल दहला देने वाला सच सामने आया।

मां ने अपनी बेटी को सीने से इस कदर कसकर लगाया हुआ था, जैसे आखिरी सांस तक उसे मौत से बचाने की कोशिश कर रही हो। पानी के तेज दबाव और जिंदगी की अंतिम जंग के बीच भी उसकी पकड़ ढीली नहीं हुई थी। मौत के बाद भी मां की बाहें अपनी बच्ची के लिए ढाल बनी रहीं। रेस्क्यू टीम को दोनों को अलग करने में काफी मशक्कत करनी पड़ी—ममता का वो बंधन, जो जिंदगी के बाद भी नहीं टूटा।

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जानकारी के मुताबिक, दिल्ली के खजन बस्ती इलाके से मेसी परिवार अपने दोस्तों के साथ छुट्टियां मनाने जबलपुर आया था। परिवार के छह सदस्य जूलियस मेसी, सिया मेसी, प्रतिम मेसी, प्रदीप मेसी, मरीना और करण वर्मा बच्चों की जिद पर बरगी डैम घूमने पहुंचे थे। शाम करीब 4 बजे का समय था। ढलती धूप, ठंडी हवा और क्रूज पर सवार करीब 40 सैलानी हर कोई खुशी के पल जी रहा था। किसी को अंदाजा तक नहीं था कि कुछ ही घंटों में यह सफर मौत के मंजर में बदल जाएगा।

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हादसे से बचीं संगीता कोरी के बयान ने कई चौंकाने वाली लापरवाहियों को उजागर किया है। उन्होंने बताया कि क्रूज पर किसी भी यात्री को लाइफ जैकेट नहीं पहनाई गई थी। जैकेट्स स्टोर रूम में बंद रखी थीं। जब नाव में पानी भरने लगा, तब घबराहट में जैकेट बांटी जाने लगीं, जिससे अफरा-तफरी और छीना-झपटी मच गई। कई लोगों को संभलने का मौका तक नहीं मिला।

यह हादसा कई बड़े सवाल खड़े करता है…

क्या बिना सुरक्षा इंतजामों के क्रूज संचालन की अनुमति दी गई थी?

खराब मौसम के बावजूद इसे बीच पानी में क्यों ले जाया गया?

क्या सुरक्षा नियम सिर्फ कागजों तक ही सीमित रह गए हैं?

बरगी डैम जैसे लोकप्रिय पर्यटन स्थल पर इस तरह की लापरवाही यह साफ दर्शाती है कि कहीं न कहीं जिम्मेदारी से ज्यादा मुनाफे को प्राथमिकता दी जा रही थी। जो ये साबित करता है कि यह सिर्फ एक हादसा नहीं, बल्कि सिस्टम की बड़ी विफलता की दर्दनाक कहानी है जिसकी कीमत कई मासूम जिंदगियों ने अपनी जान देकर चुकाई।

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