Home » News » Mahatma Gandhi: आजादी के बाद पाकिस्तान में रहना चाहते थे महात्मा गांधी? इतिहास का एक चौंकाने वाला अध्याय जान रह जाएँगे,आप हैरान

Mahatma Gandhi: आजादी के बाद पाकिस्तान में रहना चाहते थे महात्मा गांधी? इतिहास का एक चौंकाने वाला अध्याय जान रह जाएँगे,आप हैरान

Mahatma Gandhi: आजादी के बाद पाकिस्तान में रहना चाहते थे महात्मा गांधी? इतिहास का एक चौंकाने वाला अध्याय जान रह जाएँगे,आप हैरान

Mahatma Gandhi: 15 अगस्त 1947… भारत आजाद हुआ, लेकिन इसी आजादी के साथ देश का विभाजन भी हुआ। एक तरफ भारत और दूसरी तरफ पाकिस्तान—दो नए राष्ट्र अस्तित्व में आए। विभाजन के साथ भड़की हिंसा ने लाखों लोगों की जिंदगी बदल दी।लेकिन इसी दौर से जुड़ा महात्मा गांधी के जीवन का एक ऐसा पहलू है, जिस पर आज भी चर्चा होती है—क्या गांधी आजादी के बाद पाकिस्तान में रहना चाहते थे?

गांधी के लिए विभाजन खुशी का नहीं, पीड़ा का विषय था

महात्मा गांधी ने भारत के विभाजन का समर्थन उत्साह के साथ नहीं किया था। उनके लिए भारत की कल्पना ऐसी थी, जिसमें अलग-अलग धर्मों के लोग साथ रह सकें।विभाजन के बाद भी गांधी का ध्यान सत्ता और जश्न से ज्यादा उन इलाकों पर था, जहां हिंदू-मुस्लिम हिंसा और डर का माहौल बना हुआ था। यही वजह थी कि 15 अगस्त 1947 को जब दिल्ली में आजादी का जश्न मनाया जा रहा था, गांधी कलकत्ता में थे और वहां शांति स्थापित करने की कोशिश कर रहे थे।उनके लिए आजादी का मतलब केवल सत्ता का हस्तांतरण नहीं था, बल्कि लोगों के बीच भरोसा और शांति कायम होना भी था।

Mahatma Gandhi: तो फिर पाकिस्तान जाने की बात क्यों सामने आती है?

एम.जे. अकबर की किताब Gandhi’s Hinduism: The Struggle Against Jinnah’s Islam में 31 मई 1947 की गांधी और खान अब्दुल गफ्फार खान से बातचीत का हवाला दिया गया है।इस विवरण के अनुसार गांधी ने कहा था कि अगर पाकिस्तान अस्तित्व में आता है, तो वह वहां जाना, घूमना और वहां रहना चाहते हैं। इसका संदर्भ पाकिस्तान को स्वीकार करने या उसका राजनीतिक समर्थन करने से ज्यादा गांधी के उस विचार से जुड़ा था कि वह भारत के विभाजन को मन से स्वीकार नहीं कर पा रहे थे।यानी गांधी की सोच यह नहीं थी कि भारत और पाकिस्तान के बीच दुश्मनी हो जाए। वह विभाजन के बाद भी दोनों तरफ के लोगों के बीच संबंध और शांति बनाए रखने की कोशिश करना चाहते थे।

Mahatma Gandhi: गांधी पाकिस्तान में क्यों जाना चाहते थे?

