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EVM की जगह बैलेट पेपर से चुनाव कितना व्यावहारिक? विपक्ष क्यों कर रहा बदलाव की मांग

EVM की जगह बैलेट पेपर क्यों मांग रहा विपक्ष?
EVM की जगह बैलेट पेपर क्यों मांग रहा विपक्ष?

EVM vs Ballot Paper: भारत में चुनाव कराने के लिए इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन यानी EVM या बैलेट पेपर के इस्तेमाल को लेकर बहस एक बार फिर तेज हो गई है। 30 सितंबर 2026 को INDIA ब्लॉक की बैठक के बाद विपक्षी दलों ने आगामी चुनावों में EVM की जगह बैलेट पेपर से मतदान कराने की मांग दोहराई। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने कहा कि बैठक में शामिल दलों ने EVM के बजाय बैलेट पेपर के इस्तेमाल पर सहमति जताई। यह मांग ऐसे समय में सामने आई है, जब विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR के कारण मतदाता सूची और चुनावी प्रक्रिया में पारदर्शिता को लेकर भी सवाल उठाए जा रहे हैं।

EVM vs Ballot Paper: विपक्ष बैलेट पेपर की मांग क्यों कर रहा है?

विपक्षी दलों का मुख्य तर्क चुनावी प्रक्रिया में भरोसे और वोट के सत्यापन से जुड़ा है। उनका कहना है कि मतदान की ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए, जिसमें मतदाता के सामने उसके वोट का कागजी रिकॉर्ड मौजूद रहे और जरूरत पड़ने पर उसकी गिनती को सीधे जांचा जा सके।विपक्षी दल लंबे समय से EVM की विश्वसनीयता को लेकर सवाल उठाते रहे हैं। मौजूदा बहस में इस मुद्दे को चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली और मतदाता सूची में किए जा रहे बदलावों से भी जोड़ा जा रहा है।

हालांकि, EVM में गड़बड़ी या चुनाव परिणामों में हेरफेर का आरोप लगना और उसका प्रमाण सामने आना दो अलग-अलग बातें हैं। चुनाव आयोग का कहना है कि EVM और VVPAT व्यवस्था कई तकनीकी और प्रशासनिक सुरक्षा उपायों के साथ संचालित होती है। आयोग के मुताबिक, EVM से संबंधित मामलों में अदालतों ने मशीनों को हटाकर पूरी तरह बैलेट पेपर पर लौटने की मांग को स्वीकार नहीं किया है।

क्या बैलेट पेपर ज्यादा पारदर्शी है?

बैलेट पेपर और EVM में से कौन-सी व्यवस्था ज्यादा सुरक्षित या पारदर्शी है, इसका जवाब इतना आसान नहीं है। बैलेट पेपर का एक बड़ा फायदा यह है कि वोट का भौतिक रिकॉर्ड सीधे मौजूद रहता है। मतदाता उम्मीदवार के सामने निशान लगाता है और फिर बैलेट को बॉक्स में डाल देता है।कनाडा में संघीय चुनावों के दौरान पेपर बैलेट को हाथ से गिना जाता है। ब्रिटेन में भी मतदाता बैलेट पेपर पर उम्मीदवार के सामने निशान लगाकर उसे बॉक्स में डालता है।लेकिन बैलेट पेपर के साथ कुछ चुनौतियां भी होती हैं। चुनाव आयोग के अनुसार, गलत तरीके से निशान लगाने या स्याही फैलने जैसी स्थिति में वोट अमान्य हो सकता है। इसके अलावा बैलेट बॉक्स में फर्जी वोट डालने, पहले से निशान लगाए गए बैलेट के इस्तेमाल और हाथ से मतगणना के दौरान मानवीय गलती की आशंका भी रहती है।

EVM vs Ballot Paper: EVM की जगह बैलेट पेपर क्यों मांग रहा विपक्ष?
EVM की जगह बैलेट पेपर क्यों मांग रहा विपक्ष?

