UP ELECTION 2027: उत्तर प्रदेश की सियासत में 2027 के विधानसभा चुनाव की आहट के साथ भारतीय जनता पार्टी के भीतर चुनावी तैयारियों का अगला चरण शुरू हो गया है। 2024 के लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में भाजपा को मिले झटके ने पार्टी के रणनीतिकारों के सामने कई सवाल खड़े किए हैं। अब इनमें सबसे बड़ा सवाल यह है कि अगले विधानसभा चुनाव में सत्ता विरोधी माहौल का सामना कैसे किया जाए और मौजूदा विधायकों के खिलाफ स्थानीय नाराजगी को पार्टी के लिए चुनावी नुकसान बनने से कैसे रोका जाए।
इसी कवायद के बीच भाजपा के भीतर गुजरात और मध्य प्रदेश मॉडल की चर्चा तेज होने की बात सामने आ रही है। फोकस सिर्फ सरकार के कामकाज को जनता तक पहुंचाने पर नहीं, बल्कि उम्मीदवारों के स्तर पर भी बदलाव करने की रणनीति पर है।
क्या BJP के लिए असली चिंता स्थानीय विधायक हैं?
सूत्रों के मुताबिक, पार्टी और संघ से जुड़े स्तरों पर उत्तर प्रदेश की विधानसभा सीटों को लेकर लगातार फीडबैक जुटाया जा रहा है। इस आकलन में विधायक की क्षेत्र में सक्रियता, जनता के साथ संपर्क, संगठन के साथ तालमेल, स्थानीय स्वीकार्यता और पिछले चुनाव के बाद किए गए कामों को अलग-अलग कसौटियों पर देखा जा रहा है।
सूत्रों का दावा है कि जून से सितंबर के बीच हुए अलग-अलग आंतरिक आकलनों में करीब 130 मौजूदा विधायकों को लेकर नकारात्मक फीडबैक सामने आया है। इसलिए इसे पार्टी के कथित आंतरिक आकलन के तौर पर ही देखा जाना चाहिए। राजनीतिक रूप से इस फीडबैक का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि भाजपा कथित तौर पर सरकार के खिलाफ नाराजगी और विधायक के खिलाफ नाराजगी को अलग-अलग करके देख रही है।
यानी अगर किसी सीट पर जनता मौजूदा विधायक से नाराज है, लेकिन सरकार की योजनाओं और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के कामकाज को लेकर असंतोष उतना तीखा नहीं है, तो पार्टी के सामने उम्मीदवार बदलने का विकल्प मौजूद रहेगा।
UP ELECTION 2027: 2024 का लोकसभा चुनाव बना बड़ा अलार्म
उत्तर प्रदेश में 2024 का लोकसभा चुनाव भाजपा के लिए एक महत्वपूर्ण राजनीतिक संकेत लेकर आया था। 80 सीटों वाले राज्य में समाजवादी पार्टी ने 37 और भाजपा ने 33 सीटें जीतीं, जबकि कांग्रेस को 6 सीटें मिलीं। 2019 में भाजपा ने यूपी में 62 लोकसभा सीटें जीती थीं। यही वजह है कि विधानसभा चुनाव की तैयारी में भाजपा उन सीटों पर विशेष ध्यान दे सकती है जहां लोकसभा चुनाव के दौरान पार्टी का प्रदर्शन कमजोर रहा या जहां विधानसभा स्तर पर उम्मीदवार के खिलाफ स्थानीय असंतोष दिखाई दिया। पार्टी के लिए संदेश साफ है- लोकसभा में मिले झटके को विधानसभा तक पहुंचने से पहले रोकना होगा।
गुजरात में चला था बड़े पैमाने पर चेहरे बदलने का प्रयोग
भाजपा के रणनीतिकारों के सामने गुजरात का 2022 विधानसभा चुनाव एक महत्वपूर्ण उदाहरण है। चुनाव से पहले भाजपा ने 111 मौजूदा विधायकों में से सिर्फ 71 को दोबारा टिकट दिया। यानी 40 मौजूदा विधायकों को दोबारा मैदान में नहीं उतारा गया। भाजपा ने उस चुनाव में कई बड़े नेताओं और मंत्रियों को भी टिकट नहीं दिया था। कुल 38 सिटिंग भाजपा विधायकों को टिकट नहीं मिलने की रिपोर्ट चुनाव के दौरान सामने आई थी। यह प्रयोग सिर्फ नए चेहरे उतारने तक सीमित नहीं था। इसके पीछे पार्टी की वह रणनीति थी जिसमें लंबे समय से सत्ता में रहने के बाद पैदा होने वाली स्थानीय नाराजगी को उम्मीदवार बदलकर नियंत्रित करने की कोशिश की गई।