इसके पीछे सबसे बड़ा कारण था—वह उन लोगों के बीच जाना चाहते थे जो हिंसा और डर के बीच जी रहे थे।नोआखाली में सांप्रदायिक हिंसा के दौरान गांधी खुद प्रभावित इलाकों में गए थे। उनका मानना था कि अगर कहीं लोगों के बीच डर है, तो नेता का काम सुरक्षित जगह बैठकर बयान देना नहीं, बल्कि उसी जगह जाकर लोगों के बीच खड़ा होना है।इसी सोच के कारण वह पाकिस्तान के उन इलाकों में भी जाना चाहते थे जहां हिंदू और सिख समुदाय खुद को असुरक्षित महसूस कर रहे थे।

Mahatma Gandhi: गांधी का हिंदू-मुस्लिम एकता वाला विचार

गांधी की राजनीति का आधार धार्मिक विभाजन नहीं, बल्कि सभी धर्मों के सह-अस्तित्व की कल्पना थी। वह मानते थे कि भारत केवल हिंदुओं का देश नहीं हो सकता और न ही किसी एक धर्म को राष्ट्र की पहचान का आधार बनाया जाना चाहिए।उनकी इसी सोच के कारण विभाजन उनके लिए गहरी व्यक्तिगत और वैचारिक पीड़ा का विषय बना रहा।उनके लेखन और भाषणों में बार-बार यह विचार दिखाई देता है कि हिंदू, मुस्लिम, सिख, पारसी और ईसाई—सभी भारत की साझी राष्ट्रीयता का हिस्सा हैं।

लेकिन क्या गांधी पाकिस्तान बनाने के समर्थक थे?

यहां एक महत्वपूर्ण फर्क समझना जरूरी है।गांधी का पाकिस्तान की मांग के प्रति रवैया और पाकिस्तान बनने के बाद वहां जाने की इच्छा—दो अलग बातें थीं।विभाजन को लेकर गांधी की असहमति ऐतिहासिक रिकॉर्ड में दर्ज है। वहीं, विभाजन हो जाने के बाद वह नई परिस्थितियों में लोगों की सुरक्षा और सांप्रदायिक शांति के लिए काम करना चाहते थे।ऐतिहासिक स्रोतों में यह भी मिलता है कि गांधी ने पाकिस्तान को लेकर अपनी असहमति के बावजूद वहां के आम लोगों और अल्पसंख्यकों के अधिकारों की चिंता की।

Mahatma Gandhi: 15 अगस्त का जश्न गांधी से दूर क्यों रहा?

जब देश आजादी का जश्न मना रहा था, गांधी दिल्ली में नहीं थे। वह कलकत्ता में सांप्रदायिक तनाव को शांत करने में लगे हुए थे।उनकी नजर में आजादी अधूरी थी, अगर आजाद देश के नागरिक ही एक-दूसरे के खून के प्यासे हो जाएं।इसीलिए गांधी के लिए 15 अगस्त सिर्फ उत्सव का दिन नहीं था। विभाजन की त्रासदी उनके लिए इतनी बड़ी थी कि उन्होंने आजादी के दिन भी शांति और सांप्रदायिक सद्भाव को प्राथमिकता दी।तो क्या यह कहना सही होगा कि “महात्मा गांधी पाकिस्तान में बसना चाहते थे”?इतिहास को सिर्फ एक लाइन में समेटना सही नहीं होगा।इतना जरूर है कि 1947 में गांधी ने पाकिस्तान जाने और वहां रहने की इच्छा व्यक्त की थी—लेकिन इसका संदर्भ पाकिस्तान के समर्थन से ज्यादा विभाजन के बाद वहां जाकर लोगों के बीच शांति कायम करने और अल्पसंख्यकों के बीच भरोसा पैदा करने से जुड़ा था।गांधी की पूरी सोच को समझने के लिए उनके शब्दों, उनके उस समय के काम और विभाजन के दौरान उनके किए गए शांति प्रयासों को साथ देखना जरूरी है।क्योंकि इतिहास सिर्फ यह नहीं बताता कि देश दो हिस्सों में कैसे बंटा… इतिहास यह भी बताता है कि उस बंटवारे के बीच कुछ लोग आखिरी..सांस तक लोगों को जोड़ने की कोशिश करते रहे।

ये भी पढ़े…..स्वतंत्रता दिवस पर मोहन भागवत ने चेताया बोले- युवाओं को दिशा नहीं मिली तो समाज पर बोझ बन जाएंगे