Fingerprint History : आज के दौर में किसी व्यक्ति की पहचान साबित करने के लिए फिंगरप्रिंट का इस्तेमाल सबसे विश्वसनीय तरीकों में गिना जाता है। बैंकिंग से लेकर सरकारी दस्तावेजों, मोबाइल सुरक्षा और अपराध जांच तक, उंगलियों के निशान हर जगह अहम भूमिका निभाते हैं। खास बात यह है कि दुनिया के किसी भी दो व्यक्तियों के फिंगरप्रिंट एक जैसे नहीं होते। इस वैज्ञानिक तथ्य को दुनिया के सामने साबित करने का श्रेय स्कॉटलैंड के डॉक्टर और वैज्ञानिक हेनरी फॉल्ड्स को जाता है, जिनकी खोज ने आधुनिक फॉरेंसिक विज्ञान की दिशा बदल दी।

हेनरी फॉल्ड्स का जन्म 1 जून 1843 को स्कॉटलैंड के बीथ शहर में हुआ था। उनका परिवार शुरू में संपन्न था, लेकिन बैंक ऑफ ग्लासगो के डूबने के बाद आर्थिक स्थिति पूरी तरह बिगड़ गई।
Fingerprint की ऐसे हुई थी खोज
मजबूरी में उन्हें महज 13 वर्ष की उम्र में पढ़ाई छोड़कर नौकरी करनी पड़ी। उन्होंने क्लर्क के रूप में काम किया और बाद में एक शॉल निर्माता के यहां प्रशिक्षु बने। हालांकि, कठिन परिस्थितियों के बावजूद उन्होंने शिक्षा का साथ नहीं छोड़ा और बाद में दोबारा पढ़ाई शुरू कर दी। हेनरी ने ग्लासगो यूनिवर्सिटी में गणित, तर्कशास्त्र और क्लासिक्स की पढ़ाई की। इसके बाद एंडरसन कॉलेज से चिकित्सा की डिग्री हासिल की। डॉक्टर बनने के बाद वे चर्च ऑफ स्कॉटलैंड के मेडिकल मिशनरी बने। वर्ष 1871 में उन्हें भारत के दार्जिलिंग भेजा गया, जहां उन्होंने गरीबों के अस्पताल में सेवाएं दीं। दो साल बाद वे जापान पहुंचे और टोक्यो के सुकिजी क्षेत्र में पहला स्कॉटिश मिशन अस्पताल स्थापित किया। उन्होंने मेडिकल शिक्षा को बढ़ावा देने के साथ हैजा और रेबीज जैसी बीमारियों की रोकथाम में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया।
मिट्टी के बर्तनों से मिला अनोखा विचार
जापान में कार्यकाल के दौरान हेनरी फॉल्ड्स एक पुरातात्विक खुदाई देखने गए। वहां उन्होंने प्राचीन मिट्टी के बर्तनों पर कुम्हारों की उंगलियों के निशान देखे। यहीं से उनके मन में यह सवाल उठा कि क्या हर व्यक्ति के फिंगरप्रिंट अलग होते हैं। इसके बाद उन्होंने कई लोगों के उंगलियों के निशान एकत्र किए और लंबे समय तक उनका अध्ययन किया। शोध के बाद उन्होंने निष्कर्ष निकाला कि प्रत्येक व्यक्ति के फिंगरप्रिंट पूरी तरह अलग होते हैं और जीवनभर नहीं बदलते।
बचाई निर्दोष की जिंदगी
हेनरी फॉल्ड्स की खोज का पहला व्यावहारिक उपयोग जापान में एक चोरी के मामले में हुआ। पुलिस ने शक के आधार पर एक व्यक्ति को आरोपी बना लिया था, लेकिन फॉल्ड्स ने घटनास्थल से मिले फिंगरप्रिंट का मिलान कर साबित कर दिया कि वह व्यक्ति निर्दोष है। बाद में असली अपराधी पकड़ा गया। यह इतिहास का पहला दर्ज मामला माना जाता है, जिसमें फिंगरप्रिंट की मदद से किसी निर्दोष को न्याय मिला और वास्तविक अपराधी की पहचान संभव हो सकी। साल 1880 में हेनरी फॉल्ड्स ने अपनी इस खोज को प्रतिष्ठित वैज्ञानिक पत्रिका नेचर में प्रकाशित किया। इसके बाद दुनिया भर में अपराध जांच एजेंसियों ने फिंगरप्रिंट तकनीक को अपनाना शुरू किया। 24 मार्च 1930 को उनका निधन हो गया, लेकिन उनकी खोज आज भी फॉरेंसिक साइंस, सुरक्षा व्यवस्था और पहचान प्रणाली की मजबूत नींव मानी जाती है। आधुनिक अपराध जांच में जिस तकनीक पर दुनिया भरोसा करती है, उसकी शुरुआत एक वैज्ञानिक की जिज्ञासा और वर्षों की मेहनत का परिणाम थी।
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