UP ELECTION 2027: मध्य प्रदेश में भी सिटिंग विधायकों पर चली थी कैंची
2023 के मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव में भाजपा ने भी बड़ी संख्या में मौजूदा विधायकों को टिकट नहीं दिया। पार्टी की पांचवीं सूची में ही 29 सिटिंग विधायकों को टिकट से बाहर रखा गया था। इनमें तीन मंत्री भी शामिल थे। यूपी के लिए यह मॉडल इसलिए महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि यहां भी पार्टी के सामने बड़ी संख्या में मौजूदा विधायकों की राजनीतिक स्वीकार्यता का सवाल है।
लेकिन उत्तर प्रदेश का सामाजिक और राजनीतिक आकार गुजरात या मध्य प्रदेश से अलग है। इसलिए वहां अपनाई गई रणनीति को हूबहू लागू करने के बजाय स्थानीय समीकरणों के हिसाब से उसका इस्तेमाल किया जाना ज्यादा महत्वपूर्ण होगा।
संघ का फीडबैक भी बनेगा टिकट का आधार?
सूत्रों के अनुसार उत्तर प्रदेश के छह संगठनात्मक क्षेत्रों- काशी, अवध, गोरक्ष, कानपुर, मेरठ और ब्रज से अलग-अलग स्तर पर फीडबैक जुटाया जा रहा है। इन क्षेत्रों में राजनीतिक समीकरण एक जैसे नहीं हैं। कहीं जातीय समीकरण निर्णायक हैं तो कहीं शहरी बनाम ग्रामीण मतदाता का रुझान महत्वपूर्ण है। पश्चिमी यूपी में अलग तरह की सामाजिक गोलबंदी दिखाई देती है, जबकि पूर्वांचल में स्थानीय नेतृत्व और जातीय समीकरणों का असर अलग तरीके से सामने आता है।
ऐसे में भाजपा के लिए हर विधायक का मूल्यांकन एक ही पैमाने से करना मुश्किल होगा। यही वजह है कि संगठनात्मक रिपोर्ट, क्षेत्रीय फीडबैक और स्थानीय स्तर की जानकारी को एक साथ रखकर उम्मीदवार की स्थिति देखने की चर्चा है।
UP ELECTION 2027: चार स्तरों पर रिपोर्ट कार्ड की चर्चा
सूत्रों के मुताबिक उम्मीदवारों के मूल्यांकन में चार तरह की जानकारी को महत्व दिया जा रहा है- पहला, प्रशासनिक और खुफिया तंत्र से मिलने वाली जानकारी। दूसरा, संगठन के पास उपलब्ध बूथ और मंडल स्तर का डेटा। तीसरा, केंद्रीय प्रभारियों और पार्टी स्तर पर कराए जाने वाले स्वतंत्र सर्वे। चौथा, संघ से जुड़े जमीनी नेटवर्क से मिलने वाला फीडबैक।
अगर यह व्यवस्था वास्तव में इसी तरह लागू की जाती है तो टिकट का फैसला केवल विधायक की पिछली जीत या वरिष्ठता के आधार पर नहीं होगा। स्थानीय स्वीकार्यता और दोबारा जीतने की क्षमता भी अहम कसौटी बन सकती है।

A, B, C और D कैटेगरी की चर्चा कितनी अहम?
भाजपा के भीतर विधायकों को अलग-अलग श्रेणियों में रखने की चर्चा भी है। सूत्रों के अनुसार कुछ विधायकों को सुरक्षित श्रेणी में माना जा रहा है, जबकि कुछ को प्रदर्शन सुधारने का समय दिया गया है। कथित आंतरिक आकलन में करीब 60 विधायकों को डी कैटेगरी में रखे जाने और लगभग 80 विधायकों को सी कैटेगरी में रखकर उनके प्रदर्शन पर नजर रखने की बात सामने आ रही है। इसलिए इन्हें संभावित संगठनात्मक मूल्यांकन के रूप में ही देखना उचित होगा।
UP ELECTION 2027: ‘काम सुधारो या टिकट गंवाओ’ का संदेश?
