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निशु आजाद विवाद: देवी-देवताओं के अपमान पर क्या कहते हैं संवैधानिक नियम, पुलिस स्वतः संज्ञान लेकर FIR कर सकती है?

Religious faith:

Religious faith: भारत में हर व्यक्ति को अपने धर्म को मानने और उसका पालन करने की स्वतंत्रता संविधान देता है। लेकिन धार्मिक स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति की आजादी का मतलब यह नहीं कि किसी धर्म, धार्मिक विश्वास या देवी-देवताओं का जानबूझकर अपमान किया जा सकता है। ऐसे मामलों में भारतीय न्याय संहिता, 2023 में आपराधिक प्रावधान किए गए हैं। बतादें कि दिल्ली में स्वतंत्र भारद्वाज (Swatantra Bharadwaj) की गिरफ़्तारी के बाद निशु आजाद (Nishu Azad)और उसके पिता पर कई तरह के आरोप लगाए जा रहे हैं कि उन्होंने समय समय पर हिन्दू धर्म के देवी देवताओं का अपमान किया है।  लोगों की आस्था को ठेस पहुंचाई है। उसके बाद भी कार्यवाही क्यों नहीं की जा रही है।

संविधान में धार्मिक आस्था की क्या सुरक्षा है?

संविधान का अनुच्छेद 25 प्रत्येक व्यक्ति को धर्म मानने, आचरण करने और प्रचार करने की स्वतंत्रता देता है। हालांकि यह अधिकार सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य के अधीन है। वहीं अनुच्छेद 19(1)(a) अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देता है, लेकिन अनुच्छेद 19(2) के तहत सार्वजनिक व्यवस्था और अन्य संवैधानिक आधारों पर उचित प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं। यानी कानून धार्मिक स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बीच संतुलन बनाता है।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा- शिकायत का इंतजार नहीं, पुलिस खुद दर्ज करे FIR

धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने और धर्म के नाम पर नफरत फैलाने वाले मामलों में सुप्रीम कोर्ट ने 28 अप्रैल 2023 को महत्वपूर्ण निर्देश दिया था। अश्विनी कुमार उपाध्याय बनाम भारत संघ, रिट याचिका (सिविल) संख्या 943/2021 में कोर्ट ने कहा कि यदि कोई भाषण या ऐसा कृत्य सामने आता है जिससे उस समय लागू भारतीय दंड संहिता की धाराएं 153A, 153B, 295A, 505 आदि के तहत अपराध बनता है, तो पुलिस को किसी शिकायत का इंतजार किए बिना स्वतः संज्ञान लेकर मामला दर्ज करना चाहिए और कानून के अनुसार कार्रवाई करनी चाहिए कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि ऐसी कार्रवाई आरोपी या बयान देने वाले व्यक्ति के धर्म की परवाह किए बिना होनी चाहिए, ताकि संविधान में निहित भारत के धर्मनिरपेक्ष चरित्र की रक्षा की जा सके। यानी सुप्रीम कोर्ट की इस व्यवस्था का मूल संदेश यही है कि संज्ञेय धार्मिक अपराध या हेट स्पीच सामने आने पर पुलिस केवल शिकायतकर्ता के आने का इंतजार करके कार्रवाई से पीछे नहीं हट सकती।

Religious faith: BNS में धार्मिक अपमान पर क्या प्रावधान हैं?

भारतीय न्याय संहिता के धर्म से संबंधित अपराधों में कई महत्वपूर्ण धाराएं हैं।

  • धारा 298- किसी वर्ग के धर्म का अपमान करने के इरादे से उसके पूजा स्थल या पवित्र वस्तु को नष्ट करने, नुकसान पहुंचाने या अपवित्र करने से संबंधित है। इसमें दो साल तक की सजा, जुर्माना या दोनों हो सकते हैं।
  • धारा 299 सबसे महत्वपूर्ण प्रावधानों में से एक है। इसमें जानबूझकर और दुर्भावनापूर्ण इरादे से किसी वर्ग की धार्मिक भावनाओं को भड़काने के उद्देश्य से उसके धर्म या धार्मिक विश्वासों का अपमान करने पर तीन साल तक की जेल, जुर्माना या दोनों का प्रावधान है। इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से किया गया अपमान भी इसके दायरे में आ सकता है।
  • धारा 300 कानूनी रूप से चल रही धार्मिक सभा या समारोह में जानबूझकर बाधा डालने से संबंधित है, जबकि
  • धारा 301 पूजा स्थल, कब्रिस्तान या अंतिम संस्कार से जुड़ी गतिविधियों में आपत्तिजनक हस्तक्षेप से संबंधित है। दोनों में परिस्थितियों के अनुसार सजा का प्रावधान है।
  • धारा 302 किसी व्यक्ति की धार्मिक भावनाओं को जानबूझकर चोट पहुंचाने वाले शब्द, संकेत या प्रदर्शन से संबंधित है।
Religious faith: FIR और पुलिस की भूमिका क्या है?

298 और 299 जैसे अपराध संज्ञेय हैं। यदि पुलिस को किसी संज्ञेय अपराध की सूचना मिलती है तो वह कानून के अनुसार FIR दर्ज कर जांच शुरू कर सकती है। सूचना मिलने के लिए किसी विशेष व्यक्ति की शिकायत ही एकमात्र रास्ता नहीं है। यदि थाना पुलिस सूचना दर्ज करने से इनकार करती है तो BNSS की धारा 173(4) के तहत संबंधित पुलिस अधीक्षक को लिखित रूप में सूचना भेजी जा सकती है। हालांकि FIR दर्ज होना दोष सिद्ध होना नहीं है। जांच के बाद मामला अदालत में जाता है और अंतिम रूप से अपराध हुआ या नहीं, यह न्यायालय तय करता है।

निशु आजाद द्वारा देवी देवताओं के अपमान पर लोगों की पुलिस से कार्यवाही की अपील

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