UP Election 2027: उत्तर प्रदेश की राजनीति में 2027 विधानसभा चुनाव को लेकर समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के बीच सीट बंटवारे की चर्चा अब केवल सीटों के आंकड़े तक सीमित नहीं दिख रही है। दोनों दलों के बीच संभावित गठबंधन का फॉर्मूला 2027 के चुनावी समीकरण के साथ-साथ 2029 की लोकसभा राजनीति के लिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। हालांकि, सीटों की संख्या को लेकर अंतिम समझौता अभी सामने नहीं आया है। हालिया रिपोर्टों में कांग्रेस की ओर से 107 से 120 सीटों तक की मांग और सपा की ओर से करीब 80 से 86 सीटों के फॉर्मूले की चर्चा है।
सीटों का गणित या राजनीतिक हिस्सेदारी की लड़ाई?
कांग्रेस की रणनीति में उत्तर प्रदेश में संगठन को फिर से मजबूत करना और अधिक विधानसभा सीटों पर अपना आधार तैयार करना अहम दिखाई देता है। पार्टी के प्रदेश प्रभारी राजेंद्र पाल गौतम ने हाल ही में कहा कि कांग्रेस 403 विधानसभा सीटों पर अपनी तैयारी कर रही है और गठबंधन को लेकर चर्चा आगे होनी है। वहीं, सपा अपनी चुनावी तैयारियों को अलग स्तर पर आगे बढ़ा रही है। पार्टी ने सभी 403 सीटों पर संगठन और चुनावी तैयारी को लेकर काम शुरू कर दिया है। ऐसे में कांग्रेस के साथ सीट बंटवारा सपा के लिए केवल सहयोगी को सीट देने का मामला नहीं, बल्कि अपने संगठनात्मक विस्तार और चुनावी रणनीति के साथ तालमेल बैठाने की चुनौती भी है।
UP Election 2027: 2017 की छाया, 2027 की नई पटकथा
सपा और कांग्रेस के बीच सीट शेयरिंग की मौजूदा बातचीत में 2017 का चुनाव बार-बार संदर्भ बन रहा है। उस चुनाव में दोनों दलों ने गठबंधन किया था और कांग्रेस को 100 से अधिक सीटें मिली थीं। इस बार दोनों दल उस अनुभव से अलग फॉर्मूला तलाशने की कोशिश में बताए जा रहे हैं। कांग्रेस की तरफ से अधिक सीटों की मांग और सपा की ओर से सीमित हिस्सेदारी के प्रस्ताव की खबरें इसी खींचतान को सामने रखती हैं। कांग्रेस के लिए चुनौती यह है कि वह पर्याप्त सीटें हासिल करके अपने संगठन को विधानसभा स्तर पर मजबूत करे, जबकि सपा का जोर उन सीटों पर अधिक रहने की संभावना है जहां उसके उम्मीदवार गठबंधन के लिहाज से मजबूत माने जाते हैं।
कांग्रेस की नजर 2029 पर?
राजनीतिक तौर पर 2027 विधानसभा चुनाव कांग्रेस के लिए उत्तर प्रदेश में संगठन और जनाधार को परखने का महत्वपूर्ण अवसर हो सकता है। विधानसभा चुनाव में मिलने वाली सीटें और वोट प्रतिशत भविष्य में पार्टी की लोकसभा रणनीति को प्रभावित कर सकते हैं। यही वजह है कि कांग्रेस अधिक सीटों पर चुनाव लड़ने की कोशिश कर रही है, जबकि सपा सीटों के चयन में जीत की संभावना और स्थानीय संगठन को प्रमुख आधार बनाना चाहती है। हालांकि, यह कहना अभी जल्दबाजी होगा कि दोनों दलों के बीच 2029 को लेकर कोई औपचारिक रोडमैप तय हो चुका है।
UP Election 2027: सामाजिक समीकरण भी अहम
सपा और कांग्रेस के बीच केवल सीटों का नहीं, बल्कि सामाजिक आधार का भी सवाल है। कांग्रेस जातिगत जनगणना और सामाजिक न्याय जैसे मुद्दों को प्रमुखता दे रही है। दूसरी ओर, सपा अपने पीडीए पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक- सामाजिक समीकरण को लगातार राजनीतिक विमर्श के केंद्र में रख रही है। इसी के साथ सपा की ओर से ब्राह्मण और दूसरे सामाजिक समूहों तक पहुंच बढ़ाने की कोशिशों की भी चर्चा है। ऐसे में दोनों दलों के सामने चुनौती यह है कि उनके सामाजिक समीकरण एक-दूसरे के वोट आधार को मजबूत करें, न कि गठबंधन के भीतर ही प्रतिस्पर्धा पैदा करें।

क्या गठबंधन का दायरा बढ़ेगा?
एक और महत्वपूर्ण सवाल गठबंधन के स्वरूप को लेकर है। क्या सपा और कांग्रेस गठबंधन को दो दलों तक सीमित रखेंगे या इसमें दूसरे छोटे दलों और सामाजिक समूहों को भी शामिल किया जाएगा? कांग्रेस की ओर से व्यापक विपक्षी एकजुटता की पैरवी और सपा की ओर से अपने संगठनात्मक नियंत्रण पर जोर- दोनों रुख आने वाले दिनों में सीट शेयरिंग की दिशा तय कर सकते हैं।
UP Election 2027: असली लड़ाई सीटों से आगे
उत्तर प्रदेश की राजनीति में 2027 का चुनाव भले ही तत्काल लक्ष्य है, लेकिन सपा और कांग्रेस दोनों के लिए इसके नतीजे आने वाले वर्षों की राजनीति पर असर डाल सकते हैं। कांग्रेस के लिए ज्यादा सीटों पर संगठन खड़ा करने का अवसर है, जबकि सपा के लिए गठबंधन में अपनी केंद्रीय भूमिका बनाए रखना अहम है।
इसलिए मौजूदा सीट शेयरिंग की बातचीत को सिर्फ 80 बनाम 115 या 120 सीटों का आंकड़ा मानना तस्वीर का एक हिस्सा भर है। असली सवाल यह है कि 2027 के लिए बनने वाला गठबंधन दोनों दलों के बीच सीटों, सामाजिक आधार और राजनीतिक नेतृत्व का संतुलन किस तरह तय करता है-और यही संतुलन आगे की राष्ट्रीय राजनीति में उनकी भूमिका को प्रभावित कर सकता है।
लेखक -मुकेश तिवारी
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