दूसरी ओर, EVM में वोट डालने के बाद VVPAT के जरिए मतदाता कुछ सेकंड के लिए यह देख सकता है कि उसका वोट किस उम्मीदवार के नाम दर्ज हुआ है। चुनाव आयोग के अनुसार, VVPAT पर्ची पर उम्मीदवार का क्रमांक, नाम और चुनाव चिह्न दिखाई देता है और यह पर्ची पारदर्शी खिड़की के पीछे करीब 7 सेकंड तक दिखाई देती है।भारत में VVPAT का इस्तेमाल 2013 में शुरू हुआ था और अब EVM के साथ यह चुनावी प्रक्रिया का हिस्सा है। चुनाव आयोग के अनुसार, VVPAT का उद्देश्य EVM से डाले गए वोट के लिए पेपर ऑडिट ट्रेल उपलब्ध कराना है।

EVM vs Ballot Paper: दूसरे देशों में कैसे होता है मतदान?

दुनिया के सभी लोकतंत्र केवल इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग पर निर्भर नहीं हैं। ब्रिटेन, जर्मनी, कनाडा और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में राष्ट्रीय चुनावों में पेपर बैलेट का इस्तेमाल किया जाता है।जर्मनी के बुंडेस्टाग चुनाव में मतदाता बैलेट पेपर के जरिए वोट करता है। ऑस्ट्रेलिया में संघीय चुनावों में भी पेपर बैलेट इस्तेमाल होता है। वहां प्रिफरेंशियल वोटिंग की व्यवस्था है, जिसमें मतदाता उम्मीदवारों को अपनी पसंद के क्रम में रखता है।कनाडा में संघीय चुनावों के बैलेट पेपर हाथ से गिने जाते हैं। ब्रिटेन में आम चुनावों के दौरान मतदाता उम्मीदवार के सामने ‘X’ का निशान लगाता है।अमेरिका की व्यवस्था कुछ अलग है। वहां अलग-अलग राज्यों में अलग मतदान प्रणालियां लागू हैं। कई जगह पेपर बैलेट के साथ ऑप्टिकल स्कैनर का इस्तेमाल भी किया जाता है।इसलिए अंतरराष्ट्रीय तुलना में केवल EVM बनाम बैलेट पेपर कहना पर्याप्त नहीं है। कई देशों में कागजी वोट और मशीन से होने वाली मतगणना, दोनों का इस्तेमाल अलग-अलग स्तर पर किया जाता है।

भारत में EVM का इस्तेमाल कब शुरू हुआ?

भारत में EVM का पहला प्रयोग 1982 में केरल की परूर विधानसभा सीट के उपचुनाव में हुआ था। उस समय कुल 50 EVM का इस्तेमाल किया गया था। हालांकि शुरुआती प्रयोग के बाद पूरे देश में इसका इस्तेमाल तुरंत शुरू नहीं हुआ।1988 में कानून में संशोधन किया गया, जिसके बाद चुनाव आयोग को मतदान मशीनों के इस्तेमाल की वैधानिक शक्ति मिली। 1998 में कुछ विधानसभा सीटों पर EVM का इस्तेमाल हुआ। इसके बाद 1999 में 46 लोकसभा सीटों तक इसका विस्तार किया गया।2001 में तमिलनाडु, केरल, पुडुचेरी और पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनाव पूरी तरह EVM के जरिए कराए गए। इसके बाद 2004 के लोकसभा चुनाव में सभी 543 सीटों पर EVM का इस्तेमाल हुआ और बैलेट पेपर की जगह मशीन ने ले ली।इस तरह 2004 से भारत के सभी लोकसभा चुनाव EVM के जरिए हुए हैं। विधानसभा चुनावों में भी इसका व्यापक इस्तेमाल इससे पहले शुरू हो चुका था। चुनाव आयोग के अनुसार, 2000 के बाद से विधानसभा और लोकसभा चुनावों में EVM का इस्तेमाल लगातार बड़े स्तर पर किया गया है।

EVM vs Ballot Paper: क्या भारत में फिर बैलेट पेपर लाना आसान होगा?

