Delhi High Court: दिल्ली हाई कोर्ट ने म्यांमार के एक शरणार्थी की याचिका पर सुनवाई करते हुए दिल्ली विश्वविद्यालय (DU) से जवाब तलब किया है। याचिका में विदेशी छात्रों के स्नातक प्रवेश के लिए वैध पासपोर्ट अनिवार्य करने के नियम को चुनौती दी गई है। सुनवाई के दौरान अदालत ने सवाल किया कि जब कोई व्यक्ति शरणार्थी है तो उससे पासपोर्ट कैसे मांगा जा सकता है।
Delhi High Court: 13 जुलाई को होगी अगली सुनवाई-
न्यायमूर्ति जसमीत सिंह की पीठ ने दिल्ली विश्वविद्यालय को अपना जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है। मामले की अगली सुनवाई 13 जुलाई को तय की गई है। यह याचिका यूएनएचसीआर से मान्यता प्राप्त म्यांमार के शरणार्थी हेनरी ह्तू आंग लिन ने दायर की है।
Delhi High Court: पासपोर्ट न होने से आवेदन अधूरा माना गया-
याचिकाकर्ता का कहना है कि वह वर्ष 2022 में म्यांमार की राजनीतिक अस्थिरता और हिंसा के कारण भारत आया था और यूएनएचसीआर के संरक्षण में रह रहा है। भारत में 10वीं और 12वीं की पढ़ाई पूरी करने के बाद उसने शैक्षणिक सत्र 2026-27 में DU में स्नातक प्रवेश के लिए आवेदन किया, लेकिन पासपोर्ट जमा न करने के कारण आवेदन स्वीकार नहीं किया गया।
UNHCR दस्तावेज को भी नहीं मिली मान्यता-
याचिका में कहा गया है कि विश्वविद्यालय ने यूएनएचसीआर के शरणार्थी प्रमाणपत्र को पासपोर्ट के विकल्प के रूप में स्वीकार करने से इनकार कर दिया। जबकि प्रवेश बुलेटिन में यूएनएचसीआर प्रमाणपत्र को आवश्यक दस्तावेजों में शामिल किया गया है।
भेदभाव का लगाया आरोप-
याचिकाकर्ता ने दावा किया कि विश्वविद्यालय तिब्बती छात्रों को पासपोर्ट के बिना वैकल्पिक दस्तावेजों के आधार पर प्रवेश देता है, लेकिन म्यांमार के यूएनएचसीआर मान्यता प्राप्त शरणार्थियों को यह सुविधा नहीं दी जा रही है। इसे संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 का उल्लंघन बताते हुए भेदभावपूर्ण करार दिया गया है।
पासपोर्ट की शर्त पर उठाए सवाल-
याचिका में कहा गया है कि उसकी पहचान और शैक्षणिक योग्यता पहले से प्रमाणित है। ऐसे में पासपोर्ट की अनिवार्यता का शैक्षणिक पात्रता से कोई संबंध नहीं है और उत्पीड़न से भागकर आए शरणार्थी से उसी देश का पासपोर्ट मांगना कानून और मानवाधिकारों के सिद्धांतों के खिलाफ है।
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