Bihar PhD Rules 2026: बिहार के विश्वविद्यालयों में पीएचडी प्रवेश प्रक्रिया को लेकर बड़े बदलाव किए गए हैं। राज्यपाल एवं कुलाधिपति सचिवालय की मंजूरी के बाद बिहार स्टेट यूनिवर्सिटीज पीएचडी ऑर्डिनेंस एंड रेगुलेशंस, 2026 लागू कर दिए गए हैं। इसके साथ ही वर्ष 2017 के पुराने पीएचडी नियम समाप्त हो गए हैं। अब राज्य के सभी विश्वविद्यालयों में पीएचडी की पढ़ाई नए नियमों के तहत होगी।
Bihar PhD Rules 2026: 7.5 CGPA वालों को मिलेगा सीधे PhD में प्रवेश-
नए नियमों के अनुसार, चार वर्षीय शोध सहित स्नातक (प्रतिष्ठा) करने वाले छात्र यदि छह सेमेस्टर में 7.5 CGPA या उससे अधिक अंक प्राप्त करते हैं, तो उन्हें चौथे वर्ष में रिसर्च करने का अवसर मिलेगा। ऐसे छात्र बिना एक वर्षीय मास्टर डिग्री किए सीधे पीएचडी में प्रवेश ले सकेंगे। वहीं, 7.5 CGPA से कम अंक पाने वाले छात्रों को केवल स्नातक (प्रतिष्ठा) की डिग्री मिलेगी और उन्हें आगे की पढ़ाई के लिए निर्धारित प्रक्रिया का पालन करना होगा।
Bihar PhD Rules 2026: तीन वर्षीय ग्रेजुएशन वालों के लिए क्या है नियम-
तीन वर्षीय स्नातक करने वाले छात्रों को पहले दो वर्षीय स्नातकोत्तर (PG) या चार वर्षीय शोध सहित स्नातक (प्रतिष्ठा) के बाद एक वर्षीय मास्टर डिग्री पूरी करनी होगी। इसके बाद ही वे पीएचडी में प्रवेश के पात्र होंगे।
Bihar PhD Rules 2026: UGC 2022 के मानकों के अनुसार तैयार हुए नियम-
नई पीएचडी विनियमावली को यूजीसी (UGC) 2022 के दिशा-निर्देशों के अनुरूप तैयार किया गया है। इसे 4 जुलाई 2026 से प्रभावी कर दिया गया है। अब सभी राज्य विश्वविद्यालयों को अपने वैधानिक निकायों से इसे अपनाना होगा।
NET, CSIR-NET या GATE पास करना होगा जरूरी-
नए नियमों के तहत पीएचडी में प्रवेश केवल उन्हीं अभ्यर्थियों को मिलेगा जिन्होंने UGC-NET, UGC-CSIR NET या GATE परीक्षा पास की हो। प्रवेश प्रक्रिया में 80 प्रतिशत वेटेज NET/GATE स्कोर और 20 प्रतिशत वेटेज इंटरव्यू को दिया जाएगा।
पीएचडी की अवधि होगी 3 से 6 वर्ष-
नई व्यवस्था के अनुसार पीएचडी की न्यूनतम अवधि तीन वर्ष और अधिकतम छह वर्ष होगी। विशेष परिस्थितियों में दो वर्ष का अतिरिक्त विस्तार दिया जा सकेगा। महिला शोधार्थियों और 40 प्रतिशत या उससे अधिक दिव्यांगता वाले शोधार्थियों को भी अतिरिक्त दो वर्ष की छूट मिलेगी।
रिसर्च पेपर प्रकाशित करना होगा अनिवार्य-
पीएचडी उपाधि प्राप्त करने के लिए शोधार्थी को थीसिस जमा करने से पहले कम-से-कम एक रिसर्च पेपर प्रकाशित करना होगा। साथ ही एक राष्ट्रीय या अंतरराष्ट्रीय अकादमिक सम्मेलन में शोधपत्र प्रस्तुत करना भी अनिवार्य रहेगा। यदि थीसिस में 10 प्रतिशत से अधिक प्लेजरिज्म पाया गया तो उसे संशोधन के लिए वापस भेजा जाएगा।
शोधार्थियों को करना होगा शिक्षण कार्य-
नए नियमों के तहत सभी पीएचडी शोधार्थियों को शिक्षण और शैक्षणिक प्रशिक्षण भी लेना होगा। उन्हें विश्वविद्यालय में प्रति सप्ताह 4 से 6 घंटे ट्यूटोरियल, प्रयोगशाला कार्य या शोध सहायक के रूप में योगदान देना होगा।
सेवानिवृत्ति के करीब प्रोफेसर नहीं ले सकेंगे नए शोधार्थी-
नई व्यवस्था के अनुसार जिन प्राध्यापकों की सेवानिवृत्ति में तीन वर्ष से कम समय बचा होगा, वे नए पीएचडी शोधार्थियों का मार्गदर्शन नहीं कर सकेंगे। हालांकि पहले से पंजीकृत शोधार्थियों का मार्गदर्शन वे सेवानिवृत्ति तक जारी रख सकेंगे।
छह महीने में पूरी होगी मूल्यांकन प्रक्रिया-
पीएचडी थीसिस का मूल्यांकन दो बाह्य परीक्षकों और शोध-निर्देशक द्वारा किया जाएगा। आवश्यकता पड़ने पर वाइवा ऑनलाइन भी आयोजित किया जा सकेगा। पूरी मूल्यांकन प्रक्रिया छह महीने के भीतर पूरी करने का लक्ष्य रखा गया है।
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