अगर पार्टी बड़े पैमाने पर मौजूदा विधायकों का टिकट काटने की रणनीति अपनाती है तो इसका सीधा राजनीतिक संदेश होगा कि केवल विधायक होना अगले चुनाव में टिकट की गारंटी नहीं है।
विधायकों के सामने तीन महीने, छह महीने या चुनाव तक अपने क्षेत्र में सक्रियता बढ़ाने, कार्यकर्ताओं को साथ जोड़ने और जनता के बीच अपनी छवि सुधारने का दबाव बढ़ सकता है। इसका एक दूसरा राजनीतिक असर भी हो सकता है। टिकट की दौड़ में शामिल नए चेहरों को इससे उम्मीद मिलेगी, जबकि मौजूदा विधायकों के सामने अपनी उपयोगिता साबित करने की चुनौती होगी।
लेकिन बड़े पैमाने पर टिकट कटना आसान भी नहीं
यहीं भाजपा की रणनीति की असली चुनौती शुरू होती है। अगर बड़ी संख्या में मौजूदा विधायकों को टिकट नहीं मिलता है तो उनमें से कुछ पार्टी के भीतर असंतोष पैदा कर सकते हैं। कई सीटों पर उनके समर्थक संगठन के भीतर दबाव बना सकते हैं और कुछ जगहों पर बागी उम्मीदवार भी चुनावी समीकरण प्रभावित कर सकते हैं।
इसलिए पार्टी के सामने सिर्फ यह तय करने की चुनौती नहीं होगी कि किसका टिकट काटना है, बल्कि यह भी तय करना होगा कि जिसे टिकट नहीं मिलेगा, उसे संगठन के साथ कैसे जोड़े रखा जाए। गुजरात में भी टिकट से बाहर किए गए नेताओं को संगठन में सक्रिय रखने का संदेश दिया गया था। 2022 में भाजपा मंच से टिकट से वंचित कुछ नेताओं की सार्वजनिक रूप से सराहना भी की गई थी।
UP ELECTION 2027: विपक्ष के लिए भी बदल जाएगा चुनावी नैरेटिव
अगर भाजपा बड़े पैमाने पर उम्मीदवार बदलती है तो विपक्ष के लिए चुनावी रणनीति भी बदलनी पड़ेगी। अभी तक विपक्ष के लिए सत्ता में लंबे समय से रही भाजपा के खिलाफ एंटी-इंकंबेंसी को मुद्दा बनाना स्वाभाविक रणनीति हो सकती है।
लेकिन अगर पार्टी पुराने चेहरों की जगह नए उम्मीदवार उतार देती है तो विपक्ष को स्थानीय स्तर पर नए उम्मीदवारों के खिलाफ अलग राजनीतिक नैरेटिव तैयार करना होगा। दूसरी तरफ भाजपा पुराने विधायकों के खिलाफ नाराजगी को सरकार की नाराजगी से अलग करके यह संदेश देने की कोशिश कर सकती है कि ‘सरकार वही, लेकिन क्षेत्र का चेहरा नया’।
असली लड़ाई टिकट की सूची आने पर होगी
उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव अभी दूर हैं, लेकिन भाजपा के भीतर उम्मीदवारों की स्क्रीनिंग की चर्चा यह संकेत देती है कि पार्टी पिछली गलतियों को लेकर पहले से तैयारी करना चाहती है।
2024 के लोकसभा चुनाव में यूपी के नतीजों ने भाजपा को यह दिखाया कि केवल संगठन की ताकत और सरकार की योजनाओं के भरोसे हर सीट पर एक जैसा प्रदर्शन मान लेना जोखिम भरा हो सकता है। 2027 के विधानसभा चुनाव में इसलिए स्थानीय उम्मीदवार, जातीय समीकरण, संगठन की सक्रियता और सरकार की छवि—चारों को एक साथ साधने की कोशिश दिखाई दे सकती है। अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि भाजपा कितने मौजूदा विधायकों पर भरोसा कायम रखती है और कितने चेहरों को बदलने का फैसला करती है।
गुजरात में बड़े पैमाने पर चेहरे बदले गए, मध्य प्रदेश में भी सिटिंग विधायकों को टिकट से बाहर किया गया। अब उत्तर प्रदेश में भी अगर इसी तरह का प्रयोग होता है, तो टिकट की पहली सूची सिर्फ उम्मीदवारों के नाम नहीं बताएगी। वह यह भी बताएगी कि भाजपा ने 2024 के लोकसभा चुनाव के संदेश को किस तरह पढ़ा है।
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