BRICS Summit 2026: BRICS के नई दिल्ली घोषणापत्र के बाद भारत की विदेश नीति को लेकर नई बहस छिड़ गई है। एक तरफ घोषणापत्र में एकतरफा प्रतिबंधों, टैरिफ और परमाणु प्रतिष्ठानों पर हमलों को लेकर सख्त भाषा दिखाई दी, तो दूसरी तरफ लेबनान के मुद्दे पर इजरायल से संप्रभुता का सम्मान करने की अपील की गई। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या भारत BRICS के मंच से अमेरिका को संदेश, ईरान को कूटनीतिक समर्थन और इजरायल को सख्ती का संकेत दे रहा है? क्या यह वास्तव में भारत की विदेश नीति में बदलाव है या फिर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत ने एक बार फिर रणनीतिक संतुलन साधने की कोशिश की है?
अमेरिका का नाम नहीं, फिर किसे गया संदेश?
नई दिल्ली घोषणापत्र में BRICS देशों ने अंतरराष्ट्रीय कानून के खिलाफ लगाए जाने वाले एकतरफा प्रतिबंधों और सेकेंडरी सैंक्शंस की आलोचना की। इसके साथ ही WTO के नियमों के विपरीत एकतरफा टैरिफ और गैर-टैरिफ उपायों को लेकर भी चिंता जताई गई। खास बात यह है कि घोषणापत्र में अमेरिका का सीधे नाम नहीं लिया गया। फिर भी मौजूदा वैश्विक व्यापार और प्रतिबंधों की राजनीति को देखते हुए इसके संदेश को अमेरिकी नीतियों के संदर्भ में देखा जा रहा है। यानी भारत ने अमेरिका के खिलाफ सीधा मोर्चा खोलने के बजाय ऐसी भाषा पर सहमति बनाई, जिसे BRICS के अलग-अलग सदस्य देश स्वीकार कर सकें।
BRICS Summit 2026: ईरान को क्या मिला?
ईरान BRICS का सदस्य है और पश्चिम एशिया में जारी तनाव के बीच उसके लिए परमाणु प्रतिष्ठानों का मुद्दा बेहद संवेदनशील है। घोषणापत्र में IAEA की निगरानी वाले शांतिपूर्ण परमाणु प्रतिष्ठानों और असैन्य बुनियादी ढांचे पर हमलों को लेकर गंभीर चिंता जताई गई। साथ ही परमाणु सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय कानून के पालन पर जोर दिया गया। हालांकि यहां भी किसी देश का नाम लेकर आरोप नहीं लगाया गया। इसलिए इसे ईरान के पक्ष में भारत का खुला समर्थन कहना सही नहीं होगा। लेकिन ईरान के लिए यह जरूर महत्वपूर्ण है कि उसके प्रमुख चिंताओं से जुड़ा मुद्दा BRICS के साझा घोषणापत्र का हिस्सा बना।
इजरायल पर BRICS का रुख क्यों चर्चा में?
लेबनान के मुद्दे पर घोषणापत्र की भाषा ज्यादा स्पष्ट रही। BRICS ने इजरायल से लेबनान की संप्रभुता का सम्मान करने और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव 1701 का पालन करने की अपील की। गाजा को लेकर भी युद्धविराम, मानवीय सहायता और फिलिस्तीनियों के जबरन विस्थापन से जुड़े मुद्दों को उठाया गया। यही वजह है कि BRICS के इस रुख को लेकर पश्चिमी देशों और इजरायल के साथ भारत के संबंधों के संदर्भ में भी सवाल उठ रहे हैं।

BRICS Summit 2026: क्या भारत अमेरिका से दूरी बना रहा है?