व्यावहारिक तौर पर भारत में बैलेट पेपर की वापसी संभव है, लेकिन यह आसान प्रक्रिया नहीं होगी। देश में करोड़ों मतदाता और लाखों मतदान केंद्र हैं। ऐसे में बैलेट पेपर दोबारा लागू करने के लिए बड़े स्तर पर कागज, बैलेट बॉक्स, परिवहन, सुरक्षा, भंडारण और मैनुअल मतगणना की व्यवस्था करनी होगी।इससे मतगणना में लगने वाला समय भी बढ़ सकता है। दूसरी ओर, बैलेट पेपर के समर्थकों का तर्क है कि भौतिक बैलेट मौजूद होने से स्वतंत्र ऑडिट और जरूरत पड़ने पर दोबारा गिनती का आधार मिलता है।EVM व्यवस्था के समर्थकों का कहना है कि मशीन के इस्तेमाल से अमान्य वोट जैसी कुछ समस्याएं कम होती हैं और पुरानी तरह की कुछ बूथ-कैप्चरिंग संबंधी चुनौतियों से निपटने में मदद मिलती है। साथ ही VVPAT के जरिए वोट का पेपर रिकॉर्ड भी उपलब्ध रहता है।इसलिए बहस केवल इस सवाल तक सीमित नहीं है कि EVM अच्छी है या बैलेट पेपर। असली चर्चा इस बात पर है कि चुनावी व्यवस्था में सटीकता, पारदर्शिता, सुरक्षा, तेज मतगणना और मतदाताओं के भरोसे के बीच किस तरह संतुलन बनाया जाए।फिलहाल भारत की कानूनी और चुनावी व्यवस्था EVM-VVPAT पर आधारित है। इसमें बदलाव के लिए कानून और चुनाव कराने की मौजूदा प्रक्रिया में बड़े स्तर पर बदलाव की जरूरत होगी।

EVM vs Ballot Paper: खरगे ने बैलेट पेपर से मतदान की मांग दोहराई

कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने 30 सितंबर की INDIA ब्लॉक बैठक में चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली से जुड़े विवादों पर विपक्षी दलों से एकजुट रहने की अपील की। उन्होंने कहा कि आगामी चुनावों में विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR से पहले की मतदाता सूची का इस्तेमाल किया जाना चाहिए और EVM की जगह बैलेट पेपर से मतदान कराया जाना चाहिए।खरगे ने कहा कि ‘एक व्यक्ति, एक वोट, एक मूल्य’ भारत के लोकतंत्र की बुनियाद है और इसे कमजोर नहीं होने दिया जा सकता। उन्होंने यह भी कहा कि विपक्षी दल लंबे समय से EVM, मतदाता सूची में कथित हेरफेर और बिना स्पष्ट जानकारी के किए गए बदलावों को लेकर सवाल उठाते रहे हैं।

खरगे का दावा- 13.3 करोड़ मतदाताओं के नाम हटाए गए

कांग्रेस अध्यक्ष ने दावा किया कि राहुल गांधी ने कर्नाटक, हरियाणा और महाराष्ट्र में कथित चुनावी अनियमितताओं को सबूतों के साथ सामने रखा था। उनके अनुसार, INDIA ब्लॉक में शामिल अन्य दलों ने भी इन मामलों को लेकर सवाल और आपत्तियां उठाईं, लेकिन निर्वाचन आयोग ने उनकी शिकायतों पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया।SIR का उल्लेख करते हुए खरगे ने कहा कि चुनाव आयोग इसे मतदाता सूची को साफ और अपडेट करने की प्रक्रिया बता रहा है। लेकिन अगर इस प्रक्रिया के कारण बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम सूची से हटते हैं या लोगों को दोबारा अपनी पात्रता साबित करनी पड़ती है, तो यह सुनिश्चित करना जरूरी है कि कोई वास्तविक और पात्र मतदाता अपने मतदान के अधिकार से वंचित न हो।खरगे ने दावा किया कि 13.3 करोड़ मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए हैं। उन्होंने कहा कि अगर किसी मतदाता का नाम सूची से हटाया जाता है तो यह स्पष्ट होना चाहिए कि किस व्यक्ति का नाम हटाया गया और उसके पीछे क्या कारण था। यह संख्या और आरोप कांग्रेस/INDIA ब्लॉक के दावे के रूप में सामने आए हैं।