Jagannath Rath Yatra 2026 : ओडिशा के पुरी में आयोजित होने वाली जगन्नाथ रथ यात्रा दुनिया के सबसे बड़े धार्मिक आयोजनों में से एक मानी जाती है। हर साल लाखों श्रद्धालु भगवान जगन्नाथ, बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के दर्शन के लिए यहां पहुंचते हैं। विशाल रथों पर सवार होकर तीनों देव विग्रह जब नगर भ्रमण के लिए निकलते हैं तो पूरा पुरी भक्तिमय वातावरण में डूब जाता है। इस यात्रा के दौरान कई धार्मिक अनुष्ठान किए जाते हैं, लेकिन इनमें ‘अधर पाना’ की परंपरा सबसे अलग और रहस्यमयी मानी जाती है। अधर पाना रथ यात्रा के अंतिम चरणों में होने वाला एक विशेष धार्मिक अनुष्ठान है।

इसे आषाढ़ शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि पर संपन्न किया जाता है। इस अवसर पर भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा के लिए विशेष पेय तैयार किया जाता है। इसे बड़े-बड़े मिट्टी के पात्रों में भरकर रथों पर ले जाया जाता है और भगवान के अधरों यानी होंठों से स्पर्श कराने के बाद यह पेय जमीन पर अर्पित कर दिया जाता है।
Jagannath Rath Yatra 2026
अधर पाना सामान्य प्रसाद नहीं होता। इसे दूध, केला, तुलसी, कपूर, काली मिर्च, दालचीनी और अन्य पारंपरिक सामग्री को मिलाकर तैयार किया जाता है। इसका रंग हल्का सफेद होता है और देखने में यह खीर जैसा प्रतीत होता है। इस पेय को विशेष विधि से तैयार करने की जिम्मेदारी मंदिर के निर्धारित सेवकों पर होती है, जिन्हें स्थानीय परंपरा में ‘महासूरा’ कहा जाता है। इस अनुष्ठान की सबसे अनोखी बात यही है कि भगवान को अर्पित करने के बाद इस पेय को किसी श्रद्धालु में वितरित नहीं किया जाता। धार्मिक मान्यता के अनुसार यह भोग उन अदृश्य शक्तियों के लिए समर्पित होता है, जो रथ यात्रा के दौरान भगवान के रथों की रक्षा करती हैं। मान्यता है कि देवगणों के साथ-साथ अन्य सूक्ष्म शक्तियां भी इस दिव्य यात्रा में उपस्थित रहती हैं और अधर पाना उनके सम्मान में अर्पित किया जाता है। इसी कारण इसे जमीन पर प्रवाहित कर दिया जाता है।
नहीं होती अनुमति
अधर पाना को मंदिर की परंपरा में सामान्य प्रसाद नहीं माना जाता। इसलिए न तो इसे श्रद्धालु ग्रहण करते हैं और न ही पुजारी इसका सेवन करते हैं। इस अनुष्ठान का उद्देश्य केवल विशेष धार्मिक मान्यताओं के अनुरूप अदृश्य शक्तियों को संतुष्ट करना होता है। यही कारण है कि श्रद्धालुओं को इस पेय को छूने या पीने से भी दूर रहने की सलाह दी जाती है। यदि आप जगन्नाथ रथ यात्रा में शामिल होने जा रहे हैं, तो मंदिर की परंपराओं और नियमों का सम्मान करना बेहद जरूरी है। अधर पाना से जुड़ी इस विशेष रस्म को केवल श्रद्धा और आस्था के साथ देखा जाता है। इसे सामान्य प्रसाद समझकर ग्रहण करने का प्रयास नहीं करना चाहिए। सदियों पुरानी यह परंपरा आज भी उसी श्रद्धा और विधि-विधान के साथ निभाई जाती है, जो जगन्नाथ संस्कृति की अनूठी पहचान मानी जाती है।
Read More : Fingerprint की ऐसे हुई थी खोज; जानें उस वैज्ञानिक की कहानी, जिसने अपराध जांच की बदल दी दुनिया
Sanjucta