यही इस पूरी कहानी का सबसे बड़ा सवाल है। सिर्फ BRICS घोषणापत्र के आधार पर यह कहना जल्दबाजी होगी कि भारत अमेरिका से दूरी बना रहा है। भारत और अमेरिका के बीच व्यापार, तकनीक, रक्षा और रणनीतिक सहयोग के कई महत्वपूर्ण क्षेत्र हैं। दूसरी तरफ भारत रूस से ऊर्जा और रक्षा संबंध बनाए हुए है, ईरान के साथ चाबहार और क्षेत्रीय संपर्क जैसे हित हैं और चीन के साथ सीमा विवाद के बावजूद संवाद जारी है। यानी भारत की कोशिश किसी एक खेमे में जाने की नहीं, बल्कि अपने हितों के आधार पर अलग-अलग शक्तियों के साथ संबंध बनाए रखने की दिखाई देती है।
BRICS में भारत ने असल में क्या हासिल किया?
भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती थी- अलग-अलग हितों वाले देशों को एक साझा दस्तावेज पर सहमत कराना। BRICS में भारत-चीन के मतभेद हैं। ईरान और यूएई के बीच क्षेत्रीय समीकरण अलग हैं। रूस और पश्चिम के बीच तनाव जगजाहिर है। इसके बावजूद नई दिल्ली घोषणापत्र पर सहमति बनी। यही भारत की बड़ी कूटनीतिक उपलब्धि मानी जा सकती है। भारत ने संवाद, कूटनीति और बहुपक्षीय सहयोग की भाषा को आगे बढ़ाते हुए ऐसे मुद्दों को भी घोषणापत्र में जगह दिलाई, जो विकासशील देशों और ग्लोबल साउथ से जुड़े हैं।
BRICS Summit 2026: मोदी ने ईरान को क्या संदेश दिया?
BRICS बैठक से इतर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियान के साथ मुलाकात भी अहम रही। भारत ने पश्चिम एशिया में संवाद और कूटनीति की जरूरत पर जोर दिया। साथ ही क्षेत्र में जहाजों की सुरक्षा और व्यापारिक मार्गों को सुरक्षित रखने की जरूरत भी भारत के लिए महत्वपूर्ण है। इससे यह संकेत मिलता है कि भारत ईरान के साथ संवाद बनाए रखना चाहता है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि वह अमेरिका या इजरायल के साथ अपने रिश्ते खत्म करने की दिशा में बढ़ रहा है।
तो क्या बदल रही है भारत की विदेश नीति?
फिलहाल इसे विदेश नीति में बदलाव कहना सही नहीं होगा। ज्यादा सटीक शब्द है – रणनीतिक स्वायत्तता का इस्तेमाल। भारत अमेरिका और यूरोप के साथ आर्थिक एवं रणनीतिक साझेदारी चाहता है। रूस के साथ पुराने रिश्ते बनाए रखना चाहता है। ईरान के साथ क्षेत्रीय संपर्क और ऊर्जा हित हैं। चीन के साथ प्रतिस्पर्धा के बावजूद संवाद जरूरी है। यानी भारत का संदेश यही है कि वह किसी एक शक्ति के दबाव में अपनी विदेश नीति तय नहीं करेगा।
BRICS Summit 2026: एक तीर से कई निशाने?
BRICS के मंच पर भारत ने एक साथ कई संदेश देने की कोशिश की है- एकतरफा प्रतिबंधों और टैरिफ के खिलाफ साझा रुख, परमाणु प्रतिष्ठानों की सुरक्षा पर जोर, पश्चिम एशिया में कूटनीति की अपील और लेबनान के मुद्दे पर इजरायल को संदेश। लेकिन साथ ही भारत ने BRICS को खुलकर पश्चिम-विरोधी गठबंधन बनाने से भी बचाए रखा।यही भारत की मौजूदा कूटनीति का सबसे बड़ा संकेत है, किसी एक खेमे में जाना नहीं, बल्कि हर बड़े शक्ति केंद्र के साथ अपने राष्ट्रीय हितों के मुताबिक संबंध बनाए रखना। इसलिए नई दिल्ली घोषणापत्र को भारत की विदेश नीति में अचानक आए बदलाव के बजाय एक जटिल लेकिन सोची-समझी कूटनीतिक ‘बैलेंसिंग एक्ट’ के रूप में देखना ज्यादा उचित होगा।







