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जब 3 वोटों से रचा गया इतिहास: दादाभाई नौरोजी बने थे ब्रिटिश संसद पहुंचने वाले पहले भारतीय

Dadabhai Naoroji:

Dadabhai Naoroji: आज ब्रिटेन की राजनीति, प्रशासन और व्यापार जगत में भारतीय मूल के लोगों का प्रभाव लगातार बढ़ रहा है। लेकिन इस सफर की शुरुआत 19वीं सदी में उस समय हुई थी, जब दादाभाई नौरोजी ने नस्लीय भेदभाव और औपनिवेशिक सोच को चुनौती देते हुए ब्रिटिश संसद में ऐतिहासिक प्रवेश किया था।

साधारण परिवार से ब्रिटेन तक का सफर

4 सितंबर 1825 को मुंबई के एक साधारण पारसी परिवार में जन्मे दादाभाई नौरोजी बचपन से ही मेधावी छात्र थे। उन्होंने एल्फिंस्टन कॉलेज में शिक्षा प्राप्त की और आगे चलकर वहीं गणित एवं प्राकृतिक दर्शन के पहले भारतीय प्रोफेसर बने। उस दौर में किसी भारतीय का इतने प्रतिष्ठित शैक्षणिक पद पर पहुंचना अपने आप में एक बड़ी उपलब्धि थी।

Dadabhai Naoroji: लंदन जाकर उठाई भारत की आवाज

साल 1855 में नौरोजी एक व्यावसायिक फर्म में साझेदार के रूप में लंदन पहुंचे। वहां उन्होंने ब्रिटिश शासन के अधीन भारत की आर्थिक स्थिति का गहन अध्ययन किया। उनका मानना था कि भारत में गरीबी और भुखमरी का प्रमुख कारण ब्रिटिश औपनिवेशिक नीतियां थीं। उन्होंने इन मुद्दों को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उठाना शुरू किया और भारत की आवाज को ब्रिटेन तक पहुंचाया।

Dadabhai Naoroji: नस्लीय भेदभाव के बीच लड़ा चुनाव

दादाभाई नौरोजी ने 1886 में पहली बार ब्रिटिश संसद का चुनाव लड़ा, लेकिन उन्हें हार का सामना करना पड़ा। इसके बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी और 1892 में लंदन की फिंसबरी सेंट्रल सीट से लिबरल पार्टी के उम्मीदवार के रूप में दोबारा मैदान में उतरे।

चुनाव प्रचार के दौरान उन्हें नस्लीय टिप्पणियों और भेदभाव का सामना करना पड़ा। तत्कालीन ब्रिटिश प्रधानमंत्री लॉर्ड सैलिसबरी ने यहां तक कह दिया था कि ब्रिटिश मतदाता किसी “काले आदमी” को संसद नहीं भेजेंगे। इस बयान ने ब्रिटेन में व्यापक बहस छेड़ दी और कई उदारवादी मतदाता नौरोजी के समर्थन में आ गए।

महज 3 वोटों से दर्ज की ऐतिहासिक जीत

1892 के चुनाव में दादाभाई नौरोजी ने मात्र 3 वोटों के अंतर से जीत हासिल की। यह जीत सिर्फ एक चुनावी सफलता नहीं थी, बल्कि नस्लीय पूर्वाग्रहों पर लोकतंत्र की जीत भी थी। इसके साथ ही वे ब्रिटिश संसद के निचले सदन ‘हाउस ऑफ कॉमन्स’ में पहुंचने वाले पहले भारतीय और पहले एशियाई बन गए।

भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के अग्रदूत

दादाभाई नौरोजी केवल एक सांसद ही नहीं थे, बल्कि भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के प्रमुख नेताओं में भी शामिल थे। उन्हें भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के संस्थापकों में गिना जाता है और उनकी आर्थिक नीतियों ने भारत के स्वतंत्रता संग्राम को वैचारिक आधार प्रदान किया।

आज भी प्रेरणा हैं दादाभाई नौरोजी

दादाभाई नौरोजी की ऐतिहासिक जीत ने दुनिया को यह संदेश दिया कि प्रतिभा और दृढ़ संकल्प के सामने नस्लीय भेदभाव टिक नहीं सकता। उनकी उपलब्धि ने आने वाली पीढ़ियों के लिए राजनीति और सार्वजनिक जीवन में नए रास्ते खोले, जिनका प्रभाव आज भी देखा जा सकता है।

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